गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में सनातन के ३ गुरुओं के संदेश !

जैसा कि अनेक दृष्टाओं और संतों ने बताया था, आपातकाल आरंभ हो चुका है । आगे आनेवाले अत्यंत भीषण आपातकाल से तरने के लिए ‘ईश्वर की भक्ति करना’, यही एकमात्र उपाय (समाधान) है !
भक्ति की पहली सीढी है, जीवन में प्रत्येक कर्म करते समय ईश्वर के प्रति अंतःकरण में भाव उत्पन्न करना । इसके लिए नित्य साधना करना आवश्यक होता है । गुरुचरणों की सेवा करते समय गुरु के सान्निध्य में जीव के अंतःकरण में देवता के प्रति स्वतः भाव उत्पन्न होता है । इसके लिए अलग से प्रयत्न नहीं करने पडते । गुरुचरणों को न छोडना, यह प्रत्येक जीव के जीवन का अंतिम ध्येय होना चाहिए । कुछ लोग कहेंगे, ‘हमारे गुरु नहीं हैं ।’ तब ‘इष्टदेवता ही हमारे गुरु हैं’, ऐसा भाव रखना चाहिए । इससे हमारा संपूर्ण जीवन ही बदल जाता है । ‘जहां भाव वहां भगवान’ इस उक्ति के अनुसार निरंतर भगवान के आंतरिक सान्निध्य में रहा जा सकता है ।
आंतरिक सान्निध्य का जीवन में अनन्यसाधारण महत्त्व है । आंतरिक सान्निध्य के कारण जीव को माया का विस्मरण हो जाता है और उसके लिए जीवन ‘आध्यात्मिक आनंद का सागर’ बन जाता है । इससे वर्तमान में उस पर कितने भी संकट आएं, तो भी वह उनका हंसते-हंसते सामना करता है । इसे ही ‘ईश्वरकृपा होना’ अथवा ‘गुरुकृपा होना’ कहते हैं ।
मन में ईश्वर के प्रति अथवा गुरु के प्रति भाव होगा, तो ‘सबकुछ ईश्वर की इच्छा से ही हो रहा है’, ऐसी श्रद्धा मन में उत्पन्न होती है । आपातकाल में यही श्रद्धा और भक्ति हमारे जीवन का आधार बनती है । श्रद्धा और भक्ति के बिना जीवन की नौका मार्ग से भटक जाती है ।
आपातकाल में भावभक्ति के सहारे ही हम तर सकते हैं । संतों का कहना है कि ‘तीसरा विश्वयुद्ध भयंकर होगा ।’ उसके लिए पहले से ही मन और बुद्धि की तैयारी करना आवश्यक है । ‘नित्य साधना करना’, यही उसका एक उत्तम उपाय है ।
इस गुरुपूर्णिमा पर गुरु की शरण जाकर व्यष्टि और समष्टि साधना का उचित समन्वय करने का प्रयत्न करते हुए तीव्र साधना करने का संकल्प करें । ऐसा श्रद्धा रखें कि गुरु निश्चित ही हमें इस कठिन काल में तारेंगे ।
आपातकाल की स्थूल तैयारी के साथ ही, भाव, त्याग, शरणागति और अहं-निर्मूलन के माध्यम से आत्मिक तैयारी भी करें । इस गुरुपूर्णिमा पर ऐसा करने का दृढ संकल्प करें तथा सहस्र गुना कार्यरत गुरुतत्त्व का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करें !’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी) (४.६.२०२५)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !