सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के वास्तु के संदर्भ में विचार

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

यदि देवत्व का अपमान न हो, तभी घर को देवता का नाम दें !

‘कुछ लोग साधकों से पूछते हैं कि ‘क्या नए घर को नाम देने का कोई शास्त्र है ?’ देवताओं के नाम सबसे अधिक सात्त्विक एवं चैतन्ययुक्त होते हैं । इसलिए घर को देवता का नाम देना सबसे यथार्थ सिद्ध होता है । ‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध एवं उनसे संबंधित शक्तियां एकत्रित होती हैं’, यह अध्यात्मशास्त्र का सिद्धांत है । इसलिए घर को देवता का नाम देने के उपरांत घर में देवता के नाम के साथ उनका स्पर्श, रूप, रस, गंध तथा उनसे संबंधित शक्ति एकत्रित होती है । ऐसे घर में अस्वच्छता होना, वस्तुएं पटकना, झगडे होना, रज-तमप्रधान संगीत सुनना, मांसाहार करने जैसे अनुचित कृत्यों के कारण घर में विद्यमान देवत्व का अनादर होता है । घर को देवता का नाम देनेवालों ने घर की पवित्रता को देवालय की भांति बनाए रखा, तभी उनकी साधना होती है ।’

घर अथवा सदनिका खरीदते समय  उसमें विद्यमान स्पंदन अच्छे हों, तभी उन्हें खरीदें !

‘कोई घर अथवा सदनिका खरीदते समय वह किस क्षेत्र में है ? वह इमारत कितनी पुरानी है ? उसके निर्माणकार्य की गुणवत्ता कैसी है ? उसका मूल्य कितना है ? इत्यादि सूत्रों पर विचार करने के साथ ही ‘क्या उस वास्तु में कष्टदायक स्पंदन तो नहीं हैं ? तथा ‘क्या वहां के स्पंदन अच्छे हैं ?’, इन सूत्रों पर प्रधानता से विचार करें । स्पंदन अच्छे न हों; परंतु ‘अन्य सभी घटक पूरक हैं’, ऐसा हो; तब भी वह वास्तु न खरीदें । वास्तु में स्पंदन अच्छे न हों, तो उससे कष्ट होगा । मन का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहेगा । शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहेगा । वास्तु में अच्छे स्पंदन न होने से शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, आध्यात्मिक इत्यादि सभी विषयों के संदर्भ में कष्ट की संभावना होती है । उस कष्ट के निवारण हेतु अनेक अनुष्ठान करने पडते हैं, साथ ही उसमें बहुत सी साधना व्यर्थ हो जाती है तथा इसमें अनेक वर्ष व्यर्थ निकल जाते हैं ।

आपके वास्तु में थोडे से अथवा मध्यम कष्टदायक स्पंदन हों, तो उसके लिए उपाय करें; परंतु कष्ट यदि तीव्र हो, तो उस वास्तु को छोडकर अन्य कहीं रहने के लिए जाएं ।’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले