
१. प.पू. डॉक्टरजी का स्वयं के प्रत्येक विचार एवं कृति की ओर ध्यान होना तथा उनके द्वारा उसी क्षण ही उचित विचार एवं कृति की जाना
‘गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करते समय प.पू. डॉक्टरजी ने साधकों को उनकी चूकों की ओर निरंतर ध्यान देने के लिए कहकर प्रति दो घंटे उपरांत सारणी में चूकें लिखने के लिए कहा है; परंतु प.पू. डॉक्टरजी की यह क्रिया निरंतर चलती रहती है तथा अज्ञानवश उन्हें उनका विचार अथवा कृति १ प्रतिशत भी यदि अनुचित लगी, तब भी वह तुरंत उनके ध्यान में आती है तथा वे उसी क्षण उसमें सुधार करते हैं, यह बात निम्न उदाहरण से ध्यान में आएगी ।
१ अ. साधक को उपायों के लिए कुर्ता देने के संदर्भ में प.पू. डॉक्टरजी की विचारप्रक्रिया तथा उससे उनके द्वारा की गई उचित कृति ! : ‘मेरे द्वारा उपयोग की गई वस्तुएं, उदा. कपडे, चादर, बॉलपेन इत्यादि का साधकों ने उपयोग किया, तो उनसे उन्हें चैतन्य मिलता है तथा अनिष्ट शक्तियों के कष्ट से ग्रस्त साधकों पर आध्यात्मिक स्तर के उपचार होते हैं’, ऐसा साधक विगत अनेक वर्षाें से अनुभव कर रहे हैं; इसलिए मैं उन्हें मेरे द्वारा उपयोग की गई मेरी पुरानी वस्तुएं देता हूं । एक बार अनिष्ट शक्तियों के तीव्र कष्ट से ग्रस्त एक साधक दूसरे गांव जानेवाला था । उसे उपचारों के लिए मेरा एक कुर्ता अथवा पजामा चाहिए था; परंतु मैंने अन्य साधकों को मेरा कुर्ता दिया था, उसके कारण मेरे पास उसे देने के लिए पुराना कुर्ता नहीं था । उस समय मुझमें विद्यमान मितव्ययता के कारण एक क्षण मेरे मन में विचार आया, ‘आज मैं इसे अन्य कुछ दे दूं ।’ उस समय तुरंत ही मुझे स्मरण हुआ कि जैसे द्रोपदी ने अपना मूल्यवान शालू (साडी) फाडकर उसका टुकडा श्रीकृष्ण की चोट लगी उंगली पर बांधा था, वैसे ही मैंने अपने नित्य उपयोग का नया कुर्ता उसे दे दिया ।’ – डॉ. आठवले (वैशाख कृष्ण द्वितीया, कलियुग वर्ष ५११२ [३०.४.२०१०])
१ आ. अन्यों की चूकों की ओर देखने के प.पू. डॉक्टरजी के दृष्टिकोण में होते गए परिवर्तन
१ आ १. वर्ष १९९९ तक : ‘किसी ने चूकें की, तो मुझे क्रोध आता था, उस समय मैं उस चूक की गंभीरता के अनुसार साधकों पर चिल्लाता था अथवा टोक देता था ।
१ आ २. वर्ष २००० से २००९ : किसी की चूक के कारण मेरी स्वयं की हानि हुई, तो मुझे थोडा क्रोध आता था; परंतु जब समष्टि की हानि होती थी, तब मुझे अधिक क्रोध आता था । उस समय में उस चूक की गंभीरता के अनुसार साधकों को टोकता था अथवा थोडा-बहुत चिल्लाता था ।
१ आ ३. वर्ष २०१० : २५.६.२०१० को मिरज से मुझे यह संदेश मिला कि भक्तियोग पर आधारित ग्रंथ के टंकण हेतु भेजे गए हस्तलिखितों के १०-१५ पृष्ठ खो गए हैं ।’ उस समय ‘अब इससे समष्टि को उन पृष्ठों पर अंकित लेखन पढने को नहीं मिलेगा अर्थात समष्टि की हानि हुई’, इस विषय में मुझे कुछ भी नहीं लगा’, इसका मुझे आश्चर्य हुआ । इस पर विचार करने पर मेरे क्रोधित न होने का कारण मेरे ध्यान में आया । वह कारण था, ‘ईश्वर को वह लेखन उस ग्रंथ में अपेक्षित नहीं है; इसलिए वे पृष्ठ खो गए ।’ अन्यों को मैं ‘ईश्वरेच्छा, साक्षीभाव, प्रारब्ध’ जैसे शब्द बताता रहता हूं; परंतु इस प्रसंग के माध्यम से मुझे उसका क्रियान्वयन करने को मिला; इसलिए अच्छा भी लगा ।
२.७.२०१० को मिरज से संदेश मिला । ‘खोए हुए हस्तलिखित मिल गए हैं ।’ उस समय मुझे यह ध्यान में आया कि ‘ऐसे प्रसंग में मुझे क्या लगेगा ? इसकी ईश्वर परीक्षा ले रहे थे ।’
– डॉ. आठवले (ज्येष्ठ पूर्णिमा, कलियुग वर्ष ५११२ [२६.६.२०१०])
उक्त दो उदाहरणों से यह ध्यान में आएगा, ‘प.पू. डॉक्टरजी ‘परात्पर गुरु’ पद पर विराजमान होते हुए भी, अपने विचार एवं कृति पर निरंतर ध्यान रखते हैं । इसलिए उनके विचार एवं कृतियां सदैव आदर्श ही होते हैं ।’
२. प.पू. डॉक्टरजी द्वारा छोटे-छोटे प्रसंगों की स्वयं के पास तिथि सहित प्रविष्टियां कर रखना
प.पू. डॉक्टरजी ने अपने जीवन की सभी महत्त्वपूर्ण घटनाओं की, सभी महत्त्वपूर्ण विचारों की, विचारों में आए परिवर्तनों की, महत्त्वपूर्ण कृतियों की तथा अनुभवों की तिथि के अनुसार प्रविष्टियां कर रखी हैं । इस प्रकार किसी अवतार, संत अथवा सद्गुरु ने ऐसी प्रविष्टियां कर रखी हैं, ऐसा देखने को नहीं मिलता ।
३. प.पू. डॉक्टरजी के चित्त पर स्थित रुचि-अरुचि केंद्र का लय होना
९५ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर को तथा ‘परात्पर गुरु’ के रूप में कार्यरत होते समय मोक्षप्राप्ति की यात्रा में चित्त पर स्थित एक-एक संस्कार सदा के लिए मिट जाता है । उसके कौतुहल के कारण मैंने १८.९.२०२३ से दूरभाष पर गुरुदेवजी से पूछा कि ‘उनके खान-पान की कितनी रुचि-अरुचि शेष रह गई हैं ?’ उस समय उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘पहले मुझे श्रीखंड प्रिय था, वह अब खाने की इच्छा नहीं होती; क्योंकि निरंतर आनंदावस्था में होने के कारण उसके सामने रुचि संजोने में विशेष आनंद प्रतीत नहीं होता । जो भोजन सामने आता है, उसमें उतना ही आनंद होता है; परंतु तीखे पदार्थ खाने की इच्छा नहीं होती और बचपन से अप्रिय दूध पर आनेवाली मलई के बारे में अभी भी लगता है कि ‘न हो तो ही अच्छी ।’’ इसका अर्थ बचपन से प्रिय बातों के संस्कार पहले दूर होते हैं; परंतु अप्रिय अन्नपदार्थाें के संस्कार शीघ्र दूर नहीं होते, साथ ही जिससे शरीर को कष्ट होगा, ऐसे पदार्थ अंत तक अप्रिय लगते हैं ।
– (सद्गुरु) डॉ. वसंत बाळाजी आठवले (सद्गुरु [स्व.] अप्पाकाका, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के बडे भाई), चेंबूर, मुंबई. (२१.९.२०१३)

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