धर्मनिरपेक्षता और हिन्दू राष्ट्र !

भारत के इतिहास में अनेक राजा-महाराजाओं, संगठनों, संतों और व्यक्तियों ने हिन्दू धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया । उन्हीं के कारण आज हिन्दू धर्म व संस्कृति सुरक्षित है । इसी परंपरा में हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी के साथ ‘प्राच्यम्’ नामक ‘ओटीटी प्लेटफॉर्म’ के संस्थापक एवं मुख्य अधिकारी कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (सेवानिवृत्त) ने ‘चेंज मेकर्स’ कार्यक्रम के अंतर्गत संवाद किया । इस अवसर पर सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी ने ‘भारत की कथित धर्मनिरपेक्षता और हिन्दू राष्ट्र’ विषय पर जो प्रेरक विचार प्रस्तुत किए, उन्हें इस लेख के माध्यम से प्रकाशित कर रहे हैं ।

  • सर्वधर्मसमभाव का पालन केवल हिन्दू राष्ट्र में ही संभव !

  • संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का संशोधन असंवैधानिक

  • भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना आवश्यक !

  • ब्रिटेन में धर्मगुरुओं को धार्मिक कानून बनाने का अधिकार

  • ‘प्राच्यम्’ ओटीटी चैनल पर सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की भेंटवार्ता देखें ! – https://youtu.be/82-sVevgg9s

‘चेंज मेकर्स’ कार्यक्रम के अंतर्गत संवाद करते (बाएं से) कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (सेवानिवृत्त) एवं सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी

१. धर्म क्या है ?

हमारे यहां धर्म, पंथ व संप्रदाय हैं । इसलिए हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना समझने हेतु पहले हिन्दू धर्म अथवा ‘धर्म’ क्या है, यह समझना आवश्यक है । पाश्चात्य देशों की भाषाओं की शैली भिन्न है । संस्कृत-आधारित हिन्दी, मराठी अथवा संस्कृत की तुलना में उनका शब्दकोश अत्यंत सीमित है । अंग्रेजी भाषा की सीमाओं के कारण ‘रिलिजन अर्थात धर्म’ ऐसा एक गलत कथन वर्षों से चल रहा है । इससे केवल हमारी भाषा ही नहीं, हमारे विचारों की अभिव्यक्ति पर भी गहरा आघात हुआ है ।

‘जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस होता है, उसे धर्म कहते हैं ।’ यह धर्म की मूल परिभाषा है । ‘जो समाज को धारण करता है, वही धर्म है ।’ धर्म के विषय में आदि शंकराचार्यजी की पूर्ण परिभाषा है । उनके अनुसार, ‘जिससे व्यक्ति की लौकिक और पारलौकिक उन्नति होती है तथा समाज व्यवस्था उत्तम रहती है, वही धर्म है ।’ धर्म की इस संकल्पना में कहीं भी उपासना पद्धति का उल्लेख नहीं है । इसमें उत्तम समाज व्यवस्था और व्यक्ति की आध्यात्मिक तथा भौतिक उन्नति का विचार किया गया है ।

सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी

२.  हिन्दू किसे कहा जाए ?

‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है – ‘हीनान् गुणान् दूषयति इति हिन्दू !’ ‘मेरुतंत्र’ ग्रंथ के अनुसार, ‘जो व्यक्ति अपने हीन गुणों को निरंतर दूर कर अपनी आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता है, वही हिन्दू है ।’ इसमें कौन किस देवता की पूजा करता है अथवा कौन-सी उपासना पद्धति अपनाता है, इसका कोई उल्लेख नहीं है ।

हीन गुण अर्थात हमारे भीतर की बुरी प्रवृत्तियां, दोष और अहंकार, जिन्हें आध्यात्मिक भाषा में ‘रज-तम’ कहा गया है । इन्हें दूर कर सत्त्वगुणी बनने का प्रयास करना चाहिए और फिर सत्त्वगुण से भी आगे बढना चाहिए । इसके लिए आत्मशुद्धि की प्रक्रिया आवश्यक है । इस ग्रंथ में किसी उपासना पद्धति का उल्लेख नहीं है । स्वार्थ और द्वेषपूर्ण विचारों का त्याग कर, धार्मिक वृत्ति अपनाकर तथा सभी के प्रति प्रेम रखते हुए एक उत्तम समाज व्यवस्था के लिए प्रयास करना ही धर्म का संदर्भ है ।

यदि हम अपने संविधान में ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ देखें, तो जब डॉ. आंबेडकर ने संसद में ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ स्पष्ट किया, तब उन्होंने कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप में जो बौद्ध, सिख, जैन अथवा अन्य समान उपासना पंथ उत्पन्न हुए हैं (अब्राहमिक पंथों को छोडकर), वे सभी ‘हिन्दू’ की परिभाषा में आते हैं । उनके उदाहरण के अनुसार, ईसाई और इस्लाम पंथ भारत के बाहर उत्पन्न हुए हैं, इसलिए उन्हें छोडकर अन्य सभी हिन्दू माने जाते हैं ।


धर्म संबंधी कानून बनाने के लिए धर्म से संबंधित विशेषज्ञों की सहभागिता आवश्यक !


‘हिन्दू कानून के विशेषज्ञ हो सकते हैं, वे धर्मनिरपेक्ष भी हो सकते हैं और वे हिन्दू-विरोधी भी हो सकते हैं । यह भारत की न्यायव्यवस्था की समस्या है । न्यायव्यवस्था या संसद में जब कोई कानून बनाया जाता है, तो यह आवश्यक नहीं कि चुने गए प्रतिनिधियों को धर्म का पर्याप्त ज्ञान हो और वे धर्म से संबंधित कानून सही ढंग से बना सकें ।

पाकिस्तान के इस्लामी राष्ट्र के निर्माण पर भारत अथवा विश्व को कोई आपत्ति नहीं थी, इसी प्रकार बांग्लादेश के इस्लामी राष्ट्र के निर्माण पर भी भारत अथवा विश्व को कोई आपत्ति नहीं थी । अत: हिन्दू राष्ट्र के निर्माण पर भी पाकिस्तान, बांग्लादेश अथवा विश्व को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।’

– (सद्गुरु) डॉ. चारुदत्त पिंगळे

 

३. हिन्दू राष्ट्र की संक्षिप्त अवधारणा

इस हिन्दू राष्ट्र में परस्पर प्रेम होगा, एक-दूसरे के प्रति सम्मान होगा, भाईचारा होगा तथा एक-दूसरे के धर्म का आदर किया जाएगा । प्रत्येक व्यक्ति को समान व्यवहार मिलेगा, किसी का तुष्टीकरण नहीं होगा और किसी के लिए विशेष प्रावधान नहीं होंगे । जो भी सत्य कहा जाएगा, उसे न्याय व्यवस्था के माध्यम से लागू किया जाएगा । इसके साथ ही सभी नागरिक कानून और व्यवस्था का पालन करें, इस पर विशेष ध्यान दिया जाएगा  ।

४.  धर्मनिरपेक्षता का खेल

भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द की स्पष्ट परिभाषा ही नहीं की गई है । यदि हमारा संविधान कहता है कि एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो विज्ञान सिखाता है कि किसी भी शब्द को समझने हेतु पहले उसकी परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए । जिस संसद ने अनुच्छेद ७६ में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोडा, वह १९५० में मूल रूप से अस्तित्व में ही नहीं था और न ही इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा दी गई । एक ऐसी संज्ञा, जिसके बारे में संसद को ही स्पष्ट ज्ञान नहीं है, और एक ऐसी परिभाषा, जिसके बारे में न्यायपालिका भी स्पष्ट नहीं है । इस कारण प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुसार इसका अलग अर्थ निकाल रहा है । फलस्वरूप, देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल एक खेल चल रहा है । एक तो सभी धर्मों से समान दूरी रखी जाए या सभी धर्मों को समान अधिकार दिए जाएं, यही धर्मनिरपेक्षता है । वर्तमान में धर्मनिरपेक्षता का जो अर्थ निकाला गया है, उसके अनुसार उसका पूरा भार केवल हिन्दुओं पर ही डाल दिया है । इसलिए केवल हमें ही धर्मनिरपेक्षता का पालन करना पड रहा है । आज धर्मनिरपेक्षता हिन्दू-विरोधी और अल्पसंख्यक-समर्थक बन गई है, जिससे धर्मनिरपेक्षता भारत में एक अत्यंत पक्षपाती व्यवस्था बन गई है ।

ऐसी स्थिति में सबसे पहले ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द की परिभाषा करना आवश्यक है । ‘जब तक यह परिभाषा निर्धारित नहीं होती, तब तक सरकार अथवा न्यायपालिका इस आधार पर कोई निर्णय न ले’, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए । इसके साथ ही, धर्मनिरपेक्षता के आधार पर निर्णय लेते समय कहीं भेदभाव तो नहीं हो रहा, इसका भी विश्लेषण होना चाहिए । आज देश में नौकरशाही और न्यायिक क्षेत्र में भेदभाव हो रहा है । यदि संविधान का मूल सिद्धांत समानता है और उसमें जाति, पंथ, भाषा अथवा धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, तो ऐसे निर्णय हमारे मूल सिद्धांतों और मूल्यों को चुनौती देते हैं । इससे यह प्रतीत होता है कि उनके लिए संविधान के मूल्य महत्त्वहीन हैं और वे अपनी इच्छा अनुसार निर्णय ले सकते हैं । ऐसी स्थिति में नौकरशाही और न्यायपालिका के लिए, संविधान का पालन करने की दृष्टि से धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करना, व्यवस्था का दायित्व बन जाता है ।

५. संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का संशोधन असंवैधानिक

कहा जाता है कि संविधान की प्रस्तावना या उसके मूल सिद्धांतों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता; परंतु वह प्रस्तावना, जो उस एक-पृष्ठीय लेखन का मुख्य आधार है, वह वास्तव में संविधान सभा में हुई चर्चा है । संविधान निर्माण की प्रक्रिया के समय जब-जब ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को सम्मिलित करने का प्रस्ताव आया, तब-तब उसे अस्वीकार किया गया, उसे कदापि सम्मिलित न करने का निर्णय भी लिया गया । उन्हें भय था कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होगा या उनका शोषण किया जाएगा । इसे रोकने हेतु अनुच्छेद २८, २९ व ३० में विशेष प्रावधान कर अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिया गया । इसका अर्थ यह था कि यहां हिन्दुओं का ही राज्य होगा । इसलिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द प्रयोग करना, संविधान निर्माताओं के विचारों की हत्या करना है तथा स्वयं संविधान की भी अवहेलना करना है । धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करना, संविधान निर्माताओं की विचारधारा के विरोध में है । जब तक हम इसे समझेंगे नहीं, तब तक हम आगे नहीं बढ सकते । वास्तव में, हमारे मूल अधिकार ही हमारे मूल अधिकारों के विरोध में थे । वर्ष १९५० में देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित नहीं किया गया, उस समय कांग्रेस सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से धर्मनिरपेक्षता लागू कर दी । नेहरू और डॉ. आंबेडकर ने भी ने भी ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का उपयोग न करने की बात कही थी; किंतु वर्ष १९७६ में दोनों पक्षों की विचारधारा के साथ विश्वासघात हुआ । इस संवैधानिक संशोधन को किसी भी पर्याप्त बहुमत का समर्थन नहीं मिला । इसलिए यह संशोधन असंवैधानिक है और इसे एक वाक्य में निरस्त कर देना चाहिए । आपातकाल के समय जब लोग कारागार में थे, उस समय इस संशोधन को लागू करना असंवैधानिक था । इसलिए इसे बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए ।


सर्वधर्मसमभाव का पालन केवल हिन्दू राष्ट्र में ही संभव !


सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि ‘हिन्दू एक जीवनशैली है ।’ भारत के अज्ञानी लोग, चाहे वे पत्रकार हों, राजनेता हों, धर्मनिरपेक्ष प्रगतिवादी हों अथवा साम्यवादी, सभी तर्क देते हैं कि ‘धर्म’का अर्थ ‘रिलिजन’ है । तो फिर धर्म में एक उत्तम सामाजिक व्यवस्था का गुण कहां दिखाई देता है ? यदि आप आधुनिक प्रगति करना चाहते हैं अथवा अपने उपासना पंथ के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति करना चाहते हैं, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है; परंतु यहां एक अच्छी सामाजिक व्यवस्था का प्रश्न उत्पन्न होता है । कुछ लोगों को लगता है कि उनका पंथ सर्वोत्तम है व आपको उसे स्वीकार करना ही होगा । यदि आप ऐसा नहीं करते, तो वे आपको प्रलोभन देकर या डराकर अपने जाल में फंसाने का प्रयास करते हैं । ऐसे में एक उत्तम सामाजिक व्यवस्था के गुण लागू नहीं होते । इस्लाम का अध्ययन करना उचित है । आप भौतिक प्रगति करना चाहते हैं अथवा नहीं, यह आपकी इच्छा है । आप आध्यात्मिक साधना करना चाहते हैं या नहीं, यह भी आपकी इच्छा है; परंतु यदि यह विचार हो कि इस संसार में केवल इस्लाम ही रहेगा और इसके अतिरिक्त किसी को जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी, तो यह उचित नहीं है ।

यदि प्रत्येक व्यक्ति को धर्म-परिवर्तन करने हेतु बाध्य किया जाए और यदि वह ऐसा नहीं करता, तो उसके साथ धर्मग्रंथों के अनुसार व्यवहार किया जाए । यह विचारधारा उचित नहीं है । यह एक उत्तम सामाजिक व्यवस्था के गुणों को प्रदर्शित नहीं करती । इसलिए आज भी यदि हमें एक अच्छी सामाजिक व्यवस्था, सर्वसमावेशिता, सभी को समान व्यवहार और सभी के लिए समान लाभ चाहिए, तो धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को स्वीकार करना होगा । वास्तव में हिन्दू धर्म ही धर्मनिरपेक्ष है और वह सभी की प्रगति के लिए कार्य कर सकता है । इसी आधार पर हम हिन्दू राष्ट्र की कल्पना कर रहे हैं ।

– सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे

६. भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना आवश्यक !

सबसे पहले ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को परिभाषित करना होगा । उसके उपरांत न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा सभी राजनेताओं को उसी के अनुसार कार्य करना होगा । धर्मनिरपेक्षता इसलिए लागू की गई थी कि बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों को दबा देंगे, ऐसी आशंका थी । क्या इस्लामी देशों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं होते ? यदि हां, तो भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि वे सभी देश धर्मनिरपेक्षता अपनाएं; क्योंकि वहां अल्पसंख्यकों को खतरा है । यदि किसी इस्लामी देश में कोई खतरा नहीं और यदि आपका विश्वास है कि ईसाई देशों में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं, तो हम आपको आश्वस्त करते हैं कि हिन्दू राष्ट्र में भी किसी को कोई खतरा नहीं होगा ।

बहुमत ही कानून होता है और व्यवस्था बहुमत के अनुसार चलनी चाहिए, यही लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है । भारत में बहुसंख्यक हिन्दू हैं और यदि यह कहा जाता है कि हिन्दुओं को विद्यालयों में धर्मशिक्षा का अधिकार नहीं है, तो यह लोकतंत्र नहीं है । जो अधिकार अल्पसंख्यकों को दिए जाते हैं, वही बहुसंख्यकों को न देना असमानता है । इसलिए अल्पसंख्यकों को दिए अधिकार सभी हिन्दुओं को भी देकर समानता स्थापित करनी चाहिए । हिन्दू धर्म सर्वसमावेशी है और वह सभी के उत्थान का मार्ग दिखाता है  । इस पर विश्वास होना आवश्यक है । पहले से ही हम भारत में आए हुए यहूदी, शक, हूण, कुषाण आदि सभी का सम्मान करते आए हैं, हमने उनकी परंपराओं का संरक्षण किया है और भविष्य में भी कर सकते हैं । यदि बहुमत ही कानून है और यदि भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, तो भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित करना आवश्यक है ।

७. ब्रिटेन में धर्मगुरु को धार्मिक कानून बनाने का अधिकार

धर्म व राष्ट्र तथा राजा व धर्म के अद्वैत को मान्यता देते हुए राजा को विष्णु अवतार मानकर ‘नेशन स्टेट’ का एकीकरण हुआ । दोनों ही धर्मनिष्ठ थे । फलस्वरूप वह हिन्दू राष्ट्र था । १५वीं व १६वीं शताब्दी में यूरोप में जब राजा व चर्च के बीच संघर्ष था, तब निश्चित हुआ कि ‘राष्ट्र हमारा और शासन तुम्हारा ।’ इंग्लैंड धर्मनिरपेक्ष है, तब भी २० बिशप आधिकारिक रूप से ‘हाउस ऑफ लॉर्ड्स’ में नामित किए जाते हैं; उन्हें चुना नहीं जाता । वहां के बिशप धार्मिक कानून बनाते हैं । कोई धार्मिक कानून ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ द्वारा स्वीकार न भी हो, तो भी वह कानून बन जाता है; क्योंकि धार्मिक कानून बनाने का अधिकार केवल बिशप को है । वैसे ही भारत के संविधान में भी सनातन धर्म पर आधारित कानून बनाने हेतु ब्रिटिश पद्धति का अनुकरण किया होता, तो हमारे यहां भी धर्माचार्य धार्मिक कानून बना पाते । ऐसा प्रावधान न करना एक षड्यंत्र है ।

अंग्रेजों ने स्वयं कोई लिखित संविधान न रखते हुए, अपनी सुविधा के अनुसार संविधान में परिवर्तन किए; परंतु हमें लिखित संविधान अपनाने के लिए बाध्य करना, अंग्रेजों का बडा षड्यंत्र है । अत: हमें इन बातों पर विचार करना होगा । वहां धर्मगुरु और बिशप आधिकारिक रूप से ‘चर्च ऑफ इंग्लैंड’ का संचालन करते हैं । उसमें कोई समस्या नहीं है, तो भारत में हिन्दू राष्ट्र होने में क्या समस्या है ?

(क्रमशः)

– सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे, राष्ट्रीय मार्गदर्शक, हिंदू जनजागृति समिति