‘ओडिशा के श्री. अनिल धीर एक व्यावहारिक शोधकर्ता एवं लेखक हैं, जो उनके ऐतिहासिक शोध के लिए जाने जाते हैं । वे बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध समाज में जागृति लानेवाले ‘भारत रक्षा मंच’ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं । वे ऐतिहासिक धरोहरों का जतन करनेवाले ‘इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ (इंटैक) संस्था के ‘गवर्निंग काऊंसिल’ के मुख्य सदस्य हैं । इसके साथ ही वे प्राचीन मंदिरों, संस्कृति, सभ्यता एवं धरोहरों से संबंधित संस्थाओं के लिए कार्य करते हैं, साथ ही उनके संदर्भ में शोध भी करते हैं । उस माध्यम से वे मंदिरों की रक्षा एवं संवर्धन का कार्य करते हैं । उसके लिए उन्होंने पूरे भारत का लंबा भ्रमण किया है । श्री. धीर ने ओडिशा के इतिहास एवं संस्कृति के संदर्भ में लेखन किया है । उन्होंने ओडिशा के आदिवासियों तथा मछुआरों समुदाय में कार्य करते हुए संस्कृति के अनेक नए पहलुओं का शोध किया है । इस संदर्भ में उन्होंने ‘कंन्फ्लूएंसेस : जर्नी इन टू द हर्ट एंड सोल ऑफ ओडिशा’ नाम की पुस्तक लिखी है । उन्होंने कुल ११ पुस्तकें लिखी हैं तथा उनमें से कुछ पुस्तकें ओडिशा सरकार के राज्य अभिलेखा विभाग ने प्रकाशित की हैं ।

श्री. धीर महाविद्यालयीन जीवन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय थे । उन्होंने संघ के विभिन्न विभागों में काम किया है । वे ओडिशा राज्य के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘भारत इतिहास संकलन समिति’ के पदाधिकारी हैं । वे कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर की ‘सुरक्षा समिति’ के भी सदस्य हैं । वे अंग्रेजी साप्ताहिक ‘उदय इंडिया’ के विशेष प्रतिनिधि अर्थात एक शोध पत्रकार हैं । ‘देश में भग्न अवस्था में स्थित प्राचीन मंदिरों की संख्या बहुत बडी है । उनका जीर्णाेद्धार हो’, श्री. धीर की यही लालसा है ।

विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज के लिए उनके वीर सैनिकों द्वारा किया गया त्याग सर्वाेच्च है, उसी प्रकार से आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ तथा राष्ट्रप्रेमी नागरिक राष्ट्र-धर्म की रक्षा हेतु ‘वीर योद्धा’के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्मरक्षा के कार्य की जानकारी करानेवाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’ इस स्तंभ से अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से आपके मन की चिंता दूर होकर आप में उत्साह उत्पन्न होगा ! – संपादक
१. उच्च शिक्षा से लेकर मंदिरों की रक्षा तक की उनकी जीवनयात्रा
श्री. अनिल धीर मूलतः पंजाब के हैं; परंतु उनकी जन्मभूमि एवं कर्मभूमि ओडिशा ही रही है । श्री. अनिल धीर का जन्म वर्ष १९६१ में ओडिशा के कटक में हुआ है तथा वे ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में रहते हैं । ‘स्टीवर्ट स्कूल’ से शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की तथा उसके पश्चात उन्होंने भुवनेश्वर के उत्कल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया । वहां उन्होंने ८ वर्षाें तक अंग्रेजी साहित्य, इतिहास, मानववंशशास्त्र एवं समाजशास्त्र विषयों का गहन अध्ययन कर ३ स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त की हैं । इस अवधि में उन्होंने भुवनेश्वर ‘फ्लाईंग क्लब’ से निजी वैमानिक के रूप में अनुज्ञप्ति प्राप्त करने हेतु उडान प्रशिक्षण भी लिया है । वे धर्म एवं संस्कृति के क्षेत्र में निश्चित ही नहीं थे । वे कोलकाता के एक निजी वित्तीय प्रतिष्ठान में उपाध्यक्ष के पद पर काम कर रहे थे । ‘कॉर्पोरेट’ क्षेत्र में एक बडे पद पर रहते समय वर्ष २०१४ में उन्होंने प्राचीन एवं ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करने का निर्णय लिया । तब से लेकर वे प्राचीन मंदिरों से संबंधित शोध, उनकी रक्षा एवं उनके संवर्धन के लिए कार्य कर रहे हैं । इसमें सैकडों एकड भूमि में निर्मिति भव्य मंदिरों से लेकर जंगल में स्थित आदिवासियों के छोटे-छोटे मंदिरों का भी समावेश है । उन्होंने कोलकाता से जगन्नाथ पुरी तक की प्राचीन ‘जगन्नाथ सडक’ का शोध किया है, जिस पर प्राचीन काल में अनेक साधुसंतों ने भगवान जगन्नाथ की तीर्थयात्रा की थी ।
मंदिरों की रक्षा तथा उनके संवर्धन के कार्य में समर्पित होने की प्रेरणा

भुवनेश्वर को ‘मंदिरों का शहर’ कहा जाता है । सहस्रों मंदिर जहां स्थित हैं, उस भुवनेश्वर में आज भी ६०० से अधिक मंदिर अति प्राचीन हैं । श्री. धीर के घर का वातावरण आध्यात्मिक था । उन्हें विद्यालयीन जीवन से ही ओडिशा के मंदिरों में रुचि थी । उसके कारण वे खाली समय में मंदिरों के संवर्धन का कार्य करते थे । महाविद्यालयीन जीवन में उन्होंने इतिहास का अध्ययन किया है ।

वर्ष २०१२ में सनातन संस्था तथा उसके कार्य से उनका परिचय हुआ । उसके उपरांत वे सनातन के आश्रम में रहनेवाले विभिन्न संतों से मिले । उनके मार्गदर्शन से वे अत्यंत प्रभावित हुए । उसके उपरांत उन्होंने कोलकाता के एक वित्तीय प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष पद की नौकरी छोडकर मंदिरों के संवर्धन के लिए पूर्णकालीन समय देना सुनिश्चित किया । उसके पश्चात उन्होंने जगन्नाथ सडक परियोजना, प्राची घाटी में स्थित मंदिरों के संबंध में शोध तथा महानदी की धरोहर इत्यादि परियोजनाओं पर कार्य करना आरंभ किया । वे प्रतिवर्ष गोवा में आयोजित किए जानेवाले अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन में नियमित सहभागी होते हैं ।
२. प्राचीन मंदिरों एवं धरोहरों की रक्षा एवं संवर्धन

२ अ. ‘इंटैक’ संस्था के माध्यम से ६ सहस्र ५०० मंदिरों का शोध : भारतीय धरोहरों के राष्ट्रीय स्तर पर संवर्धन एवं जीर्णाेद्धार करने हेतु वर्ष १९८४ में ‘इंटैक’ (इंडियन नैशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) संस्था की स्थापना की गई । यह संस्था प्राचीन मंदिरों तथा राजमहलों के संवर्धन का कार्य करती है । इस संस्था के माध्यम से श्री. धीर ने ओडिशा के १७ जिलों में स्थित ३०० वर्ष पूर्व ६ सहस्र ५०० मंदिरों का शोध किया, जो अब भी जारी है ।
| Odisha – A Powerhouse of Indian Culture | Anil Dhir | #SangamTalks (सौजन्य : Sangam Talks) |
२ आ. प्राचीन मूर्तियों का पंजीकरण : आज वर्तमान में चुराई गई अनेक मूर्तियां वापस मिली हैं; परंतु वे कौन सी हैं, इसकी प्रविष्टियां न होने से वे प्रशासन के पास पडी हुई हैं । इसे ध्यान में लेकर श्री. धीर ने उन प्रत्येक मंदिर में स्थित मूर्तियों की पूरी जानकारी पंजीकृत करने का कार्य आरंभ किया है ।
२ इ. महानदी घाटी के ७०० वर्ष प्राचीन ६३ मंदिरों का शोध : श्री. धीर ने छत्तीसगढ से ओडिशा में बहनेवाली महानदी के दोनों तटों पर स्थित ४०० किलोमीटर के परिसर में बैलगाडी से सर्वेक्षण किया । उसमें उन्हें विगत ८० वर्षाें से पानी के नीचे दबे ७०० वर्ष से अधिक प्राचीन ६३ मंदिर मिले । पुरातत्त्व विभाग से उन्होंने उनमें से न्यूनतम २-३ मंदिरों को उठाकर बाहर निकालकर उनका जीर्णोद्धार करने की मांग की । भारत में जब नागार्जुन बांध का निर्माण हो रहा था, उस समय के पुरातत्व विभाग ने २ मंदिरों का अन्य स्थानों पर स्थानांतरण किया था । श्री. धीर को ऐसा लगता है कि वही प्रक्रिया इन मंदिरों के संदर्भ में भी हो ।
जगबंधु सिंह स्मृति पुरस्कार

प्रसिद्ध महान स्वतंत्रता सेनानी जगबंधु सिंह की १४७वीं जयंती के उपलक्ष्य में ‘ओडिशा साहित्य एकादमी’ एवं ‘जगबंधु सिंह मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से १५ फरवरी २०२३ को श्री. अनिल धीर को ९वां ‘जगबंधु सिंह स्मृति’ पुरस्कार प्रदान किया गया ।
२ ई. ‘प्राची घाटी के परिसर में स्थित मठों, मंदिरों इत्यादि का पंजीकरण : ‘प्राची’ नदी का उद्गम भुवनेश्वर से लगभग १० किलोमीटर की दूरी पर है । इस नदी के तट पर विकसित प्राचीन संस्कृति हडप्पा एवं मोहनजोदडो से भी प्राचीन मानी जाती है । ‘इंटैक’ संस्था ने प्राची घाटी के स्मारकों के पंजीकरण की परियोजना आरंभ की है । इस परियोजन के अंतर्गत प्राची नदी के ६० किलोमीटर तक के परिसर में ७वीं से १५वीं शताब्दियों में निर्मित मंदिरों, मठों, घाटों, वास्तुओं तथा अन्य प्राचीन ३५० से ४०० धरोहरों का पंजीकरण करने का कार्य श्री. अनिल धीर कर रहे हैं ।

३. भारतीय पशु कल्याण विभाग के ‘राज्य अधिकारी’ के पद पर नियुक्ति
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाले भारतीय पशु कल्याण विभाग ने श्री. अनिल धीर को ओडिशा के ‘राज्य कल्याण अधिकारी’ के पद पर नियुक्त किया है । इसके अंतर्गत ओडिशा के पशु कल्याण से संबंधित कानूनों का पालन सुनिश्चित करना, पशुकल्याण संगठनों को अनुदान देना तथा कल्याणकारी सूत्रों के विषय में केंद्र एवं राज्य सरकार को सुझाव देना उनका कार्य है ।
Temple Bonds : केन्द्र सरकार ‘टेम्पल बॉन्ड्स’ योजना लाने की तैयारी में !
मद्रास उच्च न्यायालय ने विद्यालय की भूमि पर चर्च के अनाधिकृत निर्माण पर रोक लगाई।
मृतक के नाम पर अभियोग चलाकर मंदिर प्रशासन के विरुद्ध अचलपुर के तहसीलदार के द्वारा दिया गया आदेश न्यायालय ने किया निरस्त ।
महाराष्ट्र में २ जून से आंदोलन, घंटानाद, महाआरती एवं हस्ताक्षर अभियान आरंभ होगा ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन