पूर्व की भारत की विदेश नीति एवं वर्तमान में भारत द्वारा अपनाई जा रही विदेश नीति के मध्य जनता को भी स्पष्ट भेद दिखाई दे रहा है । विदेश नीति अथवा विदेश विभाग क्या कार्य करता है ? अथवा इस विभाग की अधिक जानकारी भी भारतीयों को नहीं थी । भारतीयों की खाड़ी देशों में उत्पन्न तनाव से भारतीयों को मुक्त करना , कनाडा द्वारा भारतीय राजदूत को वहां से निकालने के पश्चात उसी भाषा में कनाडा को उत्तर देते समय भारत में उनके राजदूत को निकालना , ‘जी २०’ परिषद के समय संयुक्त घोषणापत्र पर प्रथम ही दिन सभी देशों की सहमति बनाना , कतर जैसे खाड़ी देश में ८ भारतीयों को हुई मृत्युदंड की शिक्षा निरस्त करवाकर उन्हें सुरक्षित स्वदेश लाना , अमेरिका के साथ चल रहे कर-युद्ध जैसे अनेकविध प्रसंगों में भारतीयों ने विदेश नीति की झलक अनुभव की ।

१. भगवान हनुमान एवं भगवान श्री कृष्ण की नीतियों का संयोग

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने पुणे के एक कार्यक्रम में बताया था , “देश की विदेश नीति रामायण एवं महाभारत की भांति करने का प्रयास कर रहे हैं , अर्थात ‘रामायण’ में हनुमानजी ने शत्रु के विरुद्ध जो नीति अपनाई और ‘महाभारत’ में उपयोग की गई कृष्णनीति का उपयोग हम विदेश की नीतियां बनाते समय अथवा निर्णय लेते समय कर रहे हैं।” भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात कांग्रेस के स्वार्थांध एवं देशविरोधी शासनकाल के बाद भारत में ऐसा प्रथम बार हो रहा है कि विदेश नीति के लिए हिंदू धर्मग्रंथों की शिक्षा का आधार लिया जा रहा है। ‘भारत की विदेश नीति और भी कठोर एवं तीव्र होनी चाहिए’ , ऐसा ही प्रत्येक भारतीय को लगता है।
२. जम्मू-काश्मीर प्रश्न पर अधिक कठोर होना चाहिए !
पाकिस्तान निरंतर संयुक्त राष्ट्र में जम्मू-काश्मीर विषयक वक्तव्य देता रहता है। उसमें मुख्य रूप से ‘काश्मीरियों को आत्मनिर्णय का अधिकार देना , काश्मीर प्रश्न सुलझने पर भारत-पाक तनाव कम होगा , काश्मीर के स्थानीय लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं’ , ऐसे विभिन्न वक्तव्य पाक देता रहता है। एक ओर काश्मीर प्रश्न के विषय में संयुक्त राष्ट्र में बोलना और दूसरी ओर वहाँ आतंकवादी गतिविधियाँ भी जारी रखना , साथ ही ‘संसार के समक्ष निरंतर भारत से चर्चा करने के लिए हम सिद्ध हैं; परंतु भारत प्रतिकूल है’ , ऐसा चित्र निर्माण करना। इसके कारण भारत का पक्ष आक्रामक रूप से प्रस्तुत करने के साथ ही पाक पर प्रत्यक्ष कार्यवाही करना भी आवश्यक है। वास्तव में भारत को ही पहल करके पाक अधिकृत काश्मीर की जनता पर पाकिस्तान किस प्रकार अत्याचार कर रहा है और वहाँ कैसी अराजकता की स्थिति है , इसे प्रस्तुत करते रहना आवश्यक है , अर्थात काश्मीर प्रश्न पर अधिक कठोर एवं आक्रामक होने की आवश्यकता है।
भारत को ‘वैश्विक शक्ति’ के रूप में देखने हेतु विवश करें !

‘जागतिक संघर्ष के काल में (उदा. रूस-यूक्रेन अथवा खाड़ी देश) भारत ने ‘शांतिदूत’ के रूप में स्वयं की भूमिका स्पष्ट एवं सक्रिय करनी चाहिए, साथ ही संसार को भारत की ओर केवल एक बाजार के रूप में नहीं , अपितु एक ‘उत्तरदायी वैश्विक शक्ति’ के रूप में देखने हेतु विवश करना आवश्यक है । इस्राइल एवं हमास संघर्ष के समय भारत ने फिलिस्तीन की संप्रभुता का विषय बताया , फिर भी हमास के आतंकवादियों को आश्रय देने के सूत्र पर भारत ने कठोर निंदा क्यों नहीं की ? जो देश आतंकवाद के विरुद्ध कठोर एवं स्थायी कार्यवाही कर रहे हैं , उन्हें भारत को समर्थन देना चाहिए। केवल वैश्विक स्तर पर स्वयं की संतुलित , शांतिवादी छवि बनाए रखने का ऐसे समय में कोई अर्थ नहीं रहता । जो अनुचित है , उसे ‘अनुचित’ कहने का साहस भारत को दिखाना चाहिए !
– श्री. यज्ञेश सावंत
३. बांग्लादेश को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कार्यवाही की चेतावनी

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर प्रतिदिन अत्याचार होने की घटनाएं घटती रहती हैं । सामूहिक रूप से हिंदुओं की हत्या करना , हिंदू युवतियों-महिलाओं पर सामूहिक अत्याचार करना , तुच्छ कारणों से हिंदुओं की हत्या जैसी घटनाएं हो रहीं हैं । पाक एवं बांग्लादेश के हिंदुओं पर अत्याचार होने के कारण उन्हें भारत में आश्रय देने के लिए केंद्र सरकार ने कानून बनाए हैं; परंतु केवल कानून बनाकर भारत में बसाना इसका उत्तर नहीं है , अपितु हिंदुओं पर यदि अत्याचार होता है तो उसी समय कठोर शब्दों में निंदा करके आवश्यकता पड़ने पर कार्यवाही की चेतावनी देना अथवा प्रत्यक्ष कार्यवाही करना आवश्यक है । बांग्लादेश और शत्रुदेश पाकिस्तान कठोर निंदा से भले ही न मानें , परंतु वर्तमान में घूमा फिरा कर उत्तर दिए जाने की पद्धति के कारण हिंदू समाज का आत्मविश्वास निश्चित ही कम होता है । बांग्लादेश पर कार्यवाही करने की मानसिकता में वर्तमान में न रह पाने पर भी , गंभीर परिणामों की चेतावनी , आवश्यकता पड़ने पर कूटनीति से उनकी आर्थिक नसें दबाने की भूमिका भारत को निरंतर लेते रहनी चाहिए ।
४. चीन के अरुणाचल प्रदेश पर दावे का प्रत्युत्तर चाहिए !
भारत के अविभाज्य अंग अरुणाचल प्रदेश में यदि भारत के प्रधानमंत्री जाते हैं अथवा केंद्र सरकार वहां कोई कार्यक्रम आयोजित करती है तो चीन अत्यंत क्रोधित होता है और निंदा करता है । वास्तव में पहले ही चीन ने भारत का अक्साई चीन , शक्सगाम वैली जैसा कुल ४३,१८० वर्ग कि.मी. से अधिक भूभाग हड़प लिया है , फिर भी उस विषय में कुछ बोलना तो दूर; चीन भारत के अविभाज्य भूभाग पर दावा कर रहा है । भारत केवल खोखली निंदा करने के अतिरिक्त कुछ नहीं करता । अब भारत को भी चीन के तिब्बत , हांगकांग एवं ताइवान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर बोलना आवश्यक है । तिब्बत के लोगों को स्वायत्तता देना , हांगकांग पर चीन के नियंत्रण को अस्वीकार करना एवं ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में समर्थन देना, ऐसे सूत्रों पर भारत को चीन को सुनाते रहना चाहिए । सभी भारतीयों के लिए अत्यंत पवित्र एवं भगवान शिव का निवास स्थान कैलाश पर्वत एवं मानसरोवर तिब्बत में ही है। इसलिए तिब्बत पर चीन के अवैध नियंत्रण के विरुद्ध भारत को आवाज उठानी चाहिए ।
वैश्विक नेतृत्व बनने हेतु कदम उठाने चाहिए !

भारत का समावेश विकासशील देशों में है , अर्थात पाश्चात्य दृष्टि में भारत विकासशील है , जबकि यूरोप , अमेरिका विकसित देश हैं । भारत में निर्धनता , बेरोजगारी , मलिन बस्तियां इत्यादि की ओर संकेत करके ‘विकासशील’ कहा जाता है; परंतु देश की इन समस्याओं के लिए भारत पर अब तक राज्य करनेवाले शासक उत्तरदायी हैं । भारत का जो भाग नहीं दिखाया जाता , वह है अपार आध्यात्मिक संपदा , ज्ञान का भंडार , भारत के मूल्य , संस्कार , प्राचीन शास्त्र इत्यादि किसी भी देश के पास नहीं हैं । भारत की इस अमूल्य निधि के विषय में वैश्विक स्तर पर विषय प्रस्तुत करके यह बताना होगा कि ‘भारत एक प्राचीन वैभवसंपन्न एवं ज्ञानसंपन्न राष्ट्र है । भारत के पास जो शास्त्रज्ञान है वह संसार में किसी के पास नहीं है , भारत ही सभी शास्त्रों एवं तकनीक का मूल है । मानव के वास्तविक विकास (आध्यात्मिक उन्नति) का सर्वोच्च मार्ग एवं आदर्श भारत के पास ही है’ । संसार को यह विश्वास दिलाना होगा कि ‘वैश्विक समस्याओं का उत्तर केवल भारत के पास ही है’ । अफ्रीकी , लैटिन अमेरिकी एवं एशियाई देशों की समस्याओं को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करते रहना साथ ही इन देशों की आवाज बनकर भारत को अपना वैश्विक स्थान और भी सशक्त करना आवश्यक है ।
– श्री. यज्ञेश सावंत
५. श्रीलंका को दबाव में रखना
श्रीलंका और पाकिस्तान भारतीय मछुआरों को सीमा उल्लंघन के कारण अनेक बार बंदी बनाते हैं । जिस श्रीलंका को भारत बड़े स्तर पर सहायता करता है वह श्रीलंका, भारतीय मछुआरों और वहां के सिंहली हिंदुओं पर दादागिरी करता है । चीन की जासूसी करनेवाली नौकाओं , पनडुब्बियों को अपने बंदरगाहों पर आने की अनुमति देता है , उस श्रीलंका को दबाव में रखना आवश्यक है । भारत सरकार की नीति पड़ोसी देशों के स्वतंत्र अस्तित्व का समर्थन एवं उनके साथ अच्छे संबंध रखने की होने पर भी जब पड़ोसी देश भारतविरोधी भूमिका लेंगे तब कठोर कदम उठाकर उन्हें भारत की शक्ति की झलक दिखाना आवश्यक है । कुछ वर्षों पूर्व भारत को घेरने का प्रयास किया गया था; परंतु भारतीय गुप्तचरों ने कुशलता दिखाते हुए पड़ोसी देशों में जाकर इस चक्रव्यूह को भेदकर देश को मुक्त किया । इसलिए अब विदेश विभाग का वास्तविक उत्तरदायित्व है कि भारत के पड़ोसी देशों में भारत का शक्तिशाली स्थान रेखांकित हो ।
६. खालिस्तानियों को संरक्षण देनेवालों पर दृष्टि टेढ़ी करनी चाहिए !

कनाडा में खालिस्तानी आंदोलन बढने के लिए मुक्त वातावरण एवं सुविधाएं पूर्व की सरकार ने उपलब्ध कराईं । खालिस्तानी आतंकवादी कभी कनाडा से तो अब अमेरिका से ‘भारत का विमान बम से उड़ा देंगे , भारत के अमुक शहर में बम विस्फोट करेंगे , भारत को ध्वस्त कर देंगे’ , ऐसी धमकियां देते हैं और भारतीय सुरक्षा तंत्र को कार्य में लगाते हैं । खालिस्तानवादियों को आश्रय देनेवाले देशों को भारत उजागर करे । उसके लिए संयुक्त राष्ट्र के मंच का उपयोग करे । खालिस्तानवादियों को भारत के अधिकार में देने की मांग जारी रखे । भारत एवं भारतीयों की सुरक्षा को ही सर्वोच्च प्राथमिकता मानकर आवश्यकता पड़ने पर संबंधित देशों को व्यापार , रक्षा एवं सहयोग जैसे स्थानों पर जहां संभव हो वहां संकट में डालना चाहिए।
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान मांगे !

‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ अमेरिका के हाथ की कठपुतली बन गई है । इस परिषद के लिए अमेरिका ही अधिक दान देता है । प्रत्यक्ष में भी यह परिषद वर्तमान में विभिन्न देशों में चल रहे संघर्ष के काल में निष्प्रभावी सिद्ध हो रही है और इसकी व्यर्थता भारत को उजागर करनी ही चाहिए । उसमें सुधार लाने के लिए , साथ ही भारत को स्थायी सदस्यता प्राप्त करने के लिए आक्रामक एवं निरंतर कूटनीति का संकल्प करना आवश्यक है । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सदस्यता न मिलने पर भारत को पहल करके नवीन सुरक्षा परिषद की घोषणा करनी चाहिए और उसमें सम्मिलित होने का आवाहन वैश्विक शक्तियों से करना चाहिए एवं भारत यह सहजता से कर सकता है ।
– श्री. यज्ञेश सावंत
७. मालदीव को निर्णायक सीख देनी चाहिए !
मालदीव जैसा छोटा सा देश जिसकी अर्थव्यवस्था ही भारतीय पर्यटकों पर निर्भर है , वह भारत की ओर आंखें दिखाता है और धमकाता है । ‘यह भारत की विदेश नीति की असफलता है’ , ऐसा यदि किसी को लगे तो इसमें क्या गलत है ? ऐसे छोटे देशों को भारत निर्णायक सीख देकर कार्यवाही की चेतावनी दे । छोटे देश भारत को चुनौती देने लगें तो संसार इसे ‘भारत की दुर्बलता’ की दृष्टि से देखता है । इसलिए मालदीव को आर्थिक बहिष्कार के साथ सीधे सैन्य कार्यवाही की चेतावनी देनी चाहिए ।
८. ‘ओआईसी’ को चेतावनी

संसार के ५७ मुसलमान देशों का संगठन ‘ओआईसी’ , अर्थात ‘इस्लामी सहयोग संगठन’ भारत में दंगा होने पर अथवा काश्मीर विषयक कोई घटना होने पर भारत में हस्तक्षेप करता है । भारत की निंदा आदि करने का साहस करता है । पाक इस संगठन द्वारा ‘इस्लामी नाटो’ बनाने का प्रयास कर रहा है । ‘ओआईसी’ को चेतावनी देने के साथ ही ‘चीन में उइघुर मुसलमानों पर अत्याचार , अमेरिका जैसे बलशाली देश द्वारा ईरान एवं अन्य मुसलमान देशों पर प्रत्यक्ष आक्रमण होते समय यह संगठन कुछ नहीं बोलता’ , यह पक्ष प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करना चाहिए । इसके साथ ही इस संगठन की अकर्मण्यता एवं अस्तित्व के विषय में संसार में प्रश्न निर्माण करना आवश्यक है ।
गुडी पाडवा हिंदुओं का नववर्षारंभ दिवस है । इसलिए भारत अपने प्राचीन काल में झांककर , साथ ही दैवी शक्तियों का जागरण करके संसार को अपने आध्यात्मिक नेतृत्व से बांधने का और संसार में अपनी कूटनीति का डंका बजाने का संकल्प करे !
श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ।
Europe Heatwave : यूरोप में उष्णता की लहर – तापमान ४० अंश सेल्सियस से अधिक ।
Obesity Among Children : यूरोपीय देशों की भांति भारत के बच्चों में बढ रहा है मोटापे का संकट ।
(और इनकी सुनिए…) ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन होने पर भारत की आलोचना करने से पीछे नहीं हटेंगे !’ – US Lawmakers
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India UAE BrahMos Deal : संयुक्त अरब अमीरात भारत से ‘ब्राह्मोस’ क्षेपणास्त्र क्रय पर कर रहा है चर्चा !
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