‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ का आयोजन कर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने साधकों को भर-भरकर दिया है । उससे संबंधित आगे कुछ सूत्र दिए हैं । उन सूत्रों का अध्ययन कर साधक स्वयं में तीव्र साधना करने की लगन जागृत कर साधना का अगला स्तर प्राप्त करें ।
महोत्सव से प्राप्त सत्संग !

‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ दिव्य दैवी सत्संग था । इसलिए पहले हम सत्संग का महत्त्व समझ लेते हैं ।
१. सत्संग का महत्त्व
आरंभ में साधक साप्ताहिक सत्संग में जाने लगे, उस समय सत्संग का महत्त्व कुछ इस प्रकार बताया जाता था – ‘सत्संग में अनेक साधक एकत्रित होते हैं । उसके कारण वहां की सात्त्विकता बहुत बढी होती है । उस सात्त्विकता के कारण साधकों को सेवा एवं साधना करने के लिए प्रेरणा मिलती है; इसलिए हमें नियमितरूप से सत्संग में जाना चाहिए । सत्संग में एक प्रकार की ऊर्जा होती है, जिसका लाभ उठाकर साधक को साधना में आगे का स्तर प्राप्त करना संभव होता है ।’
२. सत्संग की श्रेष्ठता बतानेवाली कथा !
२ अ. वसिष्ठ ऋषि एवं विश्वामित्र ऋषि की कथा : ‘सत्संग श्रेष्ठ या तपस्या श्रेष्ठ ?’, इसका उत्तर समझने के लिए वसिष्ठ ऋषि एवं विश्वामित्र ऋषि अनेक देवताओं के पास जाते हैं । अंततः उन्हें बताया जाता है कि ‘इसका उत्तर शेषनाग देंगे ।’ उसके अनुसार शेषनाग के पास जाने पर वे शेषनाग से प्रश्न करते हैं, ‘‘सत्संग श्रेष्ठ है या तपस्या श्रेष्ठ ?’’ उस पर शेषनाग कहते हैं, ‘‘पहले आप मेरे मस्तक पर जो पृथ्वी का भार है, उसे थोडा हल्का कीजिए, उसके उपरांत मैं विचार कर उत्तर दूंगा ।’’ पौराणिक मान्यता यह है कि शेषनाग ने अपने मस्तक पर पृथ्वी को तोला है । शेषनाग के मस्तक पर पृथ्वी को भार हल्का करने हेतु विश्वामित्र ऋषि ने संकल्प लिया, ‘मैं मेरी १ सहस्र (हजार) वर्षाें की तपस्या का फल अर्पण करता हूं । पृथ्वी शेषनाग के मस्तक से थोडी ऊपर आए ।’ तब पृथ्वी बिल्कुल भी हिली नहीं । उसके उपरांत वसिष्ठ ऋषि ने संकल्प लिया, ‘मैं आधी घटिका के अर्थात १२ मिनट के सत्संग का फल अर्पण करता हूं । पृथ्वी अपना भार हल्का करे ।’ तब तुरंत ही पृथ्वी ऊपर उठ गई । इस कथा से ज्ञात होता है कि ‘तपस्या की अपेक्षा सत्संग का महत्त्व अधिक है ।’
२ आ. ‘सत्संग से घोर प्रारब्ध नष्ट होकर आगे की गति कैसे मिलती है ?’, इस विषय में नारद मुनि की कथा : एक बार नारद मुनि एक गांव से जा रहे थे, तब उनका ध्यान एक कीडे की ओर जाता है तथा तब वह कीडा बिना कोई हलचल कर मर जाता है । उसके कुछ दिन उपरांत जब वे एक वन से जा रहे होते हैं, तब उन्हें एक हिरनी का बछडा घास पर चरता हुआ दिखाई देता है । नारद मुनि जैसे ही उसकी ओर प्रेम की दृष्टि से देखते हैं, वह बछडा प्राण त्याग देता है । इससे नारद मुनि के मन में यह प्रश्न उठता है, ‘मेरी दृष्टि पडने पर इन दोनों की मृत्यु क्यों हुई ?’ तीसरे प्रसंग में एक राजपुत्र को आशीर्वाद देने हेतु जब वे एक राजमहल में जाते हैं, तब उन्हें देखकर राजपुत्र बहुत आनंदित होकर उनसे कहता है, ‘‘पिछले जन्म में जब मैं कीडा तथा हिरन था, उस समय आपके कुछ क्षणों के सत्संग से मुझे उन योनियों से मुक्ति मिली । अब आपकी कृपा से मुझे मनुष्यजन्म तथा उसमें भी राजपुत्र का जन्म मिला है । अब मैं अपने जीवन का सार्थक कर पाऊंगा !’’ तब नारद मुनि ने श्रीविष्णु के चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा, ‘हे प्रभो, मैंने तो उन दोनों पर मात्र सामान्य दृष्टि डाली थी; परंतु ‘सत्संग का फल कितना बडा होता है, यह मेरे ध्यान में आया ।’
३. ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में साधकों को प्राप्त दिव्य, दैवी एवं अमूल्य सत्संग !
३ अ. सत्संग का शब्दातीत लाभ : सप्ताह में एक बार प्राप्त सत्संग का साधकों को साधनावृद्धि के लिए बहुत लाभ मिलता है, जबकि ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में आए २५ से ३० सहस्र साधकों-धर्मप्रेमियों को प्रतिदिन १२ से १४ घंटों का ३ दिन का सत्संग प्राप्त हुआ, तो ‘इसका हमें कितना प्रचंड स्तर पर लाभ मिला होगा !’, यह ध्यान में आता है । सत्संग का यह लाभ शब्दातीत है ।
३ आ. ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ के सत्संग का दिव्यत्व !
१. वहां साधना करनेवाले सहस्रों साधक उपस्थित थे ।
२. महोत्सव स्थल पर ६० प्रतिशत तथा उससे अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त न्यूनतम १ सहस्र साधक उपस्थित थे ।
३. ‘संतों का सत्संग दुर्लभ होता है’, ऐसा शास्त्रवचन है । इस कार्यक्रम में सनातन के ५० से ६० संत एवं सद्गुरु, साथ ही अन्य संप्रदायों के मिलकर लगभग १०० संत उपस्थित थे ।
३ इ. देवी-देवताओं को स्थूल से तथा सूक्ष्म से सत्संग मिलना
१. जीवनाडी-पट्टिका में किए गए उल्लेख के अनुसार श्री महालक्ष्मीदेवी की अवतार श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीदेवी श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी महोत्सव में पूर्ण समय उपस्थित थीं ।
२. जीवनाडी-पट्टिका में किए गए उल्लेख के अनुसार श्रीविष्णु के अवतार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी पहले दिन से ही कार्यक्रम में उपस्थित थे ।
३. इस कार्यक्रम में सूक्ष्म से अनेक देवी-देवता, ऋषि-मुनि एवं दिव्यात्मा उपस्थित थे । कार्यक्रम स्थल पर श्री गणेश, श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्री दुर्गादेवी, श्री हनुमान, भगवान परशुराम, श्री कार्तिकस्वामी, श्री सातेरीदेवी इत्यादि अनेक देवताओं का तत्त्व आवश्यकता के अनुसार कार्यरत था, उसका भी लाभ उपस्थित सभी को मिला ।’
‘सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी की कृपा से हमें यह दिव्य सत्संग प्राप्त हुआ’, इसके लिए कितनी भी कृतज्ञता व्यक्त की जाए, अल्प ही है ।
– (सद्गुरु) राजेंद्र शिंदे
‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ की विशेषताएं
१. ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ अर्थात सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा) साधकों को प्रदान किया गया एक दिव्य सत्संग था । २. इस महोत्सव का भव्य आयोजन तथा वहां के कार्यक्रम, यह सबकुछ कल्पनाशक्ति से परे था । ३. वहां का वातावरण उच्च लोकों में स्थित वातावरण की भांति चैतन्यदायक एवं उत्साहवर्धक था । ४. ‘सनातन संस्था अब बहुत व्यापक एवं विशाल बन गई है’, इसकी प्रतीति करानेवाला यह कार्यक्रम ‘न भूतो न भविष्यति ।’, इस प्रकार से संपन्न हुआ । ५. यह कार्यक्रम हिन्दुत्वनिष्ठों को आगे का कार्य करने हेतु बहुत प्रेरणा देनेवाला तथा साधकों को आगे की दिशा देनेवाला सिद्ध हुआ । – (सद्गुरु) राजेंद्र शिंदे |
‘शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक बल’ मिलने हेतु संपन्न किए गए ‘श्री महाधन्वंतरि याग’ एवं ‘शतचंडी याग’ !

सांप्रतकाल समस्त विश्व के लिए अत्यंत अनिष्ट अर्थात आपातकाल ही है । विश्व पर युद्ध की छाया है । इस घनघोर आपातकाल में शत्रु केवल उनके हथियारों से ही नहीं, अपितु आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रोगों के जीवाणुओं के माध्यम से भी हम पर आक्रमण कर सकता है । ‘इन नई आपदाओं का सामना करने हेतु सभी का शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक बल अच्छा बना रहे’, इस उद्देश्य से १९.५.२०२५ को कार्यक्रम स्थल पर ‘श्री महाधन्वन्तरि याग’ का आयोजन किया गया था ।
शंखनाद महोत्सव के उपरांत ‘शतचंडी याग’ किया गया । इसमें आदिशक्ति के चरणों में ‘भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की विजय हो, साथ ही सैनिकों, साधकों, धर्मप्रेमियों के शरीर सहित उनके मन, बुद्धि एवं सूक्ष्म देह के सर्व ओर सुरक्षा-कवच तैयार हो । उन पर देवी की कृपादृष्टि एवं आशीर्वाद अखंडित बने रहें’, यह प्रार्थना कर यह याग संपन्न किया गया ।
ये दोनों याग सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी, श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी, श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी, साथ ही देवी-देवताओं एवं ऋषि-मुनियों के आशीर्वाद से संपन्न हुए । इन दोनों यागों का सभी को सभी स्तर पर हुआ लाभ उनकी साधना की तुलना में बहुत अधिक है ।
साधकों, कृतज्ञभाव से साधना के निम्न प्रयास करें !![]() १. साधना की गति बढाएं ! : उक्त सभी सूत्रों का अध्ययन करने पर यह ध्यान में आता है, ‘गुरुदेवजी ने इस कार्यक्रम से हमें इतना कुछ दिया है कि उसके लिए हमें उनके चरणों में अखंडित कृतज्ञभाव में ही रहना चाहिए ।’ इससे प्रेरणा लेकर अब हमें कृतज्ञभाव से हमारी साधना की गति बढानी चाहिए । २. व्यष्टि साधना गंभीरता से करें ! : महोत्सव में आए कुल साधकों में से केवल ५ प्रतिशत साधकों की साधना ही गुरुदेवजी को अपेक्षित हो रही है, यह अत्यंत गंभीर है । इससे ध्यान में आता है कि ‘प्रत्येक साधक को बहुत प्रयास करने पडेंगे ।’ हम गंभीरता से व्यष्टि साधना कर लगन से समष्टि साधना करेंगे ! ३. आपातकाल की दृष्टि से स्वयं में आमूल परिवर्तन आने हेतु प्रयास करें ! : केवल आगामी गुरुपूर्णिमा के लिए ध्येय न लेकर ‘कुल मिलाकर गति से साधना हो; इसके लिए आनेवाले काल के लिए मुझे क्या-क्या करना पडेगा, जिससे मुझमें आमूल परिवर्तन आएगा ?’, इसे ध्यान में रखकर प्रयास करने होंगे । ४. युद्ध स्तर पर साधना के निम्न प्रयास करें ! : साधना में आगे बढने हेतु बाधा बननेवाले स्वभावदोष एवं अहं के पहलुओं को अल्प करने हेतु अब कठोर प्रयास करने पडेंगे । जी हां, अब कठोर प्रयास ही करने पडेंगे; क्योंकि अब स्थूल से युद्ध आरंभ होने का शंखनाद हो चुका है, तो अब हमारे साधना के प्रयास भी युद्ध स्तर पर ही होने चाहिए । – (सद्गुरु) राजेंद्र शिंदे |
चैतन्य प्रदान करनेवाली प्रदर्शनियां !


‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में अत्यंत चैतन्यदायी एवं प्रेरणादायी प्रदर्शनियां थीं ।
१. १४ संतों एवं गुरुपादुकाओं की दिव्य प्रदर्शनी तथा सोरटी सोमनाथ स्थित दिव्य स्फटिक लिंग के दर्शन करवानेवाली प्रदर्शनी ।
२. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा ब्रह्मोत्सव के लिए उपयोग किए गए दिव्य चैतन्यदायी रथ की प्रदर्शनी ।
३. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं की प्रदर्शनी ।
यह देखने का दिव्य एवं दुर्लभ योग गुरुकृपा से अपने जीवन में आया । इस कार्यक्रम का हमें जैसे स्थूल स्तर पर बहुत लाभ हुआ, वैसे सूक्ष्म स्तर पर भी बहुत लाभ हुआ है ।
क्षात्रतेज बढानेवाले मार्गदर्शन, प्रदर्शनी एवं प्रदर्शन !अ. धर्म पर होनेवाले आघातों के विरुद्ध लडनेवाले प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठों का क्षात्रतेज से युक्त मार्गदर्शन हमें सुनने को मिला । आ. हमने इस महोत्सव में काल के अनुसार आवश्यक क्षात्रवृत्ति जागृत करनेवाले शस्त्रों की प्रदर्शनी देखी । इ. इस महोत्सव में हमें क्षात्रतेज जागृत करनेवाले युद्धकला एवं स्वरक्षा के प्रदर्शन भी देखने को मिले । काल के अनुसार आवश्यक क्षात्रतेज बढाने हेतु साधकों को इसका बहुत लाभ मिला । – (सद्गुरु) राजेंद्र शिंदे |
गुरुदेवजी द्वारा अनिष्ट शक्तियों के तीव्र आक्रमणों के कष्ट की आंच साधकों तक आने न देना
अनिष्ट शक्तियों का ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ को तीव्र विरोध था । इस कार्यक्रम में आई बाधाओं में से ८५ प्रतिशत बाधाएं अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण के कारण थीं । ८५ प्रतिशत जितना बडा यह कष्ट सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी ने दूर किया । गुरुदेवजी ने इस तीव्र कष्ट की आंच साधकों तक नहीं आने दी । उसके कारण सभी साधक शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर इस महोत्सव का लाभ उठा पाए । इसके कारण साधक आनंदावस्था में थे ।
सूक्ष्म स्तर पर साधकों को हुए लाभ का परीक्षण
१. सनातन की ज्ञानप्राप्तकर्त्री साधिका सुश्री मधुरा भोसले (आध्यात्मिक स्तर ६५ प्रतिशत) ने महोत्सव के किए सूक्ष्म परीक्षण के अनुसार ‘सूक्ष्म स्तर पर साधकों को इस महोत्सव का कितना लाभ हुआ है’, यह समझ में आ सकता है ।
२. ५.६.२०२५ को दैनिक ‘सनातन प्रभात’ में प्रकाशित श्री. अतुल दिघे के लेख के अनुसार सूक्ष्म स्तर पर साधकों को मिले लाभ !
अ. साधकों को सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के अस्तित्व का कुल ५० प्रतिशत लाभ उठाना संभव हुआ ।
आ. साधकों के एक-दूसरे के संपर्क में रहने से साधकों के बीच की संघभावना १५ प्रतिशत बढी ।
इ. महोत्सव में आए साधकों का प्रारब्ध २० प्रतिशत अल्प हुआ ।
ई. महोत्सव में आए साधकों के शारीरिक कष्ट ५ प्रतिशत, मानसिक कष्ट २० प्रतिशत तथा आध्यात्मिक कष्ट २५ प्रतिशत घट गए ।
उ. साधक महोत्सव में आए, उस दिन उनमें ५ प्रतिशत भाव था । तीसरे दिन इस भाव में २५ प्रतिशत वृद्धि हुई ।
ऊ. सर्व साधकों में १० प्रतिशत चैतन्य बढा । साधकों को ३० प्रतिशत आनंद मिला तथा ३ प्रतिशत साधकों ने शांति की अनुभूति की ।
वास्तव में देखा जाए, तो साधकों को इतने लाभ मिलने हेतु कितने वर्ष/जन्म साधना करनी पडती; परंतु गुरुकृपा से केवल ३ दिन के शंखनाद महोत्सव के कारण साधकों को उक्त लाभ हुए । प.पू. गुरुदेवजी की हम साधकों पर हुई यह अनंत अनंत अनंत कृपा ही है !
साधना की दृष्टि से आपातकाल का लाभ उठाने हेतु कठोर, लगन के साथ एवं समर्पित होकर प्रयास करने आवश्यक !
‘जन्म-जन्म के बंधनों को चलो तोड डालें ।
एक क्षण भी साधकों व्यर्थ न गंवाएं ।
यत्नों द्वारा साधना में पूर्णत्व पा लें ।।’
उक्त पंक्तियों के अनुसार साधना को पूर्णत्व की ओर ले जाने हेतु अब हमें कठोर, लगन के साथ, समर्पित होकर तथा अथक प्रयास करने आवश्यक हैं । अब घोर आपातकाल का आरंभ हो चुका है तथा यह एक संधिकाल भी है, अर्थात ही साधना की दृष्टि से स्वर्णिम काल आरंभ हुआ है; क्योंकि इस काल में की जानेवाली साधना अनेक गुना फलीभूत होनेवाली है ।
‘सभी साधकों को तीव्र गति से साधना करने की सद्बुद्धि मिले, साथ ही उसके अनुसार उनसे प्रयास हों’, यह मैं सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के चरणों में प्रार्थना करता हूं ।
इदं न मम ।’(यह लेखन मेरा नहीं है ।)
– (सद्गुरु) राजेंद्र शिंदे (आयु ६२ वर्ष), सनातन आश्रम, देवद, पनवेल (६.६.२०२५)
| इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । – संपादक
सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है । आध्यात्मिक कष्ट : इसका अर्थ है व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन होना । मंद आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन ३० प्रतिशत से अल्प होना । मध्यम आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है नकारात्मक स्पंदन ३० से ४९ प्रतिशत होना; और तीव्र आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है नकारात्मक स्पंदन ५० प्रतिशत अथवा उससे अधिक मात्रा में होना । आध्यात्मिक कष्ट प्रारब्ध, पितृदोष इत्यादि आध्यात्मिक स्तर के कारणों से होता है । किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक कष्ट को संत अथवा सूक्ष्म स्पंदन समझनेवाले साधक पहचान सकते हैं। सूक्ष्म परीक्षण : कुछ घटना अथवा प्रक्रिया के विषय में चित्त को (अंतर्मन को) जो अनुभव होता है, उसे ‘सूक्ष्म परीक्षण’ कहते हैं । बुरी शक्ति : वातावरण में अच्छी तथा बुरी (अनिष्ट) शक्तियां कार्यरत रहती हैं । अच्छे कार्य में अच्छी शक्तियां मानव की सहायता करती हैं, जबकि अनिष्ट शक्तियां मानव को कष्ट देती हैं । प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञों में राक्षसों ने विघ्न डाले, ऐसी अनेक कथाएं वेद-पुराणों में हैं । ‘अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर अनिष्ट शक्तियां, उदा. असुर, राक्षस, पिशाच को प्रतिबंधित करने हेतु मंत्र दिए हैं ।’ अनिष्ट शक्तियों से हो रही पीडा के निवारणार्थ विविध आध्यात्मिक उपचार वेदादि धर्मग्रंथों में वर्णित हैं । |


सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?