सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ओजस्वी विचार

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

‘बुद्धिप्रमाणवादियो में जिज्ञासा न होने से, उन्हें जितना ज्ञान है, उतने तक ही वे स्वयं को सीमित रखते हैं । उन्हें आगे की सूक्ष्म या उच्च बातों का ज्ञान नहीं हो पाता ।’


चुनाव में खडे होनेवाले प्रत्याशियो, यह ध्यान रखो !

‘जिसमें राष्ट्रप्रेम एवं धर्मप्रेम नहीं है तथा चुनाव में खडे प्रत्याशी से पैसे लेकर जो उसे मत देती है, ऐसी जनता के प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने की अपेक्षा ईश्वर द्वारा भक्त के रूप में चुना जाना अनंत गुना अधिक महत्वपूर्ण है, यह ध्यान में रखो !’


अहंकारी बुद्धिवादियों की मर्यादा !

‘बुद्धिवादियों को विज्ञान का कितना भी अहंकार हो, परंतु उन्हें यह ध्यान में रखना चाहिए कि वे छोटे से छोटा एक कोशिकीय जीव तो क्या, बाहरी वस्तुओं का उपयोग किए बिना, पत्थर का एक कण भी नहीं बना सकते । इसके विपरीत ईश्वर ने लाखों कोशिकाओं से युक्त मानव और अनंत कोटि ब्रह्मांड बनाए हैं ।’


हास्यास्पद साम्यवाद !

‘अध्यात्म के ‘प्रारब्ध’ शब्द की तथा ईश्वर की पूर्ण अनदेखी करने के कारण साम्यवाद १०० वर्ष में ही समाप्त होने की कगार पर है !’


‘हिन्दू’ शब्द की सर्वव्यापकता !

‘हिन्दू’ शब्द की व्युत्पत्ति है, ‘हीनान् गुणान् दूषयति इति हिंदुः ।’ अर्थात ‘हीन, कनिष्ठ, रज एवं तम गुणों का नाश करनेवाला ।’ कितने हिन्दुत्वनिष्ठ संगठन अपने कार्यकर्ताओं को यह सिखाते हैं ?’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले