शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम को दूर करें !

गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में सनातन के ३ गुरुओं के संदेश !

श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळजी

‘साध्यति निष्पादयति कार्यमिति साधकः।’ अर्थात जो आध्यात्मिक उन्नति साध्य करने के लिए अपेक्षित फल मिलने तक निरंतर कर्म (साधना) करता रहता है, वही साधक कहलाता है । ऐसे सच्चे साधक बनने की प्रक्रिया में सबसे बडे अवरोध हैं स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम ।

१. स्वभावदोष : आलस्य आदि अनेक स्वभावदोषों के कारण साधना की गति और उसका फल कम हो जाता है । इसलिए साधकों के लिए ‘स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया’ को आत्मसात करना महत्त्वपूर्ण है । इस प्रक्रिया के माध्यम से ‘स्वभावदोष’ रूपी बाधा का निराकरण किया जा सकता है ।

२. प्रमाद : प्रमाद अर्थात जान-बूझकर अथवा अनजाने में किया गया अनुचित आचरण । कर्मफल-सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल भोगना ही पडता है; इसलिए कोई भी प्रमाद साधक की साधना का क्षय करता है । प्रमाद के परिणामस्वरूप साधक की अपेक्षित आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो पाती ।

प्रायश्चित आदि कर्मों के द्वारा प्रमाद का परिमार्जन (निवारण) किया जा सकता है; इसलिए साधक को हुए प्रमाद के लिए प्रायश्चित अवश्य लेना चाहिए ।

३. संभ्रम : साधक के लिए सबसे बडी बाधा यदि कोई है, तो वह है ‘संभ्रम’ ! संभ्रम साधक द्वारा स्वयं-निर्मित एक नकारात्मक मानसिक अवस्था है । इसमें मुख्यतः तीन बातें सम्मिलित होती हैं ।

अ. भ्रम – जो असत्य है, उसे सत्य मान लेना ।

आ. द्वंद्व – ‘यह उचित है अथवा अनुचित ?’, ऐसी अनिर्णित अवस्था में बने रहना ।

इ. संदेह – गुरु और साधना के विषय में मन में नकारात्मक विचार उत्पन्न होना ।

स्वभावदोष और प्रमाद पर हम अपने प्रयासों से विजय प्राप्त कर सकते हैं; परंतु संभ्रम की अवस्था को दूर करने के लिए गुरु का मार्गदर्शन अथवा गुरुकृपा ही आवश्यक होती है । गुरुरूप संतों का मार्गदर्शन ग्रहण करना ही संभ्रम दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है ।

इस गुरुपूर्णिमा पर शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपने भीतर के बाधारूपी स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम को दूर करने का दृढ संकल्प करें !’

– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळजी (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी) (४.६.२०२६)