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मुंबई – जैन धर्म मूलतः हिन्दू संस्कृति का ही अविभाज्य अंग है । मुगलों तथा अंग्रेजों के पश्चात कांग्रेस ने ‘विभाजित करो एवं शासन करो’ की कुटिल नीति से हिन्दू समाज के खंड-खंड कर दिए । अब जैन समाज के लिए यह ‘अल्पसंख्यक’ नामक दासता की मानसिकता तथा स्तर को त्याग कर मुख्यधारा में आने का समय आ गया है, इन स्पष्ट शब्दों में राज्य के कैबिनेट मंत्री श्री मंगलप्रभात लोढा ने हिन्दू अस्मिता की हुंकार भरी । एक दैनिक समाचार पत्र को दिए गए साक्षात्कार में वे बोल रहे थे ।
उन्होंने कहा :

१. एक समय दक्षिण भारत में २२ से २३ प्रतिशत के लगभग रहनेवाला जैन समाज आज केवल ३ प्रतिशत पर सिमट कर रह गया है । यह केवल आंकडे नहीं हैं, अपितु एक बडे राजनीतिक षड्यंत्र का परिणाम है ।
२. मुसलमान समाज में अनेक जातियां होने के उपरांत भी कांग्रेस ने उन्हें संगठित रखा; किंतु हिन्दू समाज को जाति-धर्म में विभाजित कर दुर्बल कर दिया ।
३. यदि समाज में व्यापक सहमति निर्मित होती है, तो जैन समाज को ‘अल्पसंख्यक’ स्तर से बाहर निकालने के लिए आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया कार्यान्वित की जाएगी । श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समान ही अब पुनः एक बार ‘हम हिन्दू हैं’ इस भावना को प्रबल करने की ऐतिहासिक आवश्यकता है ।
४. जिस जैन समाज ने विश्व को अहिंसा तथा मानवता का संदेश दिया, उन्हें हिन्दू धर्म से पृथक करना सांस्कृतिक द्रोह है ।
५. राजनीतिक लाभ के लिए थोपा गया ‘अल्पसंख्यक’ का यह ठप्पा अब पोंछ डालने का समय आ गया है । जैन धर्मावलंबियों की पूजा पद्धति भिन्न हो सकती है ; परंतु सांस्कृतिक जडें हिन्दू धर्म में ही समाहित हैं ।

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