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नई देहली : यहां के साकेत न्यायालय ने, ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप १९९१’ कानून के आधार पर, देहली के कुतुबमिनार में २७ हिन्दू और जैन मंदिरों में पूजा का अधिकार मांगनेवाली याचिका अस्वीकार की। इस पर हिन्दुत्वनिष्ठ अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने इस निर्णय को देहली उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही है।

Delhi court rejects petition seeking restoration of 27 Hindu, Jain temples inside Quwwat Ul-Islam mosque at Qutub Minar complex: Detailshttps://t.co/OdphZBWUi3
— OpIndia.com (@OpIndia_com) December 10, 2021
इस कानून के अनुसार, “स्वतंत्रता-पूर्व काल में, भारत में धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी, वह स्थाई रखी जाए”, ऐसा कहा गया है। इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाएगा। केवल श्रीराम जन्मभूमि का प्रकरण ही इसके लिए अपवाद था !
१. न्यायालय ने कहा, कि अतीत में की गई चूकें, वर्तमान और भविष्य में शांति भंग करने का आधार नहीं बन सकतीं। यदि सरकार ने किसी भी स्थल को स्मारक के रूप में घोषित किया, तो लोग वहां धार्मिक कृत्य करने की अनुमति नहीं मांग सकते !
२. पिछले वर्ष प्रविष्ट की गई इस याचिका में कहा गया था, कि कुतुबमिनार के परिसर में हिन्दूओं और जैनों के २७ मंदिर हैं ; इसलिए, वहां पूजा करने की अनुमति दी जाए। यहां जैन तीर्थंकर ऋषभदेव, साथ ही, भगवान विष्णु ये प्रमुख मंदिर थे। इसके साथ ही, श्रीगणेश, भगवान शिव, श्री पार्वतीदेवी, श्री हनुमान आदि देवताओं के भी मंदिर थे। इन मंदिरों को गिराकर, वहां मस्जिद बनाई गई है। यहां पुनः देवताओं की मूर्तियों की स्थापना कर, हिन्दुओं को वहां पूजा का अधिकार दिया जाए।
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