महाशिवरात्रि निमित्त… फाल्गुन कृ. १३ (८ मार्च)

शिवतत्त्व का लाभ करानेवाले प्रमुख व्रत एवं उत्सव
प्रदोष व्रत
तिथि : प्रत्येक माह की शुक्ल एवं कृष्ण त्रयोदशी पर सूर्यास्त उपरांत के तीन घटकों के काल को प्रदोष कहते हैं । ‘प्रदोषो रजनीमुखम् ।’
व्रत करने की पद्धति : इस तिथि पर दिनभर उपवास एवं उपासना कर, रात को शिवपूजा उपरांत भोजन करें । प्रदोेष के अगले दिन श्रीविष्णुपूजन अवश्य करें । संभवतः इस व्रत का प्रारंभ उत्तरायण में करें । यह व्रत तीन से बारह वर्ष की अवधि का होता है । कृष्ण पक्ष का प्रदोष यदि शनिवार को हो, तो उसे विशेष फलदायी मानते हैं ।
निषेध : विधान है कि प्रदोषकाल में वेदाध्ययन नहीं करना चाहिए; क्योंकि यह रात्रिकाल का व्रत है और वेदाध्ययन तो सूर्य के रहते करना चाहिए ।
प्रकार : प्रदोष व्रत के चार प्रकार हैं – सोमप्रदोष, भौमप्रदोष, शनिप्रदोष एवं पक्षप्रदोष ।
हरितालिका
तिथि : भाद्रपद शुक्ल तृतीया
इतिहास एवं उद्देश्य : पार्वती ने यह व्रत रखकर शिवजी को पति के रूप में प्राप्त किया था; इसलिए मनपसंद वर पाने के लिए, साथ ही अखंड सौभाग्य प्राप्ति के लिए स्त्रियां यह व्रत रखती हैं ।
व्रत करने की पद्धति : प्रात:काल मंगलस्नान कर पार्वती एवं उसकी सखी की मूर्ति लाकर उस शिवलिंग सहित उनकी पूजा की जाती है । रात को जागरण करते हैं । अगले दिन सवेरे उत्तरपूजा कर लिंग एवं मूर्ति विसर्जित करते हैं ।
श्रावण सोमवार और कार्तिक सोमवार
अन्य देवताओं की अपेक्षा श्रीविष्णु एवं शिव का विशेष महत्त्व होने से श्रीविष्णु की भांति शिव के भी और दो त्योहार हैं – श्रावण सोमवार और कार्तिक सोमवार । इनमें श्रावण सोमवार दयास्वरूप, जबकि कार्तिक सोमवार न्यायस्वरूप त्योहार है । श्रावण मास से कार्तिक मास तक घर के भीतर ही दानधर्म करना होता है, जबकि कार्तिक मास से श्रावण मास तक दानधर्म बाहर करना होता है । तीर्थयात्रा इत्यादि भी कार्तिक से श्रावण के मध्य करनी होती है ।
श्रावणी सोमवार एवं शिवमुष्टिव्रत
श्रावणी सोमवार : श्रावण महीने में हर सोमवार शंकरजी के मंदिर जाकर उनकी पूजा करें और संभव हो, तो निराहार उपवास रखें अथवा नक्त व्रत रखें । मान्यता है कि इससे शंकरजी प्रसन्न होते हैं और शिवसायुज्य मुक्ति मिलती है ।
शिवमुष्टिव्रत : महाराष्ट्र में विवाह के उपरांत पहले पांच वर्ष क्रम से ये व्रत किए जाते हैं । इसमें श्रावण के प्रत्येक सोमवार एकभुक्त रहकर शिवलिंग की पूजा करने की और चावल, तिल, मूंग, अलसी एवं सत्तू (पांचवा सोमवार आए तो) के धान्य की पांच मुट्ठी देवता पर चढाने की विधि है ।
शिवपरिक्रमा व्रत
यह एक काम्य व्रत है ।
तिथि : वैशाख, श्रावण, कार्तिक अथवा माघ में से किसी एक माह में यह व्रत करते हैं ।
व्रत की पद्धति : व्रत की दीक्षा लेकर शिवपूजा कर शिवलिंग की एक लाख परिक्रमा करना, इस व्रत की प्रधान विधि है । परिक्रमा पूर्ण होने पर व्रत का उद्यापन करते हैं । उद्यापन के समय उमा-महेश्वर की स्वर्णप्रतिमा की पूजा तथा होम करते हैं । तदुपरांत ब्राह्मणभोजन करवाकर सर्व पूजा के उपकरण ब्राह्मण को दान करते हैं ।
निषेध : दान लेना, परान्न भक्षण करना, असत्य बोलना, शिव एवं श्रीविष्णु जैसे देवताओं के निंदकों से संबंध रखना इत्यादि व्रतकाल में वर्जित हैं ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान शिवकी उपासना का अध्यात्मशास्त्र’)
भगवान शंकर की कृपा से आवश्यक ज्ञान प्राप्त हो, यही प्रार्थना !
मृत्युञ्जयाय रुद्राय नीलकण्ठाय शम्भवे ।
अमृतेशाय शर्वाय महादेवाय ते नम: ॥
अर्थ : मृत्युंजय, रुद्र (वे, जिनका असुरों को भय लगता है), नीलकण्ठ, शम्भु (कल्याणकारी), अमृतेश (अमृत के स्वामी), शर्व (मंगलमय), महादेव (देवताओं में श्रेष्ठ), ऐसे विविध नामोंवाले भगवान शंकर को मैं वंदन करता हूं ।
पशुपतिनाथ
१. इतिहास
काठमांडू (नेपाल) स्थित शिवलिंग को पशुपतिनाथ कहते हैं । ऐसी कथा है कि पशुपतिनाथ ने महिष का रूप लिया था । इस महिष का धड केदारनाथ (हिमालय, हिन्दुस्थान) और सिर पशुपतिनाथ में माना जाता है ।
२. शिवलिंग की कुछ विशेषताएं
यह शिवलिंग स्वयम्भू है । पशुपतिनाथ की पिण्डी साधारणतः चार हाथ उंची है । उसपर चतुर्मुख शिवलिंग है । उन चारों मुखों पर मुखौटे लगाए गए हैं । मध्य मुख, पांचवां मुख माना जाता है । (ये पांच मुख पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश, इन पंचमहाभूतों से संबंधित माने जाते हैं । – संकलनकर्ता)
३. विशिष्ट पूजा
नेपाल नरेश के कुलदेवता पशुपतिनाथ की नित्य त्रिकाल पूजा होती है । अभिषेक के पश्चात देवता के मस्तक पर स्थित श्रीयंत्र निकालकर उसकी पूजा की जाती है । प्रत्येक पूर्णिमा पर भी मंदिर में विशेष पूजा होती है ।
४. परिसर के अन्य मंदिर
श्री गुह्येश्वरीदेवी पशुपतिनाथ की पत्नी हैं । उनका मन्दिर मुख्य मन्दिर के पास स्थित है । उसके निकट ही कालभैरव का स्थान है । उसी प्रकार विश्वरूप, गोरखनाथ आदि देवताओं के मन्दिर भी पशुपतिनाथ मन्दिर परिसर में है । पशुपतिनाथ यात्रा महापुण्यदायी मानी जाती है ।
‘शिव’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ
१. शिव शब्द ‘वश्’ शब्द के व्यतिक्रम से अर्थात अक्षरों के क्रम परिवर्तित करने से बना है । ‘वश्’ अर्थात प्रकाशित होना, अर्थात शिव वह है जो प्रकाशित है । शिव स्वयंसिद्ध एवं स्वयंप्रकाशी हैं । वे स्वयं प्रकाशित रहकर संपूर्ण विश्व को भी प्रकाशित करते हैं ।
२. शिव अर्थात मंगलमय एवं कल्याणस्वरूप तत्त्व ।
३. शिव अर्थात ब्रह्म एवं परमशिव अर्थात परब्रह्म ।
आज्ञाचक्र के अधिपति
शिवजी आज्ञाचक्र के अधिपति हैं । शिव आदिगुरु हैं । गुरुसेवा करनेवाले शिष्य का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण है ‘आज्ञापालन’ । इस दृष्टि से आज्ञाचक्र के स्थान पर विद्यमान शिवजी का स्थान एक प्रकार से शिव के गुरुत्व की ही साक्षी देते हैं । शिव के तीसरे नेत्र (ज्ञानचक्षु) का स्थान भी यही है ।
महाशिवरात्रि पर शिवतत्त्व आकर्षित करनेवाली सात्त्विक रंगोलियां बनाएं !
यहां दी रंगोलियां भगवान शिव का तत्त्व आकर्षित एवं प्रक्षेपित करती हैं, जिससे वातावरण शिवतत्त्व से भारित होता है तथा सबको उसका लाभ होता है ।


(संदर्भ : सनातन का लघुग्रंथ ‘सात्त्विक रंगोलियां’)



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