आश्वासनों की पूर्ति में तेजी लाने के लिए महाराष्ट्र विधानमंडल करेगा ‘सॉफ्टवेयर’ का निर्माण !

श्री प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधि, दैनिक ‘सनातन प्रभात’

मुंबई, ३० जून (वार्ता.) – विधानमंडल के अधिवेशन के दौरान दिए जानेवाले आश्वासनों को वैधानिक महत्त्व प्राप्त है । विधानमंडल में दिए गए आश्वासनों की पूर्ति करना उसकी प्रतिष्ठा माना जाता है । इसलिए विधानमंडल में दिए गए आश्वासनों को संबंधित विभाग को भेजे जाने की तिथि से अगले ९० दिनों के भीतर पूरा करने का विधानमंडल के कार्य-संचालन का नियम है । वास्तव में, पिछले २० से २५ वर्षों में विधानमंडल में दिए गए सैकडों आश्वासन लंबित हैं । लंबित तथा भविष्य में दिए जानेवाले नए आश्वासनों की पूर्ति में तेजी लाने के लिए महाराष्ट्र विधानमंडल एक ‘सॉफ्टवेयर’ विकसित कर रहा है । आगामी कुछ महीनों में इस ‘सॉफ्टवेयर’ के निर्माण का कार्य पूर्ण हो जाएगा ।

इस ‘सॉफ्टवेयर’ के माध्यम से यह जानकारी प्राप्त हो सकेगी कि किस विभाग के कितने आश्वासन लंबित हैं, आश्वासन किस दिन दिया गया था और उसकी समय-सीमा कितनी है, उसकी पूर्ति की कार्यवाही किस स्तर पर है आदि । यह सॉफ्टवेयर प्रत्येक विभाग को उपलब्ध कराया जाएगा तथा संबंधित विभाग उसमें आश्वासनों पर की गई कार्यवाही प्रविष्ट कर सकेगा । ‘सॉफ्टवेयर के निर्माण के उपरांत आश्वासनों की पूर्ति के कार्य में तेजी आएगी’, ऐसी अपेक्षा है ।

 ऐसी है आश्वासनों की कार्यप्रणाली !

१. विधानमंडल के प्रतिवेदन कक्ष द्वारा विधानसभा और विधान परिषद, दोनों सदनों की कार्यवाही का इतिवृत्त मंत्रालय के संसदीय कार्य विभाग को भेजा जाता है ।

२. उसमें से ‘संभावित आश्वासनों’ का निर्धारण कर संसदीय कार्य विभाग पुनः इन आश्वासनों को विधानमंडल की आश्वासन समिति के पास भेजता है ।

३. आश्वासन समिति इन आश्वासनों को अंतिम रूप देकर संबंधित विभागों को भेजने के लिए पुनः संसदीय कार्य विभाग को भेजती है ।

४. विभाग के अनुसार वर्गीकरण कर संसदीय कार्य विभाग सभी आश्वासनों को संबंधित विभागों को भेजता है और उनकी पूर्ति के लिए अनुवर्ती कार्यवाही करता है ।

५. प्रत्येक आश्वासन पर संतोषजनक उत्तर प्राप्त होने के उपरांत ही आश्वासन समिति यह मानती है कि ‘आश्वासन की पूर्ति हो गई है ।’

विधानमंडल की कार्यवाही का इतिवृत्त भेजने में होता है विलंब !

वर्तमान में चल रहे विधानमंडल के वर्षाकालीन अधिवेशन से केवल ८ दिन पहले ही फरवरी-मार्च २०२६ में हुए बजट अधिवेशन का इतिवृत्त संसदीय कार्य विभाग को भेजा गया । यदि बजट अधिवेशन समाप्त होने के पश्चात उसका इतिवृत्त भेजने में ही ३ महीने लगते हैं, तो यह विधानमंडल प्रशासन की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न खडा करता है । पिछले कुछ वर्षों से अधिवेशन का इतिवृत्त संसदीय कार्य विभाग को भेजने में विलंब हो रहा है ।
* बजट अधिवेशन में विधानसभा में १,०२८ तथा विधान परिषद में ३२४ आश्वासन दिए गए थे । वर्तमान में विधानसभा के कुल ५,००० से अधिक तथा विधान परिषद के २,००० से अधिक आश्वासन लंबित हैं ।

उपाय किए जाने के उपरांत भी विलंब !

वर्तमान में विधानमंडल की आश्वासन समिति की बैठकें नियमित रूप से हो रही हैं । विधानमंडल के निर्देशानुसार आश्वासनों की पूर्ति में तेजी लाने के लिए सभी सरकारी विभागों की समितियां भी गठित की गई हैं । शासन ने निर्णय लिया है कि ‘ये समितियां प्रत्येक १५ दिन में बैठक लेकर लंबित आश्वासनों की समीक्षा करें ।’ साथ ही, २ वर्ष से अधिक समय से लंबित आश्वासनों की पूर्ति को प्राथमिकता देने के निर्देश भी दिए गए हैं । इससे कार्य में कुछ तेजी आई है ।
इसके अलावा विधानमंडल की कार्यवाही का इतिवृत्त संसदीय कार्य विभाग को भेजने में विलंब होता है, तथा आश्वासनों के अनुवर्ती प्रयासों के बाद भी कुछ सरकारी विभाग उन्हें अपेक्षित महत्त्व नहीं देते । परिणामस्वरूप आश्वासनों की पूर्ति में विलंब हो रहा है । यदि इस कार्य के लिए अतिरिक्त संसाधन (मानवबल) की आवश्यकता हो, तो उसकी व्यवस्था भी की जानी चाहिए ।
सरकारी विभागों की समितियों की स्थापना और ‘सॉफ्टवेयर’ का निर्माण, आश्वासनों की पूर्ति की दृष्टि से अच्छे प्रयास हैं; किन्तु उपर्युक्त कारणों से अभी भी इस प्रक्रिया में विलंब हो रहा है । विधानमंडल में दिए गए आश्वासनों के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए विधानमंडल प्रशासन को इस विषय पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देना आवश्यक है ।