पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृतप्राप्ति के लिए देव-दानवों में लगातार बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था । ज्योतिष बताता है कि देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के बराबर होते हैं । इसलिए कुम्भ भी बारह ही होते हैं, परंतु उनमें से केवल चार पृथ्वी पर होते हैं तथा शेष आठ देवलोक में होते हैं । इनका लाभ देवता ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्य नहीं ।
ऐसे होती है गणना
कुम्भ की गणना एक विशेष विधि से होती है, जिसमें गुरु का अत्यंत महत्व है । नियमानुसार गुरु एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है । यानी बारह राशियों में भ्रमण करने में उसे १२ वर्ष की अवधि लगती है । यही कारण है कि प्रत्येक बारह वर्ष बाद कुम्भ उसी स्थान पर वापस आता है, अर्थात प्रत्येक बारह वर्ष में कुम्भ आयोजन स्थल दोहराया जाता है । इसी प्रकार गणना के अनुसार कुम्भ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुम्भ का अयोजन किया जाता है ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?