धर्मांतरण रोकने में मठ और मंदिरों का योगदान !

१. शुद्ध कर्म, ज्ञान और भक्ति से ही हिन्दू राष्ट्र की स्थापना संभव !

‘प्रभु श्रीराम अयोध्या से वनवास के लिए निकले थे । वनवास की अवधि में उन्होंने ३ ऋषियों से ३ बातें पूछीं । ऋषि भरद्वाज से आगे जाने का मार्ग, ऋषि वाल्मीकि से रहने का स्थान और अगस्त्य मुनि से राक्षसों के वध का मंत्र पूछा । भरद्वाज ऋषि का आश्रम गंगा, यमुना और सरस्वती इन नदियों के संगम पर था । गंगा का अर्थ भक्ति, यमुना का अर्थ कर्म और सरस्वती का अर्थ ब्रह्मविद्या है ! जिस महापुरुष के जीवन में ज्ञान, भक्ति और जलकमल के समान कर्म भी शुद्ध हैं, वे धर्म की स्थापना कर सकते हैं । ‘रामचरितमानस’ में लिखा है, ’प्रभु श्रीराम ने ऋषि भरद्वाज से मार्ग पूछा । तब उन्होंने अपने शिष्यों को पुकारा, उनके ५० शिष्य एक साथ आए । उन ५० में से ऋषि भरद्वाज ने केवल ४ शिष्यों को चुना और कहा कि ये जहां कहें, वहां जाएं ।’ इसलिए हिन्दू राष्ट्र लाने के लिए हमारे भीतर भी ज्ञान, भक्ति और शुद्ध कर्म होना चाहिए ।

पू. संत श्रीराम ज्ञानीदास महात्यागीजी

२. धर्मांतरण रोकने के लिए साधु-संत समाज को धर्मशिक्षा दें !

संसार में विभिन्न पंथ और नए-नए संप्रदाय निर्मित हुए हैं । प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग बातें कहता है । इस कारण हिन्दू जनमानस विभाजित हो गया है । केवल लोग ही नहीं, अपितु संत भी जाति, धर्म और पंथ में विभाजित हैं । हिन्दुओं के असंगठित होने के कारण परधर्मियों से संकट बढ गया है । इसलिए जब हिन्दू एकजुट होकर रहेंगे, तभी रामराज्य आ सकता है । हिन्दू नास्तिकतावादी विभिन्न माध्यमों से धर्म के विषय में दुष्प्रचार करते हैं । जिससे हमारे लोग धर्म से दूर जा रहे हैं । इसे रोकने के लिए और उन्हें धर्मशिक्षा देने के लिए साधु-संतों को समाज में जाकर लोगों को धर्मशिक्षा देनी होगी । बडे मंदिरों में निश्चित दिनों पर हनुमान चालीसा का पाठ अथवा सत्संग का आयोजन करें । ऐसा करने से लोगों की धर्म पर श्रद्धा बढेगी और धर्मांतरण पर रोक लगेगी । धर्मांतरित लोगों का सामाजिक बहिष्कार करें । उनके साथ ‘रोटी और बेटी’ का व्यवहार बंद करें । कुछ दिनों में वे ईसाई पंथ छोडकर पुनः हिन्दू धर्म में प्रवेश करते हैं ।

– पू. संत श्रीराम ज्ञानीदास महात्यागीजी, संस्थापक, तिरखेडी आश्रम, गोंदिया.