मुंबई महानगरपालिका का प्रयोग !
मुंबई, ५ जून (वार्ता.) – मुंबई में गणेशोत्सव में समुद्र तथा कृत्रिम कुंडों में सहस्रों की संख्या में प्लास्टर ऑफ पेरिस (‘पीओपी’) की श्रीगणेशमूर्तियां विसर्जित की जाती हैं । जल में विघटित न हुई ‘पीओपी’ की मूर्तियां प्रशासन द्वारा प्रतिवर्ष एकत्रित की जाती हैं । वर्ष २०२५ में मुंबई में विसर्जित श्रीगणेशमूर्तियों का लगभग २ सहस्र ५०० टन पीओपी एकत्रित हुआ है । इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध ‘पीओपी’ का क्या किया जाए ?, यह प्रश्न प्रशासन के सामने है । इस पर उपाय के रूप में इस ‘पीओपी’ से सार्वजनिक उद्यानों में बैठने के लिए चौकियां (बेंच), ईंटें, तथा अन्य सुशोभन की वस्तुएं बनाने का प्रयोग मुंबई महानगरपालिका ने नाशिक की ‘अकर्म फाउंडेशन’ के सहयोग से किया है ।
🚨 BMC plans to recycle PoP Shri Ganesh idols into benches, bricks, and decorative items.
However, the Dr. Anil Kakodkar Committee's 2025 report reportedly concluded that PoP does not cause pollution.
If PoP is not polluting, why the continued restrictions, artificial ponds,… pic.twitter.com/M8bWTG0pee
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) June 5, 2026
शासन के प्रतिवेदन के पश्चात ही प्रत्यक्ष कार्रवाई होगी ! – प्रदीप गवली, उपायुक्त, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, मुंबई महानगरपालिका
विसर्जित श्रीगणेशमूर्तियों का विधिवत पूजन करके ही उनका विघटन किया गया है । प्रायोगिक स्तर पर १० टन ‘पीओपी’ ‘अकर्म फाउंडेशन’ को दिया गया था । उसमें अत्यधिक मात्रा में नारियल की जटाएं (काथ्या), पाषाण, काष्ठ, शाडू की मिट्टी, वस्त्र आदि प्राप्त हुए । इस कारण १० टन में से केवल साढे तीन टन ‘पीओपी’ ही प्राप्त हुआ । ‘पीओपी’ का निस्तारण कैसे किया जाए ?, इस विषय में शासन ने समिति गठित की है । इस समिति का प्रतिवेदन (रिपोर्ट) अभी आना शेष है । यह प्रयोग प्रायोगिक स्तर पर किया गया है तथा शासन के दिशा-निर्देशों के पश्चात ही इसके अनुसार कार्रवाई करनी है अथवा नहीं ?, यह निश्चित किया जाएगा ।
क्या है प्रकरण ?
वर्ष २०२५ में मुंबई उच्च न्यायालय ने विसर्जित की गई श्रीगणेशमूर्तियों के ‘पीओपी’ का निस्तारण कैसे किया जाएगा ?, इस विषय में नीति निर्धारित करने के निर्देश राज्य सरकार को दिए । उस पर अधिक मूर्तियों को समुद्र में, जबकि ६ फीट तक की ऊंचाई वाली मूर्तियों को कृत्रिम कुंडों में विसर्जित करने का अस्थायी विकल्प सरकार ने निकाला है । इस विषय का शपथपत्र सरकार ने न्यायालय में प्रस्तुत किया है, साथ ही ‘पीओपी’ का निस्तारण कैसे किया जाए ?, इसका नीतिगत निर्णय लेने के लिए परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में मार्च २०२५ में समिति गठित की है । इस समिति का प्रतिवेदन अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है । यह प्रतिवेदन प्राप्त होने पर राज्य सरकार उसे न्यायालय में प्रस्तुत करेगी तथा न्यायालय के निर्देश के पश्चात ही ‘पीओपी’ विषयक नीति निश्चित की जाएगी ।
‘पीओपी’ के कारण प्रदूषण न होने का डॉ. अनिल काकोडकर समिति का प्रतिवेदन !सरकार ने ‘पीओपी’ के निस्तारण विषयक समिति गठित करने से पूर्व ‘क्या पीओपी के कारण प्रदूषण होता है ?’, इसका अध्ययन करने के लिए भी डॉ. अनिल काकोडकर की ही अध्यक्षता में समिति गठित की थी । इस समिति ने वर्ष २०२५ में सरकार को प्रतिवेदन प्रस्तुत किया । इस प्रतिवेदन का निष्कर्ष है कि ‘पीओपी के कारण किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता है’ । दूसरी ओर, ‘पीओपी’ का निस्तारण कैसे किया जाए ?, इस विषय का प्रतिवेदन अभी भी लंबित है । (‘यदि पीओपी के कारण प्रदूषण नहीं होता है, तो उसके निस्तारण के लिए इतना अथक प्रयास क्यों ? तथा कृत्रिम कुंडों की योजना भी किसलिए ? यदि प्रदूषण होता ही नहीं है, तो प्राकृतिक जलस्रोतों में भी श्रीगणेशमूर्तियों का विसर्जन करने देने में क्या कठिनाई है ?’ – संपादक) |

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