
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले : क्या एक-एक वर्ण के अनुसार साधना पूर्ण कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है अथवा आगे-आगे के वर्णों की साधना एकत्रित कर शीघ्र मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है ? (१४.१.२०२५)
उत्तर : एक-एक वर्ण के अनुसार साधना करना, अर्थात व्यष्टि साधना (व्यक्तिगत साधना) है; इसके विपरीत, सभी वर्णाें की एकत्रित साधना करना, अर्थात समष्टि साधना (समाज-उन्मुख साधना) है ।

१. साधना की दृष्टि से वर्ण की परिभाषा
अध्यात्म में प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार साधना और क्षमतानुसार साधना को सर्वाधिक महत्त्व है । व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करता है तथा अपनी क्षमतानुसार उसे उन कर्मों में सफलता मिलती है । इन दोनों घटकों को ध्यान में रखकर ही व्यक्ति के वर्ण निर्धारित किए गए हैं । व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार साधना कर सके; इसीलिए वर्णानुसार साधना बताई जाती है । एक वर्ण की साधना से भी अधिक से अधिक संत पद तक पहुंचा जा सकता है; क्योंकि संत पद प्राप्त करने का अर्थ है, जीव का वर्ण ‘हंस वर्ण’ होना । इस चरण पर जीव के अहंकार का लय बहुत अधिक मात्रा में हो जाने के कारण, उसका अपनी प्रकृति के अनुसार साधना करने का कोई हठ नहीं रहता । जीव के हंस वर्ण का हो जाने पर, वह अगले चरण की साधना कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।
२. एक वर्ण के अनुसार साधना करने से अगले वर्ण की साधना करने की क्षमता का निर्माण होना
एक जन्म में एक वर्ण के अनुसार लगन और भावयुक्त साधना करने से व्यक्ति में आगे-आगे के वर्णों की साधना करने की क्षमता स्वयं ही निर्माण हो जाती है । उदाहरण के लिए शूद्र वर्णानुसार साधना करने से व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर में वृद्धि होती है और उसके प्रारब्ध का कठिन भाग नष्ट हो जाता है । इस कारण वह अपने पुण्य के बल पर धन संचय करने में समर्थ हो जाता है, जिससे उसमें वैश्य वर्ण के अनुसार साधना करने की क्षमता जागृत होती है । इसके विपरीत, उसका अहंकार कम हो जाने से बुद्धि सात्त्विक हो जाती है और उसमें ब्राह्मण वर्ण के अनुसार साधना करने की क्षमता का निर्माण होता है ।
२ अ. प्रयत्नों में भक्ति को जोडने से आवश्यक साधना होकर संत पद प्राप्त होना : यदि व्यक्ति किसी एक वर्ण के अनुसार की जानेवाली साधना में भाव को जोड दे, तो उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है । परिणामस्वरूप उससे स्वयं ही अगले वर्णों की साधना होती है और वह संत पद तक पहुंच सकता है । उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के संत गोरा कुंभार मिट्टी के मटके बनाने के माध्यम से वैश्य वर्ण की साधना करते थे । उनके भीतर की भक्ति के कारण उन्हें विभिन्न अभंग प्रस्फुरित (स्वतः उत्पन्न) हुए । इन अभंगों का गायन और प्रसार करने के माध्यम से उन्होंने समाज को प्रायोगिक अध्यात्म सिखाया, जिससे उनकी ब्राह्मण वर्ण की साधना भी हुई । इससे सिद्ध होता है कि व्यक्ति भले ही किसी एक वर्ण के अनुसार साधना कर रहा हो; परंतु यदि उसके भीतर उत्कृष्ट भाव हो, तो एक ही जन्म में उससे अनजाने ही आगे-आगे के वर्णों की साधना होती है और वह संत पद प्राप्त कर सकता है ।
३. व्यष्टि साधना के तीव्र संस्कार के कारण १० प्रतिशत व्यष्टि उपासकों द्वारा एक जन्म में एक ही वर्ण की साधना से ईश्वरप्राप्ति करना

व्यक्ति भाव-भक्ति रखकर एक वर्ण के अनुसार साधना कर संत पद प्राप्त कर सकता है । ऐसा होने पर भी, व्यष्टि साधना करनेवाले जीवों में अपनी प्रकृति के अनुरूप वर्ण के अनुसार ही साधना करने का तीव्र हठ होता है । उनमें अगले वर्ण की साधना करने की क्षमता होती है, साथ ही उनके पास दूसरे वर्ण की साधना कर मनोलय, बुद्धिलय और अहंलय करने तथा समष्टि साधना करने का अवसर भी होता है; परंतु संकीर्ण वृत्ति के कारण वे अपने ही वर्ण में उलझकर अपना संपूर्ण जीवन व्यर्थ गंवा देते हैं । व्यष्टि साधना करनेवालों में से केवल १० प्रतिशत साधक ही भक्तिभाव के अनुसार एक वर्ण से साधना कर एक ही जन्म में संत पद तक पहुंच पाते हैं और आगे उच्च लोकों में रहकर कुछ समय पश्चात मोक्ष प्राप्त करते हैं । इसके विपरीत, वर्ण के अनुसार साधना करनेवाले अन्य ९० प्रतिशत जीवों में भाव न होने के कारण, उनकी इसी जन्म में संत पद तक प्रगति नहीं हो पाती । इसलिए ईश्वर उन्हें अगला जन्म, इस जन्म में साधना किए गए वर्ण की तुलना में उच्च वर्ण के परिवार में देते हैं । उदाहरण : यदि इस जन्म में वैश्य वर्ण की साधना की है, तो अगला जन्म क्षत्रिय वर्ण की साधना के लिए पूरक परिवार में अथवा वैसी परिस्थितियों में मिलता है, जिससे जीव की उस वर्ण की साधना हो सके । इस प्रकार, जिनमें भाव कम होता है और जो केवल एक ही वर्ण के माध्यम से साधना करते हैं, ऐसे जीवों की अनेक जन्मों की यात्रा के पश्चात मोक्षप्राप्ति की ओर प्रगति होती है ।
४. समष्टि साधना करनेवाले व्यक्ति द्वारा एक ही जन्म में अनेक वर्णों की साधना करने के कारण उसकी आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होना
समष्टि साधना में जीव को कालानुसार (समय के अनुसार) साधना सिखाई जाती है । कालानुसार साधना में व्यक्ति की क्षमता का विचार कर उसे साधना बताई जाती है । उदाहरणार्थ : यदि शारीरिक बीमारी हो, तो शारीरिक सेवा की तुलना में बौद्धिक सेवा दी जाती है । इसके कारण समष्टि साधना करनेवाले जीव द्वारा एक ही जन्म में सभी वर्णों की साधना होती है । इसका परिणाम यह होता है कि साधना करते समय आनेवाली विभिन्न कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने के लिए आवश्यक क्षमता उसमें निर्मित होती जाती है । उदा. शारीरिक सेवा करने से व्यक्ति का प्रारब्ध नष्ट होता है तथा उसके भीतर भाव की वृद्धि होने में सहायता मिलती है । दान देने से व्यक्ति के पुण्य में वृद्धि होने के कारण उसके मानसिक स्तर के कष्ट कम हो जाते हैं । इसके फलस्वरूप जीवन में समय के अनुसार तीव्र प्रारब्ध के प्रसंग आने पर भी, जीव की साधना पर अधिक प्रभाव नहीं पडता; जिससे उसकी आध्यात्मिक प्रगति रुकने के स्थान पर, भले ही मंद गति से हो, परंतु निरंतर चलती रहती है । इसी प्रकार, विभिन्न वर्णाें की साधना करने के लिए कहे जाने पर, उस ध्येय को साध्य करने के लिए जीव द्वारा ईश्वर की सहायता लेने का भाग बढता जाता है, जिससे उसके मन पर भक्ति के संस्कार दृढ होते हैं ।
समष्टि साधना में व्यक्ति की मुख्य साधना भले ही किसी एक वर्ण के अनुसार हो (उदाहरणार्थ : वैश्य वर्णानुसार), तब भी वह सभी वर्णों के अनुसार साधना कर रहा होता है । इससे उसके अहंकार में वृद्धि नहीं होती और उसका मन अंतर्मुखी रहता है; ऐसे विभिन्न गुण उसमें उत्पन्न होते हैं । इसलिए वह व्यष्टि साधना करनेवाले जीवों की तुलना में शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति करता है । यही कारण है कि जहां एक ही वर्ण से साधना करनेवाले व्यष्टि उपासकों में से केवल १० प्रतिशत जीव ही एक ही जन्म में साधना कर संत पद प्राप्त करते हैं, वहीं समष्टि साधना करनेवालों में से ३५ प्रतिशत जीवों को चारों वर्णों की साधना कर एक ही जन्म में सहजता से संत पद प्राप्त हो जाता है । इतना ही नहीं, वे इसी जन्म में जीवित रहते हुए मोक्षप्राप्ति भी साध्य कर सकते हैं ।
५. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने सिखाई गुरुकृपायोगानुसार साधना से साधकों की प्रतिदिन चारों वर्णों की साधना होना
‘सनातन के आश्रमों में, साथ ही समाज में रहकर गुरुकृपायोगानुसार साधना करनेवाले साधकों की चारों वर्णों की साधना किस प्रकार होती है ?’, यह यहां दिया गया है ।
५ अ. ब्राह्मण वर्ण की साधना : ग्रंथ-निर्मिति (पुस्तकों का लेखन व निर्माण), ‘सनातन प्रभात’ पत्रिकाओं का प्रकाशन, वेबसाइट के लिए लेख लिखना, आध्यात्मिक अनुभूतियों अथवा आध्यात्मिक कष्टों का अध्ययन करना, शोध कार्य, सत्संग अथवा कार्य-बैठक लेकर नियोजन करना ।
५ आ. क्षत्रिय वर्ण की साधना : स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया (स्वभाव के दोषों को दूर करने की प्रक्रिया) चलाना, विभिन्न सामाजिक उत्सवों में होनेवाली कुप्रथाओं व अपप्रथाओं को रोकने के लिए प्रयत्न करना तथा हिन्दू धर्म पर होनेवाले विभिन्न आघातों के संदर्भ में हिन्दू समाज का संगठन करना इत्यादि ।
५ इ. वैश्य वर्ण की साधना : समाज में सात्त्विक वस्तुओं का वितरण करना, समाज में जाकर समष्टि कार्य के लिए अर्पण लेना, आश्रम की विभिन्न वस्तुओं का आवश्यकता अनुसार ही उपयोग करना, तथा सात्त्विक जीवनशैली (वेशभूषा, केशभूषा) इत्यादि के लिए खर्च करना इत्यादि ।
५ ई. शूद्र वर्ण की साधना : सात्त्विक प्रसारसामग्री लाना अथवा भेजना, सत्संग अथवा बैठक की तैयारी करना, आश्रम में भोजन बनाना अथवा स्वच्छता से संबंधित सेवा करना तथा प्रत्येक दिन कुछ समय सत्सेवा करना इत्यादि ।
अतः उपर्युक्त विश्लेषण से यह ध्यान में आएगा कि ‘गुरुकृपायोग के अनुसार साधना के प्रयत्न प्रतिदिन करने पर जीव की प्रतिदिन चारों वर्णों के अनुसार साधना होती है ।’ यह सच्चिदानन्द परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों को सिखाई गई गुरुकृपायोगानुसार साधना की अनेक विशेषताओं में से एक अत्यंत अनूठी विशेषता है । अन्य साधना मार्ग, पंथ, संप्रदाय और संस्थाओं की तुलना में गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करनेवालों की आध्यात्मिक उन्नति तीव्र गति से होने के पीछे का एक कारण यह भी है ।
– श्री. निषाद देशमुख (सूक्ष्म से मिला ज्ञान), सनातन आश्रम
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !