‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी श्रेष्ठतम गुरुपद पर विराजमान हैं । इस पद पर रहकर वे धर्मनिष्ठों को धर्मगुरु के रूप में, साधकों को मार्गदर्शक गुरु के रूप में, साधकों को सद्गुरु के रूप में, शिष्यों को आत्मगुरु के रूप में तथा विश्वगुरु के रूप पूरे विश्व का अविरत मार्गदर्शन कर रहे हैं । वे पूरे विश्व को आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान प्रदान करनेवाले ज्ञानगुरु तथा गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करनेवाले जीवों को जीवनमुक्ति दिलानेवाले तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले ‘मोक्षगुरु’ हैं । जब वे सनातन संस्था के ग्रंथों के संदर्भ में कार्य करते हैं, तब वे ‘ज्ञानगुरु’ बनकर इस अवतारी कार्य को पूर्णत्व की ओर ले जाते हैं । इस लेख में उनके ‘ज्ञानगुरु’ के रूप में दैवी कार्य का विस्तृत विवेचन किया गया है ।

१. प्रश्न
मेरे द्वारा ग्रंथलेखन का कार्य अधिक मात्रा में हो, इसके लिए ईश्वर मुझे सूक्ष्म का ज्ञान न देकर वह साधकों के माध्यम से दे रहे हैं । यह ऐसा क्यों है ?
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी (२.२.२०२५)
२. उत्तर

२ अ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ‘ज्ञानगुरु’ एवं ‘ग्रंथगुरु’ बनकर अखिल मावजाति का सर्वांगीण उत्कर्ष करेंगे ! : वर्तमान समय में पृथ्वी पर उपलब्ध अधिकांश धार्मिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान नष्ट हुआ है । उसके कारण स्थूल जगत सहित सूक्ष्म जगत के विषय का ज्ञान भी विलुप्त हुआ है । ‘पृथ्वीपर हिन्दू राष्ट्र की निर्मिति कर धर्मसंस्थापना करने के अवतारी कार्य को ज्ञानशक्ति का बल मिलकर यह अवतारी कार्य शीघ्र पूर्णत्व को पहुंचे’, इसके लिए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी सनातन के ग्रंथों का लेखन एवं संकलन कर पूरे विश्व को धर्मज्ञान, आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान दे रहे हैं । श्री गणेश प्रतिभा, प्रज्ञा, मेधा इत्यादि दैवी बुद्धियों के स्वरूप में, साक्षात माता सरस्वती ज्ञानगंगा के स्वरूप में अवतरित होकर सनातन के ग्रंथ तैयार कर रहे हैं । उसके कारण सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ग्रंथों के रूप में धर्म एवं अध्यात्म का मार्गदर्शन करनेवाले हैं । उसके कारण जिज्ञासु, मुमुक्षु, धर्माभिमानी, साधक, शिष्य, संत, सद्गुरु तथा परात्पर गुरुओं के द्वारा ‘गुरुकृपायोग’ के अनुसार अष्टांगयोग की साधना होकर व्यष्टि स्तर पर उनकी आध्यात्मिक उन्नति होगी । उसी प्रकार उन्हें ग्रंथों से पृथ्वी पर स्थापित धर्मराज्य अथवा हिन्दू राष्ट्र चलाने का मार्गदर्शन देकर वे उनसे समष्टि साधना करवाएंगे । इस प्रकार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ज्ञानगुरु एवं ग्रंथगुरु बनकर अखिल मानवजाति का सर्वांगीण उत्कर्ष करेंगे ।
२ आ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जब प्रश्न पूछते हैं, उस समय वे सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों में प्रश्नरूपी ज्ञानबीज का रोपण करते हैं, उस ज्ञानबीज को अंकुरित करते हैं तथा अंततः उसका उत्तरमय ज्ञानवृक्ष तैयार होता है ! : श्री गुरुकृपा के कारण सनातन के कुछ साधकों की बुद्धि सात्त्विक बनकर उनमें प्रतिभा, प्रज्ञा एवं मेधा ये सूक्ष्म बुद्धि के प्रकार जागृत हो रहे हैं । उसके कारण सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जब सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों से प्रश्न पूछते हैं, उस समय वे उन साधकों में प्रश्नरूपी ज्ञानबीज का रोपण करते हैं । उसके पश्चात वह ज्ञानबीज अंकुरित होकर उसका उत्तरमय ज्ञानवृक्ष तैयार होता है । श्री गुरुकृपा के कारण ही विश्वमन के साथ आंतरिक सान्निध्य होकर कोई कार्यक्रम, घटना अथवा धार्मिक अनुष्ठान का सूक्ष्म परीक्षण करना संभव होता है, साथ ही सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों का विश्वबुद्धि के साथ आंतरिक सान्निध्य होकर उन्हें धर्म एवं अध्यात्म से संबंधित प्रश्नों के सूक्ष्म से उत्तर मिलने लगते हैं ।
जिस प्रकार द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता विशद की तथा महर्षि व्यासजी ने श्री गणेश के माध्यम से उसका लेखन किया, उस प्रकार कलियुग में श्रीकृष्ण के अंशावतार ज्ञानगुरु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी साधकों को स्थूल से प्रश्न पूछते हैं तथा वे ही उन्हें सूक्ष्म से ज्ञान देकर उन्हीं प्रश्नों के उत्तर देते हैं । इसलिए स्थूल से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं’, ऐसा भले ही दिखाई न देता हो, तब भी वे ही साधकों को सूक्ष्म से ज्ञान देते हैं । सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधक तो केवल गुरुदेवजी द्वारा सूक्ष्म से दिया जानेवाला ज्ञान ग्रहण करनेवाले माध्यम हैं ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जब प्रश्न पूछते हैं, उस समय उनकी अवस्था ‘भक्त’ की (द्वैत की अवस्था) होती है; जब वे ज्ञान की सत्यता की पडताल करते हैं, उस समय उनकी द्वैत-अद्वैत अवस्था होती है । इसका अर्थ वे केवल भक्त एवं ईश्वर के मध्य की ‘कैवल्य मुक्ति’ की अवस्था में होते हैं । इसके साथ ही जब वे प्रश्न के उत्तर की पडताल कर ग्रंथ का संकलन करते हैं, उस समय उनकी अवस्था ‘ईश्वर’ की (अद्वैत की अवस्था) होती है ।’
२ इ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा सूक्ष्म ज्ञान के संदर्भ में की गई विभिन्न कृतियों के अनुसार उनकी गुणविशेषताएं !

२ ई. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजीरूपी ज्ञानावतार का ‘ज्ञानगुरु’ बनकर मार्गदर्शन किया जाना, ग्रंथगुरु बनकर चिरकाल अनुभूतियां देना तथा मोक्षगुरु बनकर साधकों को जीवनमुक्त बनाकर मोक्ष प्रदान करने’ का कार्य कलियुग के अंत तक कार्यरत रहेगा ! : ‘प्रश्न पूछने’ के माध्यम से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के द्वारा काल के अनुसार क्रियाशक्ति के स्तर का आवश्यक गुरुतत्त्व का तथा अवतारी कार्य हो रहा है । उनके द्वारा ज्ञानशक्ति के स्तर के ‘उत्तर प्राप्त करने’ का कार्य अपेक्षित न होने से, उन्हें ज्ञान से उत्तर नहीं मिलते । वे उत्तर सनातन के सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों को मिल रहे हैं ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?