पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृतप्राप्ति के लिए देव-दानवों में लगातार बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था । ज्योतिष बताता है कि देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के बराबर होते हैं । इसलिए कुम्भ भी बारह ही होते हैं, परंतु उनमें से केवल चार पृथ्वी पर होते हैं तथा शेष आठ देवलोक में होते हैं । इनका लाभ देवता ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्य नहीं ।
ऐसे होती है गणना
कुम्भ की गणना एक विशेष विधि से होती है, जिसमें गुरु का अत्यंत महत्व है । नियमानुसार गुरु एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है । यानी बारह राशियों में भ्रमण करने में उसे १२ वर्ष की अवधि लगती है । यही कारण है कि प्रत्येक बारह वर्ष बाद कुम्भ उसी स्थान पर वापस आता है, अर्थात प्रत्येक बारह वर्ष में कुम्भ आयोजन स्थल दोहराया जाता है । इसी प्रकार गणना के अनुसार कुम्भ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुम्भ का अयोजन किया जाता है ।

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