Sabarimala Gold Probe : शबरीमला सोना प्रकरण में ‘त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड’ के पूर्व अध्यक्ष के विरुद्ध मिले प्रमाण !

केरल उच्च न्यायालय द्वारा नया अपराध प्रविष्ट करने की अनुमति

‘त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड’ के पूर्व अध्यक्ष पी.एस. प्रशांत (दाईं ओर)

कोच्चि (केरल) – शबरीमला मंदिर के सोना चोरी प्रकरण में ‘त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड’ के पूर्व अध्यक्ष पी.एस. प्रशांत के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं । उनके विरुद्ध अनेक अधिकारियों और बोर्ड के सदस्यों की भूमिका से संबंधित पर्याप्त प्रमाण हैं, ऐसी जानकारी विशेष अन्वेषण दल ने केरल उच्च न्यायालय को दी । इस पर उच्च न्यायालय ने कहा, ‘यदि दल चाहे तो वर्ष २०२५ के स्वर्ण-मढाई प्रकरण में स्वतंत्र रूप से नया अपराध प्रविष्ट कर सकता है अथवा वर्ष २०१९ में सोना गायब होने से संबंधित पहले से चल रहे प्रकरण में जांच के निष्कर्ष जोड सकता है ।’ कुछ अन्य अधिकारियों और बोर्ड के पूर्व सदस्यों की भूमिका की जांच अभी भी जारी है । यदि उनके विरुद्ध पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं, तो दल उनके विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई कर सकता है । इस प्रकरण की अगली सुनवाई २० जुलाई को होगी ।

बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पी.एस. प्रशांत ने अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों को निरस्त कर दिया है । उनका कहना है कि वर्ष २०२५ के स्वर्ण-मढाई प्रकरण में उनके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं है । केवल न्यायालय की अनुमति न लेने का आरोप लगाया गया है । मूर्तियों को पुनः स्वर्ण-मढाई के लिए भेजते समय सभी नियमों का पालन किया गया था । बोर्ड को वर्ष २०१९ में सोने की हेराफेरी के विषय में कोई जानकारी नहीं थी ।

मंदिर से ५०० करोड रुपये का सोना चोरी होने का कांग्रेस नेता का दावा

इस प्रकरण में पहले महत्त्वपूर्ण जानकारी देनेवाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता रमेश चेन्निथला ने दावा किया था कि मंदिर के सोना चोरी प्रकरण में ‘त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड’ के पुराने अधिकारियों की मिलीभगत से अस्वीकार नहीं किया जा सकता । मेरा अनुमान है कि गायब हुई संपत्ति का मूल्य लगभग ५०० करोड रुपये हो सकता है ।

क्या है प्रकरण ?

१. उद्योगपति विजय माल्या ने मंदिर को ३१ किलोग्राम सोना दान किया था । इस दान से मंदिर के विभिन्न स्थानों पर स्वर्ण-मढाई की गई थी ।

२. शबरीमला मंदिर के गर्भगृह और द्वारपालक मूर्तियों पर लगी स्वर्ण-मढित तांबे की प्लेटों से सोना निकालकर उसका कथित रूप से गबन किया गया ।

३. इस प्रकरण की जांच के लिए स्थापित केरल सरकार के विशेष अन्वेषण दल को पता चला कि ‘देवस्वम बोर्ड’ के अधिकारियों ने उचित अनुमति के बिना इन प्लेटों को बाहर भेजा और इसमें व्यवसायियों तथा अन्य लोगों की मिलीभगत थी ।

४. चेन्नई में मूर्तियों पर लगे पुराने स्वर्ण-स्तर को हटाया गया था । नया स्तर चढाने के लिए बहुत कम सोने की आवश्यकता थी; परंतु शेष सोना कथित रूप से गायब कर दिया गया ।

५. कार्य ठीक प्रकार से न होने के उपरांत भी, मूर्तियों के लिए ४० वर्ष की ‘वारंटी’ का प्रमाणपत्र दिया गया । इसके उपरांत भी, कुछ ही महीनों में स्वर्ण-स्तर खराब हो गया और उसके नीचे का तांबे का भाग दिखाई देने लगा ।

६. वर्ष २०१९ में हुई कथित सोने की हेराफेरी को छिपाने के लिए वर्ष २०२५ में मूर्तियों को पुनः चेन्नई भेजने की योजना बनाई गई । नवंबर २०२३ में पी.एस. प्रशांत के बोर्ड अध्यक्ष बनने के उपरांत मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी ने उनका विश्वास जीता और पुनः स्वर्ण-मढाई का प्रस्ताव रखा । बोर्ड के कुछ सदस्यों को यह ज्ञात था कि वर्ष २०१९ में बचा हुआ सोना अभी भी उन्नीकृष्णन पोट्टी के पास है । इसके उपरांत भी, कार्रवाई करने के स्थान पर उन्होंने कथित रूप से प्रकरण को दबाने में सहायता की ।

७. इस प्रकरण में मंदिर के पूर्व पुजारी नंबूदरी उन्नीकृष्णन पोट्टी, सोना व्यापारी डी. मणि और ‘त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड’ के पूर्व अध्यक्ष ए. पद्मकुमार सहित मुख्य आरोपियों को बंदी बनाया गया है । इसके साथ ही अन्य ९ लोगों को भी बंदी बनाया गया है ।