शिष्य को केवल गुरुकृपा से मोक्ष प्राप्त हो सकता है, यह बतानेवाला सनातन का ग्रंथ : गुरु-शिष्य परंपरा

गुरु का आचरण, कार्य एवं गुरुपरम्परा

गुरु का आचरण सामान्यतः कैसा होता है; शिक्षक, देवता और गुरु में क्या भेद है; अपने गुरु की अन्यों के गुरु से तुलना क्यों नहीं करनी चाहिए; गुरु अपने उपरान्त किसे गुरुपद (गुरुगद्दी) सौंपते हैं आदि प्रश्नों के उत्तर देकर जिज्ञासु एवं साधक की अध्यात्म-मार्ग पर होनेवाली यात्रा का वेग बढाने में सहायक ग्रन्थ !

गुरु का शिष्यों को सिखानाएवं गुरु-शिष्य सम्बन्ध

शिष्य को ज्ञान देने की दृष्टि से गुरु का क्या महत्त्व है, इसकी जानकारी देते हुए गुरु की शिष्यों को सिखाने की विविध पद्धतियां (उदा. विनोद से सिखाना, स्वप्न से सिखाना, सूक्ष्म से सिखाना) प्रस्तुत ग्रन्थ में उदाहरण सहित दी हैं ।

संकलनकर्ता : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवले एवं पू. संदीप आळशी
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सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।