गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में सनातन के ३ गुरुओं के संदेश !

‘साध्यति निष्पादयति कार्यमिति साधकः।’ अर्थात जो आध्यात्मिक उन्नति साध्य करने के लिए अपेक्षित फल मिलने तक निरंतर कर्म (साधना) करता रहता है, वही साधक कहलाता है । ऐसे सच्चे साधक बनने की प्रक्रिया में सबसे बडे अवरोध हैं स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम ।
१. स्वभावदोष : आलस्य आदि अनेक स्वभावदोषों के कारण साधना की गति और उसका फल कम हो जाता है । इसलिए साधकों के लिए ‘स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया’ को आत्मसात करना महत्त्वपूर्ण है । इस प्रक्रिया के माध्यम से ‘स्वभावदोष’ रूपी बाधा का निराकरण किया जा सकता है ।
२. प्रमाद : प्रमाद अर्थात जान-बूझकर अथवा अनजाने में किया गया अनुचित आचरण । कर्मफल-सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल भोगना ही पडता है; इसलिए कोई भी प्रमाद साधक की साधना का क्षय करता है । प्रमाद के परिणामस्वरूप साधक की अपेक्षित आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो पाती ।
प्रायश्चित आदि कर्मों के द्वारा प्रमाद का परिमार्जन (निवारण) किया जा सकता है; इसलिए साधक को हुए प्रमाद के लिए प्रायश्चित अवश्य लेना चाहिए ।
३. संभ्रम : साधक के लिए सबसे बडी बाधा यदि कोई है, तो वह है ‘संभ्रम’ ! संभ्रम साधक द्वारा स्वयं-निर्मित एक नकारात्मक मानसिक अवस्था है । इसमें मुख्यतः तीन बातें सम्मिलित होती हैं ।
अ. भ्रम – जो असत्य है, उसे सत्य मान लेना ।
आ. द्वंद्व – ‘यह उचित है अथवा अनुचित ?’, ऐसी अनिर्णित अवस्था में बने रहना ।
इ. संदेह – गुरु और साधना के विषय में मन में नकारात्मक विचार उत्पन्न होना ।
स्वभावदोष और प्रमाद पर हम अपने प्रयासों से विजय प्राप्त कर सकते हैं; परंतु संभ्रम की अवस्था को दूर करने के लिए गुरु का मार्गदर्शन अथवा गुरुकृपा ही आवश्यक होती है । गुरुरूप संतों का मार्गदर्शन ग्रहण करना ही संभ्रम दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है ।
इस गुरुपूर्णिमा पर शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपने भीतर के बाधारूपी स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम को दूर करने का दृढ संकल्प करें !’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळजी (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी) (४.६.२०२६)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !