(और इनकी सुनिए…) ‘भारत को हिन्दू राष्ट्र कहना संविधान विरोधी !’– सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन मून

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के विरुद्ध परिवाद (शिकायत) प्रविष्ट !

नागपुर – ‘हमें हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के लिए कहते हैं; परन्तु हम कहते हैं कि, भारत यह हिन्दू राष्ट्र ही है, उसे घोषित करने की आवश्यकता ही नहीं है’, ऐसा मार्गदर्शन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवतजी ने कुछ दिनों पूर्व यहां के एक कार्यक्रम में किया था । इस प्रकरण में उनके विरुद्ध नागपुर के सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन मून ने पुलिस में लिखित परिवाद प्रविष्ट किया है । ‘सरसंघचालक का वक्तव्य यह संविधान के धर्मनिरपेक्षता, समानता, सर्वधर्मसमभाव एवं राष्ट्रीय एकात्मता इन मूलभूत तत्त्वों के विरुद्ध है । इससे समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण अथवा वैमनस्य निर्माण होने की संभावना है’, ऐसा परिवादकर्ता ने कहा है ।

परिवाद में आगे कहा गया है कि,

१. भारत को एक विशिष्ट धर्म से जोडने का प्रयत्न संविधान के धर्मनिरपेक्ष तत्त्वों से विसंगत है एवं स्वतंत्रता संग्राम के बलिदान, संविधानिक मूल्य एवं लोकतन्त्र की मूलभूत आत्मा को धक्का पहुंचानेवाला है ।

२. भारत यह विविध धर्म, भाषा, संस्कृति एवं परंपराओं का देश है एवं संविधान द्वारा दी गई ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र’ यह संकल्पना देश की एकता की आधारशिला है ।

संपादकीय भूमिका

  • परिवादकर्ता का आरोप अर्थात निराधार तर्क ही कहना होगा !
  • डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा लिखी गई मूल संविधान में कांग्रेस ने परिवर्तन कर ‘धर्मनिरपेक्षता’ एवं ‘समाजवाद’ ये शब्द घुसाए । परिवादकर्ता को कांग्रेस की यह कृति संविधान विरोधी नहीं लगती क्या ?
  • जिन्हें ‘हिन्दू राष्ट्र’ अर्थात क्या ?, यही ज्ञात नहीं है, उनका इस विषय में बोलना अर्थात अपनी बौद्धिक कंगाली दर्शाने का ही आचरण कहना होगा !