आपातकाल में रक्षा हेतु आवश्यक अग्निहोत्र !त्रिकालदर्शी संतों ने बताया है कि अब आगे भीषण आपातकाल है, जिसमें पूरे विश्व की बडी जनसंख्या समाप्त होनेवाली है । तीसरे महायुद्ध में अणुबम के किरणोत्सर्ग से प्रदूषण होनेवाला है । इस युद्ध में बचना हो, तो उन अण्वस्त्रों से उत्सर्जित होनेवाले किरणोत्सर्ग को नष्ट करनेवाले उपाय भी चाहिए । उसके लिए ऋषि-मुनियों ने यज्ञ का प्रथमावतार अर्थात ‘अग्निहोत्र’ उपाय बताया है । |

धनबाद (झारखंड) – अग्निहोत्र का महत्त्व जानकर, प्रतिदिन यह सरल यज्ञ करने हेतु समिति द्वारा विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया । कार्यक्रम में हमें प्रतिदिन अग्निहोत्र क्यों करना चाहिए, अग्निहोत्र किस प्रकार से करते हैं, वातावरण पर अग्निहोत्र का क्या प्रभाव पडता है, आदि विषयों की शास्त्रीय जानकारी दी गई । वेदों ने अग्नि को ‘दैवी शक्ति का मुख’ अथवा ‘हव्यवाहन’ भी संबोधित किया है । जैसे किसी को कोई पदार्थ खाने की इच्छा हो, तो सहज मुख में डालकर ही उसे खाया जा सकता है, उसी प्रकार किसी भी देवता को उद्देशित कर दिया जानेवाला हविर्भाग अग्नि को ही अर्पित करना होता है । अग्निहोत्र अर्थात अग्न्यन्तर्यामी आहुति अर्पण कर की जानेवाली ईश्वरीय उपासना । अग्निहोत्र आकाशमंडल में निहित सूक्ष्म दैवी तत्त्वों को जागृत कर उनकी तरंगों को भूमंडल पर आकर्षित करने का एक प्रभावशाली माध्यम है । इसमें अग्निहोत्र का महत्त्व एवं विधि भी बताई गई ।
कार्यक्रम में कतरास, धनबाद, रांची, जमशेदपुर, हजारीबाग, कोलकाता एवं पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्रों से जिज्ञासु सहभागी हुए थे । इस कार्यक्रम में धर्मप्रेमी श्रीमती रंजना वर्मा ने विषय रखा ।
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