सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की घटना ।

नई दिल्ली – हिन्दू समाज को खुद एकजुट होना होगा । आप यह नहीं कह सकते कि “हम एक संप्रदाय के हैं और वे दूसरे के ।” यदि हिन्दू संप्रदाय दूसरों के लिए अपने द्वार नहीं खोलते, तो अंततः उनको ही हानि होगी। अनुच्छेद २५ (२)(ब) १९५० के दशक में इसी उद्देश्य से जोडा गया था, क्योंकि उस समय सामाजिक बहिष्कार की कुप्रथा प्रचलित थी । यह प्रावधान राज्य को सामाजिक कल्याण तथा सुधार के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, ऐसा अवलोकन सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमला मंदिर की घटना की सुनवाई के समय किया ।
न्यायालय ने आगे कहा कि हिन्दू धर्म में विभिन्न संप्रदायों के आधार पर मंदिरों में पूजा-अर्चना के संबंध में भेदभाव नहीं होना चाहिए । “हम एक संप्रदाय के हैं एवं वे दूसरे के, इसलिए वे हमारे मंदिर में नहीं आ सकते या हम उनके मंदिर में नहीं जा सकते” – ऐसी सोच हिन्दू समाज की मूल अवधारणा के अनुरूप नहीं है। यदि कोई संप्रदाय अपने मंदिरों के द्वार दूसरों के लिए बंद रखता है, तो अंततः उसी संप्रदाय को हानि हो सकती है । इसलिए व्यापक एकता तथा परस्पर स्वीकारना आवश्यक है ।
धार्मिक संप्रदायों की परंपराओं पर निर्णय लेना न्यायालय के लिए कठिन ।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी धार्मिक परंपरा को “आवश्यक” या “अनावश्यक” घोषित करने के मानदंड तय करना न्यायिक मंचों के लिए अत्यंत कठिन है । यह कार्य लगभग असंभव है। किसी हिन्दू संप्रदाय में जो परंपराएं प्रचलित हैं, वे सभी आवश्यक हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता, विशेषकर जब उनका प्रभाव नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था तथा स्वास्थ्य पर पडता हो । समाज सुधार के नाम पर राज्य कब हस्तक्षेप कर सकता है, इसके लिए कोई सार्वभौमिक दिशा-निर्देश देना कठिन है; यह प्रत्येक विषय के तथ्यों पर निर्भर करेगा ।
एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता में यह भी सम्मिलित है कि श्रद्धालु स्वयं तय करें कि वे पूजा कैसे और कब करें ।
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