जिहादियों ने २२ अप्रैल २०२५ को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हिन्दुओं को लक्ष्य बनाया । आतंकियों ने इन हिन्दुओं से उनका धर्म पूछकर उन पर गोलियां चलाईं । ३५ वर्ष पूर्व कश्मीर में ऐसा ही नरसंहार हुआ था । अंतर केवल यही है कि वर्तमान में पर्यटन हेतु कश्मीर गए हिन्दुओं को लक्ष्य बनाया गया तथा पूर्व के नरसंहार में स्थानीय हिन्दुओं को चुन-चुनकर मारा गया । कश्मीर घाटी में किया गया हिन्दुओं के वंशविच्छेद का यह इतिहास न भूलें !
१. हिन्दुओं के नरसंहार का आरंभ वर्ष १९८९ में हुआ । घाटी के कश्मीरी पंडितों के सबसे बडे एवं प्रिय नेता थे टीकालाल टपलू । १४ सितंबर १९८९ को आतंकियों ने गोलियां मारकर उनकी हत्या की ।
२. ४ नवंबर १९८९ को उच्च न्यायालय के सामने न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की दिनदहाडे हत्या की गई; क्योंकि उन्होंने एक हत्या के प्रकरण में आतंकी मकबूल भट्ट को मृत्युदंड सुनाया था ।
३. आतंकियों ने बांदीपोरा में अध्यािपका गिरिजा टिकू को पकडकर उससे बलात्कार किया तथा उसके जीवित होते हुए ही आरे से उसके शरीर के २ टुकडे किए ।
४. २२ मार्च १९९० को अनंतनाग जिले के दुकानदार पी.एन. कौल की चमडी उधेडकर उन्हें मरणासन्न स्थिति में छोड दिया । तीन दिन उपरांत उनका शव मिला ।
५. ७ मई १९९० को प्राध्यापक एल. गंजू तथा उनके पत्नी की आतंकियों ने हत्या की । हत्या से पूर्व उनकी पत्नी के साथ बलात्कार किया गया । आतंकियों से बचने हेतु बी.के. गंजू चावल के एक बडे डिब्बे में छिप गए । आतंकियों ने उन्हें पूरे घर में खोजा; परंतु वे कहीं नहीं मिले । आतंकी जब उनके घर से निकल रहे थे, तब कुछ पडोसियों ने चावल के डिब्बे की ओर संकेत किया तथा आतंकियों ने उसी डिब्बे में गोलियां चलाकर उन्हें मार डाला । उसके उपरांत उनका रक्तमिश्रित चावल पकाकर उनकी पत्नी को खिलाया ।
६. वर्ष १९९८ में २३ कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या की गई । घाटी में हिन्दुओं के वापस लौटने की संभावना की पडताल करने गए शिष्टमंडल में वे सहभागी थे । उन सभी को एक ही आदेश पर एक ही राइफल से मार डाला गया । उसके उपरांत उनके मंदिर ध्वस्त कर उनके घरों में आग लगा दी गई ।
७. ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म की निर्मिति के शोधकार्य के समय पल्लवी जोशी को एक महिला ने बताया कि उसके पिता के १५ टुकडे कर जेलम नदी में फेंके गए ।
८. वर्ष २००३ में दक्षिण कश्मीर के पुलवामा क्षेत्र के नदिमार्ग गांव में २४ कश्मीरी पंडितों की गोलियां मारकर हत्या की गई थी । वे वो लोग थे, जिन्होंने ९० के दशक में अपना घर-बार छोडने से मना किया था । मृतकों में ७० वर्ष की एक महिला तथा २ वर्ष का एक नाती था ।


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