सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों का साधना के विषय में किया गया अमूल्य मार्गदर्शन !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

१. साधना के प्रयास करने पर ही भाव का अनुभव किया जा सकता है !

एक साधक : ‘मुझे इस सत्संग में उपस्थित रहने का अवसर मिला’, इसके लिए मैं कृतज्ञ हूं । मेरे मन में अनेक शंकाएं थीं । यहां सहसाधकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों से मेरी अधिकांश शंकाओं का समाधान हुआ है । इस सत्संग में आने से पूर्व मुझे बिल्कुल भी भाव अनुभव नहीं हो रहा था । ‘भाव कैसे अनुभव करूं ?’, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था । उसके कारण मैंने यह सुनिश्चित किया कि सत्संग में यही प्रश्न पूछेंगे; परंतु मैं इस सत्संग में आया तथा मुझे भाव अनुभव होने लगा । इसलिए मुझे लग रहा है कि अब ‘मेरे मन की सभी शंकाएं दूर हो गई हैं ।’

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : भाव बौद्धिक स्तर पर अथवा केवल शब्दों में व्यक्त नहीं किया जाता । जो बातें बुद्धि के स्तर की होती है, उन्हें हम शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं; परंतु भाव आध्यात्मिक स्तर का है, इसलिए व्यक्ति को स्वयं उसका अनुभव करना पडता है । यह कब साध्य होता है ? व्यक्ति जब अच्छी साधना करता है, नामजप करता है, सेवा करता है; उस समय व्यक्ति में अपनेआप ही भाव उत्पन्न होता है । अच्छा है, ‘आप भाव का अनुभव कर सके ।’

२. साधना में आनेवाली बाधाओं पर विजय प्राप्त करने हेतु संतों अथवा सहसाधकों से सहायता लें !

एक साधक : कुल मिलाकर ‘साधना के प्रयासों में मेरा पतन हुआ है’, ऐसा मुझे लगता है । साधना में संकट की अनेक सूचनाएं मुझे मिल रही हैं । मेरी बुद्धि को समझ में आता है कि ‘मुझसे हो रही चूकों के लिए मुझे स्वसूचनाएं लेनी चाहिए’; परंतु मुझसे उस दिशा में प्रयास नहीं होते । बौद्धिक स्तर पर आनेवाली बाधाओं के कारण मेरा मन भी साधना की दृष्टि से उचित कृति नहीं करता । मैं इस बाधा को कैसे दूर करूं ?

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : प्रत्येक छोटी-छोटी बात भी संतों से अथवा सहसाधकों से पूछें । इससे आप इन बाधाओं को शीघ्र दूर कर पाएंगे । आपकी साधना में जिसके कारण बाधा आ रही है, उस पर आप स्वसूचनाएं दें, जिससे आपको उसका भान होगा । आप अपने मन की सभी बाधाएं लिखें तथा उस विषय में संतों अथवा सहसाधकों से बात करें । वे प्रत्येक सूत्र के विषय में आपको विस्तार से समझाएंगे । हमें आनेवाली बाधाओं के लिए स्वयं ही चिंतन कर समय व्यर्थ गंवाने की आवश्यकता नहीं है । आपकी सहायता के लिए अन्य साधक हैं न ? जब आप घर पर अकेले होते हैं, उस समय मन की बाधाओं को दूर करने के लिए आपको स्वयं ही प्रयास करने पडते हैं; परंतु जब आप सहसाधकों के साथ होते हैं, तब आप उनकी सहायता लें । ऐसा करने से आप उन बाधाओं को शीघ्र ही दूर कर पाएंगे ।

३. साधना के किसी सूत्र के विषय में निश्चिति न हो, तो संतों अथवा सहसाधकों से पूछें !

एक साधक : एक अंतिम प्रश्न है । कभी-कभी मेरे विचारों में सुस्पष्टता नहीं होती । ‘वर्तमान में जो भी नामजपादि उपचार कर रहा हूं, उतना पर्याप्त नहीं है’, ऐसा मुझे लगता है । मुझे ऐसा लगता है कि नामजपादि उपचार और बढाने चाहिए; परंतु इस विषय में निश्चित रूप से मैं समझ नहीं पा रहा हूं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : निश्चिति न हो, तो आप संतों अथवा सहसाधकों से पूछकर निश्चिति कर लें । अध्यात्म में अधिक विचार कर स्वयं कोई भी निष्कर्ष नहीं निकाला जाता । ‘हमारे उत्तर उचित हैं अथवा अनुचित ?’, यह हमें ज्ञात नहीं होता । अतः ‘किसी से पूछना’ ही सबसे अच्छा विकल्प है ।

एक साधक : जी हां ! परमपूज्य जी ! मैं पूछूंगा ।