कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और पारंपरिक ज्योतिषशास्त्र में भेद !

वर्तमान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण सभी क्षेत्रों में गति से परिवर्तन होता जा रहा है । अनेक क्षेत्रों में मनुष्य का काम कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा होने लगा है, जिससे अनेकों की नौकरियों पर संकट आ गया है । अन्य सभी क्षेत्रों की भांति पिछले कुछ दिनों में इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा ज्योतिष बतानेवाले कई ‘ऐप्स’ बाजार में (हाट में) आए हैं । सामाजिक माध्यमों पर इसके कई विज्ञापन देखने को मिले । इन विज्ञापनों में बताया गया है कि, ‘किसी ज्योतिषी को पैसे देकर भविष्य समझ लेने की अपेक्षा ‘एआई’ द्वारा अचूक भविष्य समझ लें !’ एक विज्ञापन में तो बताया है कि, ‘ज्योतिषी आप को धोखा देते हैं, आप को उनकी बातों में फंसाने का प्रयत्न करते हैं; परंतु ‘एआई’ वैसा नहीं करेगा । वह आप को आप का भविष्य अचूक बता पाएगा ।’ इन विज्ञापनों से स्पष्टरूप से ध्यान में आता है कि उनका उद्देश्य ‘लोग ज्योतिषशास्त्र का महत्त्व समझ पाएं, इसकी अपेक्षा ग्राहकों को आकर्षित करने का अधिक है ।’ ‘केवल दिनांक बताएं और अपना भविष्य समझ लें’, ऐसे मूर्खतापूर्ण विज्ञापन भी देखने को मिलते हैं । अनेक विख्यात अभिनेता-अभिनेत्रियों तथा विख्यात व्यक्तियों के माध्यम से विज्ञापन किए जाते हैं । यहां एक बात की ओर ध्यान देना आवश्यक है कि, ‘ज्योतिषी आप को धोखा देते हैं’, ऐसा इन विज्ञापनों के माध्यम से बतानेवाले स्वयं इन ‘ऐप्स’ के माध्यम से एक प्रकार से  लोगों को धोखा ही दे रहे हैं । ऐसा ध्यान में आता है कि, अधिकांश विज्ञापनदाताओं का उद्देश्य ‘व्यक्ति की समस्याओं का समाधान होकर वह आनंदमय जीवन जी पाए’, इसकी अपेक्षा ‘इस व्यवसाय के माध्यम से अधिकाधिक ग्राहकों को आकर्षित कर धन प्राप्त करना है ।’ 

१. पारंपरिक ज्योतिषशास्त्र का महत्त्व

श्री. श्रेयस पिसोळकर

 ज्योतिषी कैसा होना चाहिए ?  इस संदर्भ में हमारे शास्त्रों में बताया गया है । ज्योतिषी देश, काल, परिस्थिति का भान रखनेवाला और तद्नुसार मार्गदर्शन करनेवाला होना चाहिए । कुंडली देखकर व्यक्ति को केवल समस्या बताने की अपेक्षा उसपर उसकी क्षमतानुसार उचित उपाय और उपासना बताकर मार्गदर्शन करना आवश्यक होता है । इस प्रकार से व्यक्ति की सहायता करते समय उसे जीवन की समस्याओं में से बाहर निकालकर आगे ले जाना अपेक्षित होता है । इसलिए ज्योतिषी की अपनी साधना होना भी आवश्यक होता है । ज्योतिषी का अपना आचरण शुद्ध होना महत्त्वपूर्ण है । व्यक्ति को मार्गदर्शन करते समय षड्रिपुओं के अधीन होने की अपेक्षा उसे तत्त्वनिष्ठता से मार्गदर्शन करना आवश्यक होता है । ज्योतिषी ईश्वरनिष्ठ और धर्मनिष्ठ होना चाहिए, साथही वह जितेंद्रिय (सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त किया हुआ) होना चाहिए । ज्योतिषशास्त्र केवल बुद्धि से अध्ययन करने का शास्त्र नहीं; किंतु ‘व्यक्ति को कौनसे उपायों से लाभ हो सकता है’, इसका विचार कर ‘अंत:प्रेरणा से उपाय बताने’ का शास्त्र है । इसलिए ईश्वर से प्रार्थना कर व्यक्ति को उपाय बताने पर उसके द्वारा उसकी समस्या का समाधान होने के लिए प्रयत्न करने होते है । यह केवल गुरु से ज्योतिषशास्त्र की शिक्षा प्राप्त और उनके अनुभवों से सिद्ध ज्योतिषियों के माध्यम से ही संभव है ।

२. कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात ज्योतिषी नहीं, परंतु केवल गणकयंत्र (कैलक्युलेटर) !

वर्तमान में कुंडली सिद्ध करना, स्पष्ट ग्रहस्थिती बताना आदि के लिए अनेक ज्योतिषी संगणकीय प्रणाली का (‘सॉफ्टवेअर’ का) उपयोग करते हैं । इस माध्यम से गणित न्यून समय में होकर समय की बचत होती है । साथही कुंडली तुरंत बन जाती है; परंतु पारंपरिक गणित के माध्यम से भी यह सब करने का ज्ञान होना महत्त्वपूर्ण है । वर्तमान में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा कुंडली का फल और उपाय बताना, व्यक्ति के जीवनात कौनसी घटना कब घटेगी ?’, इत्यादि कुछ ‘ऐप्स’ के माध्यम से बताना आरंभ हुआ है । इसमें पहले से ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जो जानकारी दी जाती है, केवल उसी के द्वारा ही वह मार्गदर्शन कर सकता है; परंतु उपरोक्तानुसार ज्योतिषी को स्थल, काल, परिस्थिती और व्यक्ति की परिस्थिती का भान होना आवश्यक होता है, वह कहांसे आएगा ? सभी को वह उसे (‘एआई’ को) सिखाए उपाय बताते जाएगा ! इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग हम केवल गणकयंत्र (कैल्कयुलेटर) के रूप में  गणित करने तक ही समझ सकते है; परंतु कुंडली का फल कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा समझ लेना, दिग्भ्रमित करनेवाला होगा तथा उतना लाभदायक नहीं रहेगा, ऐसा लगता है । साथही इसमें जो अंत:प्रेरणा का घटक है, वह कहीं भी नहीं है । इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा प्राप्त कुंडली के फल का अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णयों के संदर्भ में कितना विचार करना है, यह बात हर कोई निश्चित कर सकता है । उपर बताएनुसार गुण जिस ज्योतिषी में हैं, ऐसे ज्योतिषी से हम मार्गदर्शन लेकर प्रयत्न करेंगे, तो लाभ होगा, यह निश्चित !

३. ज्योतिषियों को दक्षिणा देने का शास्त्र

शास्त्र ने ज्योतिषियों को जो दक्षिणा देने को बताया है, उसका उद्देश्य केवल ‘ज्योतिष बतानेवाले व्यक्ति का जीवन-यापन चले’, इतना ही नहीं; अपितु ‘उनके द्वारा बताए उपायों का पूर्णरूप से लाभ हो’, ऐसा होता है । साथही ज्योतिषी को दी दक्षिणा के माध्यम से व्यक्ति का त्याग होकर उसे उसका लाभ होता है; परंतु केवल बुद्धि द्वारा इस शास्त्र का अध्ययन करनेवालों की समझ में यह नहीं आएगा । ज्योतिषशास्त्र विज्ञान का भाग है, तब भी विज्ञान को अध्यात्म का साथ होने पर ही उसकी दिशा उचित रहती है । अन्यथा दिशाहीन वैज्ञानिक प्रगती मनुष्य का पतन करेगी, इसमें कोई संदेह नहीं ।

४.  पारंपरिक ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण !

वर्तमान में हम तीसरे महायुद्ध की दहलीज पर खडे हैं । महायुद्ध के समय में आधुनिक साधन उपलब्ध होंगे ही, ऐसा नहीं है । ऐसी स्थिति में इस शास्त्र का हमें जतन करना हो, तो किसी आधुनिक माध्यमों पर निर्भर न होनवाले पारंपरिक ज्योतिषशास्त्र का आधार लेना और उसका अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण है ।

‘हमारे ऋषिमुनियों द्वारा सिद्ध ज्योतिषशास्त्र का उचित लाभ लेने की बुद्धि सभी को हो’, ऐसी ईश्वर के चरणों में प्रार्थना !

– श्री. श्रेयस पिसोळकर (वास्तूविशारद, ज्योतिष होराभूषण, होरारत्न), फोंडा, गोवा. (८.२.२०२६)