Karnataka CM Siddaramaiah : (और इनकी सुनिए…) देवता भी मद्यपान करते थे !

  • कांग्रेस-शासित कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या का धर्मद्रोही वक्तव्य l

  • मंत्रियों के मद्यपान के प्रति विरोध न होने का निर्लज्ज वक्तव्य l

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या

बेंगळुरू (कर्नाटक) – ‘आजकल बहुतांश लोग मद्यपान करते हैं । मेरे मंत्रिमंडल के मंत्री भी मदिरापान करते हैं । व्यक्तिगत रूप से मेरा मद्यपान के प्रति विरोध नहीं है’, ऐसा वक्तव्य कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या ने यहां एक कार्यक्रम में भाषण करते हुए दिया । मुख्यमंत्री ने आगे कहा, ‘‘मद्यपान केवल एक रुचि (पसंद) होना चाहिए ; परंतु वह मनुष्य का नियंत्रण छीन लेने वाला व्यसन नहीं बनना चाहिए । (रुचि के रूप में प्रारंभ किए गए मद्यपान का व्यसन में कब रूपांतरण हो जाता है, यह ज्ञात नहीं होता । अतः शासकों द्वारा ऐसा आत्मघाती परामर्श देना उचित नहीं है ! – संपादक) पुराणों में भी देवताओं द्वारा मद्यपान किए जाने के उल्लेख हैं ।’’

इस समय पुरानी स्मृतियों को पुनर्जीवित करते हुए उन्होंने एक बार संसद में हुई चर्चा का स्मरण कराया । ‘ग्रामों से नगरों में दुग्ध की आपूर्ति होती है; किंतु नगरों से ग्रामों में व्हिस्की, ब्रैंडी जैसी मदिरा भेजी जाती है’, इस तत्कालीन चर्चा का संदर्भ देते हुए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में मदिरा के बढते प्रभाव के विषय में अप्रसन्नता व्यक्त की । (एक ओर मदिरा के बढते प्रभाव के विषय में चिंता व्यक्त करना तथा दूसरी ओर मद्यपान का विरोध न करना, यह सिद्धरामय्या का दोहरा आचरण (चरित्र) है ! – संपादक)

संपादकीय भूमिका

  • कर्नाटक के करोडो हिन्दुओं के मतों से निर्वाचित होने वाले सिद्धरामय्या का ऐसे वक्तव्य देने का साहस होता है, यह कर्नाटक के समस्त हिन्दुओं के लिए लज्जास्पद है ! क्या हिन्दुओं को सिद्धरामय्या का यह वक्तव्य स्वीकार्य है ? हिन्दुओं को ऐसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संगठित होकर उन्हें हिन्दुओं से क्षमा याचना करने हेतु विवश करना चाहिए !
  • यह ध्यान दीजिए कि सिद्धरामय्या ऐसा वक्तव्य कभी अन्य पंथियों के श्रद्धास्थानों के संदर्भ में करने का साहस नहीं दिखाते !
  • ‘यदि सिद्धरामय्या ‘सुध-बुध’ (चेतना) में होते, तो उन्होंने ऐसा वक्तव्य नहीं दिया होता’, यदि किसी को ऐसा प्रतीत हो तो इसमें त्रुटि क्या है ?
  • समाज के सम्मुख शासकों को आदर्श स्थापित करना होता है । यदि शासक ही मद्यपान जैसी समाज-विघातक वस्तुओं का समर्थन करने लगें, तो समाज आदर्श के रूप में किसकी ओर देखेगा ? ‘यथा राजा तथा प्रजा’ के न्याय से भविष्य में समाज व्यसनाधीन बन सकता है, यह शासकों को विस्मृत नहीं करना चाहिए !