१. भक्ति के उपरांत हुई मंदिरों की निर्मिति !
‘वैदिक कालीन यज्ञ’ संस्था के स्थान पर भारतीय संस्कृति का दर्शन होता है । अनेक कारणों से इसके क्षीण होने पर भारतीय संस्कृति मठों एवं मंदिरों के आस-पास सिमट गई । ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में नारायण ऋषि ने ईश्वर को मनुष्यरूप में देखा । मनुष्यरूप ईश्वर के साथ जुडे मानवीय प्र्रेमसंबंधों से भक्ति का जन्म हुआ । भक्ति के पश्चात मंदिरों की निर्मिति हुई; इसलिए वैदिकों के यज्ञमंडप से ही उस मंडप से और स्थिर एवं सुविधाओं से समृद्ध, अधिक सुरक्षित सुंदर एवं भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ ।
२. मंदिर अर्थात ईश्वरदर्शन !
ईश्वरदर्शन मानव जीवन का प्रधान प्रयोजन सुनिश्चित होने पर भारतीयों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में मंदिर संस्थाएं एकदम से केंद्रस्थान पर जाकर बैठ गईं । जिस प्रकार विश्व की अंतरात्मा ईश्वर, विश्व का मध्यवर्ती केंद्र है, उसी प्रकार मनुष्य जैसी सुंदर एवं प्रसन्न ईश्वर की मूर्ति मंदिर के केंद्रस्थान में वास करती है । मंद प्रकाश, शांत एवं शीतल गर्भगृह में स्थित ईश्वर की मूर्ति से युक्त मंदिर को विश्व का प्रतीक माना जाता है । मंदिर जाने का अर्थ है ईश्वरदर्शन के लिए जाना ! ‘ईश्वरदर्शन’ एक भव्य मूल्यपरक संकल्पना है ।

३. मंदिर संस्कृति को नष्ट करने के मुसलमान शासकों के अथक प्रयास !
भारत के कुछ मंदिर इतने भव्य थे, उनका शिल्पसौंदर्य इतना समृद्ध था कि उससे उनके चारों ओर शहर बढते गए तथा उन्हें पवित्र तीर्थस्थलों का स्वरूप मिला । भारतीयों की मंदिर संस्कृति ईश्वरकेंद्रित थी । ‘मंदिरों को नष्ट करने से यह संस्कृति ही निष्प्राण हो जाएगी’, इस मूर्खतापूर्ण कल्पना से मुसलमान शासकों ने उन पर बलपूर्वक प्रहार किए । उन प्रहारों का सफलतापूर्वक सामना करने का मार्ग खोजनेवाले श्री समर्थ रामदासस्वामीजी तत्कालीन भारत में एकमात्र पुरुष हुए ।
वर्तमान में भी ‘मंदिरों का महत्त्व तथा भारतीय संस्कृति में उनका स्थान’ ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चाहे वह श्रीराम मंदिर हो, काशी विश्वनाथ मंदिर हो अथवा महाकालेश्वर का कॉरिडॉर (सुसज्जित महामार्ग) हो; इन सभी के पुनरुत्थान के पीछे एक ही उद्देश्य दिखाई देता है, वही उद्देश्य समर्थजी ने बताया था; यह ध्यान में आता है ।
४. मंदिरों के द्वारा भारतीय संस्कृति को जागृत करनेवाले एकमात्र समर्थ रामदासस्वामीजी !
समर्थ रामदासस्वामीजी को सामान्य मनुष्य को निर्भय बनाकर उसे अन्याय का प्रतिकार करने की प्रेरणा देनी थी; इसलिए समर्थ ने सभी के लिए सहजप्रिय मूर्तिपूजा का आश्रय लिया । भगवान की मूर्ति आत्मशुद्धि का साधन है, साध्य नहीं ! ‘धर्म व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रह जाता तथा देवालय समाज की अस्मिता के प्रतीक बन जाते हैं’, इसे जानकर उन्होंने अनेक स्थानों पर श्रीराम एवं हनुमानजी के मंदिरों की स्थापना कर वहां के उत्सव योजनाबद्ध पद्धति से; परंतु गाजे-बाजे के साथ तथा निर्भयता से होंगे, इसकी ओर ध्यान दिया ।
‘देवता को मस्तक पर धारण करें (अर्थात ईश्वर को साक्षी मानकर कार्य करें) । संपूर्ण जगत में हलचल मचा दें । पापी औरंगजेब का पतन हुआ व आततायियों का संहार हुआ ।’ यह प्रत्यक्ष में देखना समर्थ रामदासस्वामीजी का जीवनस्वप्न था । उन्होंने अपने जीवन में इसे पूरा होता हुआ देखा । यह स्वप्न साकार करने हेतु ही समर्थ रामदासस्वामीजी ने शक १५६७ में मैसूर में रामनवमी का उत्सव मनाया । उसके उपरांत उन्होंने चाफळ में श्रीराम की स्थापना कर शक १५७० में रामनवमी का उत्सव मनाया ।
इस उत्सव के निमित्त समर्थ रामदासस्वामीजी ने जनभावना को समझा । अत: सार्वजनिक मंदिर लोगों के एकत्रित होने के पवित्र स्थान बन गए । इसकी सबसे बडी उपलब्धि थी कि मनुष्य स्वार्थ को त्यागना सीख गया । लोगों में ‘यह मेरा समाज’, ‘यह मेरा राष्ट्र’ की भावना जड पकडने लगी । इस भावना को दृढ स्वरूप देने हेतु व समुदायिक संगठन के लिए संप्रदाय बनाया गया; जिसके माध्यम से पूरे भारत में मठ स्थापित किए गए । इन मठों में मारुति के ११ मंदिरों की स्थापना हुई । सीमा पर स्थित हनुमानजी को समर्थ गांव के केंद्रस्थान पर ले आए तथा मंदिर के आस-पास भारतीय संस्कृति जागृत की । यही समर्थ रामदासस्वामीजी की मंदिर संस्कृति है ।
५. मंदिरों के साथ जुडी भारतीय संस्कृति !
इस प्रकार समर्थ रामदासस्वामीजी ने अपने साहित्यों में मंदिरों से संबंधित अनेक विषयों पर प्रकाश डाला । आज भी वही दिखता है कि कोरोना महामारी के उपरांत जब मंदिर खोले गए, तभी भारतीय अर्थव्यवस्था कार्यान्वित हुई । भारतीय संस्कृति मंदिरों के साथ जुडी है । इसलिए ‘देश एवं देह में ईश्वर हैं’, यही समर्थ रामदासस्वामीजी के विचारों से स्पष्ट होता है । यही समर्थ की मंदिर संस्कृति है ।
– डॉ. (श्रीमती) प्रज्ञा प्रकाश पुसदकर
(साभार : दीपावली मंदिर विशेषांक, वर्ष २०२४)

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