‘वर्तमान में विश्व में युद्धजन्य परिस्थितियां बनी हुई हैं । वैश्विक व्यवस्था (वर्ल्ड ऑर्डर) बदल रही है । वैश्विक व्यवस्था में होनेवाला यह परिवर्तन केवल एक संयोग नहीं है, यह समाज की चेतना (जागरूकता) में होनेवाले परिवर्तनों का दृश्य परिणाम है । समाज की चेतना में होनेवाले परिवर्तन और उनके आगामी समय में संभावित परिणामों का विवेचन इस लेख में ज्योतिषशास्त्र के दृष्टिकोण से किया गया है । (पूर्वार्ध)

१. समाज की चेतना का सैद्धांतिक विवेचन

१ अ. समाज की चेतना के २ अंग : जिस प्रकार किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी व्यक्तिगत चेतना पर आधारित होता है, उसी प्रकार समाज का अस्तित्व सामूहिक (कलेक्टिव) चेतना पर आधारित होता है । सामूहिक चेतना के २ अंग होते हैं – आंतरिक और बाह्य ।
१ अ १. आंतरिक अंग : समाज के आंतरिक अंग में लोगों की प्रवृत्ति, संस्कार, विचारधारा, जीवन को देखने का दृष्टिकोण, श्रद्धा, नैतिक मान्यताएं, सत्य के प्रति बोध आदि घटक सम्मिलित होते हैं । ये घटक समाज के मन में रचे-बसे होते हैं । ये गुप्त और अदृश्य होते हैं ।
१ अ २. बाह्य अंग : समाज के बाह्य अंग में विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएं सम्मिलित होती हैं, जैसे – राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, न्यायिक, शैक्षिक आदि । ये व्यवस्थाएं दृश्य होती हैं । इनका वस्तुनिष्ठ अध्ययन किया जा सकता है तथा उनकी संरचना अथवा नियमों में परिवर्तन किया जा सकता है ।
१ आ. समाज की चेतना की कार्यप्रणाली

१ आ १. समष्टि की चेतना के उन्नयन के लिए प्रयास आवश्यक ! : चेतना चाहे व्यक्तिगत हो अथवा सामूहिक, वह निरंतर विकसित (उन्नत) होने का प्रयास करती रहती है । यह उसका स्वाभाविक गुण है । उसकी उन्नति की दिशा अज्ञान से ज्ञान की ओर, संकीर्णता से व्यापकता की ओर, संघर्ष से संवाद की ओर, द्वेष से प्रेम की ओर, परतंत्रता से स्वतंत्रता की ओर, भेद से अभेद की ओर और जडता से चेतना की ओर होती है; परंतु चेतना की यह यात्रा सीधी रेखा में नहीं, अपितु सर्पिल (स्पाइरल) रूप में होती है । अर्थात ‘चेतना की निरंतर उन्नति ही होती है’, ऐसा नहीं है; बीच-बीच में उसका अवनति का भी चरण आता है; किंतु उसी अवनति के कारण आगे की उन्नति का मार्ग प्राप्त होता है । जब तक चेतना अगले स्तर तक पहुंचने में सक्षम नहीं होती, तब तक वह उसी स्तर पर घूमती रहती है ।
१ आ २. समाज की आंतरिक चेतना का बाह्य व्यवस्थाओं द्वारा दमन होने पर समय के साथ उन व्यवस्थाओं का पतन होना : समाज की आंतरिक स्थिति और बाह्य व्यवस्थाएं एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं । सामान्यतः समाज की आंतरिक स्थिति के अनुसार ही बाह्य व्यवस्थाओं का निर्माण होता है । यदि समाज की आंतरिक चेतना का बाह्य व्यवस्थाओं द्वारा दमन किया जाए अथवा समाज की बदलती हुई मान्यताओं, विचारधाराओं और धारणाओं को बाह्य व्यवस्थाओं द्वारा रोका जाए, तो समय के साथ ये व्यवस्थाएं टूटने लगती हैं । समाज की आंतरिक स्थिति और बाह्य व्यवस्थाओं के बीच का यह तनाव संघर्ष, क्रांति और परिवर्तन के रूप में प्रकट होता है । इतिहास में यह बार-बार हुआ है; उदाहरण के लिए, भारतवासियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम किया, क्योंकि अंग्रेजों ने भारतीय चेतना का दमन कर उसे परतंत्र, संकीर्ण, विभाजित, अपमानित और दुर्बल बना दिया था । भारतवासियों ने स्वतंत्रता प्राप्त की, अर्थात भारत की दबी हुई चेतना को मुक्त किया ।
१ इ. वर्तमान स्थिति में समाज की चेतना का अवलोकन
१ इ १. यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति के कारण आधुनिक युग का आरंभ : ‘वर्तमान वैश्विक चेतना की स्थिति क्या है ?’, इसका अवलोकन करते हैं । १६वीं शताब्दी में यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति हुई और आधुनिक युग का आरंभ हुआ । यूरोप में हुई यह वैज्ञानिक क्रांति कोई संयोग नहीं थी, इसके पीछे मध्ययुगीन समाज की पृष्ठभूमि थी । मध्ययुगीन समाज परंपराओं पर आधारित था । धर्म, शास्त्र, परंपरा और रूढियों का पालन ही जीवन में सर्वोच्च माना जाता था । धर्मसत्ता और सामंतशाही प्रचलित थी ।
मध्ययुग लगभग १५वीं-१६वीं शताब्दी तक चला । मध्ययुग की अंतिम कुछ शताब्दियों में पूरे विश्व में धार्मिक आडंबर बढ गए । धर्म का सार नष्ट होकर उसमें कुरीतियां और अंधविश्वास बढ गए । सत्ता और धर्म के बलपूर्वक विस्तार के कारण बार-बार युद्ध, अत्याचार और नरसंहार होते रहे । नए अनुसंधान, तत्त्वज्ञान और सत्य की खोज को अवसर नहीं मिल पाया । समाज में महिलाओं की स्थिति निम्न हो गई । इस प्रकार दबी हुई वैश्विक चेतना को वैज्ञानिक क्रांति के रूप में उन्नति का मार्ग प्राप्त हुआ ।
१ इ २. वैज्ञानिक क्रांति से मानवजाति को हुए लाभ : वैज्ञानिक क्रांति के कारण सृष्टि के भौतिक सत्य मनुष्य को वस्तुनिष्ठ रूप से ज्ञात हुए । इससे समाज का विश्व को देखने का दृष्टिकोण बदल गया । दैववाद पीछे रह गया और बुद्धिवाद आगे आया । अनेक अंधविश्वास दूर हुए । कई अनिष्ट रूढियां समाप्त हो गईं । महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ । स्वतंत्रता, समानता, सहभागिता, मानवाधिकार आदि मूल्य प्रमुख बने । इन मूल्यों को आधार देनेवाली ‘लोकतंत्र’ नामक शासन व्यवस्था का उदय हुआ । भौतिक विज्ञान की प्रगति से तकनीक विकसित हुई और उससे औद्योगिकीकरण का जन्म हुआ । विश्वभर में संचार (कम्यूनिकेशन) के साधन उपलब्ध होने से वैश्वीकरण हुआ ।
मध्ययुग में जो सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हुई थीं, वे आधुनिक युग में एक स्तर तक सुलझ गईं; परंतु कोई भी नई चेतना जब जन्म लेती है, तो वह अपनी सीमाओं के साथ ही जन्म लेती है । आधुनिक युग भी अपनी सीमाओं के साथ ही उत्पन्न हुआ । इससे मानवजाति को जितने बडे लाभ हुए, उतने ही बडे दुष्परिणाम भी हुए ।
१ इ ३. आधुनिक युग में मानवजाति को हुई हानि : आधुनिक युग में बुद्धिवाद का अतिरेक हो गया । ईश्वर, आत्मा, धर्म, अध्यात्म आदि को सामान्यतः अंधविश्वास मान लिया गया । ‘समस्त सृष्टि के मूल में जड पदार्थ (मैटर) है और चेतना (स्पिरिट) मात्र भ्रम है’, ऐसी धारणा बन गई । इससे जीवन का उद्देश्य ही लुप्त हो गया । ‘किसलिए जीना है ? किस लक्ष्य की ओर बढना है ?’, यह स्पष्ट न होने से दिशाहीनता उत्पन्न हुई । फलस्वरूप मनुष्य की प्रवृत्ति संकीर्ण, स्वार्थी, भोगवादी व आत्मकेंद्रित हो गई । ‘धन’ एवं ‘सत्ता’ ही विश्व के केंद्र में आ गए । प्रेम, सद्भावना, सामाजिक उत्तरदायित्व, व्यापकता, पवित्रता व नैतिकता जैसे मूल्यों का ह्रास हुआ । परिवार व्यवस्था कमजोर हो गई । मनुष्य समाज से कटकर अकेला पड गया । बढते औद्योगिकीकरण के कारण प्रकृति को भारी क्षति हुई । प्रदूषण अनियंत्रित रूप से बढने से वैश्विक जलवायु में परिवर्तन हुआ । अनेक वनस्पति तथा पशु-पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त हो गईं । मनुष्य के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव हुए । वर्तमान में मनुष्य के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खडा हो गया है । सामाजिक चेतना का मध्ययुग से आधुनिक युग में हुआ संक्रमण चेतना के विकास का एक आवश्यक चरण था; किंतु अब आधुनिक युग की सीमाएं स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी हैं । वर्तमान में भौतिक, तकनीकी, आर्थिक और बौद्धिक विकास बहुत हुआ है; परंतु नैतिक, सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास पीछे रह जाने से असंतुलन उत्पन्न हो गया है । इसलिए अब सामाजिक चेतना अगले स्तर पर संक्रमण करने का प्रयास कर रही है ।’ (क्रमशः)
– श्री. राज कर्वे, ज्योतिष विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा (३१.३.२०२६)
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