किसी व्यक्ति की ‘अंतर्मुखता’ दर्शानेवाले ग्रहयोगों का विवेचन !

‘साधना में अंतर्मुखता का अग्रस्थान है । कुछ व्यक्तियों में उनके पूवर्जन्मों की साधना के कारण अंतर्मुखता मूलतः ही होती है; जबकि कुछ लोगों को उसे प्रयास कर स्वयं में अंतर्भूत करना पडता है । जन्मपत्रिका के द्वारा व्यक्ति की मूल अंतर्मुखता कितनी है, इसका बोध हो सकता है । अंतर्मुखता का महत्त्व एवं अंतर्मुखता दर्शानेवाले ग्रहयोगों का विवेचन आगे दिया गया है ।

 १. अंतर्मुखता का महत्त्व

१ अ. अंतर्मुखता के कारण जीवन की समस्याओं के मूल कारण जान लेना संभव होना : ‘अंतर्मुखता अर्थात स्वयं के विचार, उद्देश्य एवं कृति के निरीक्षण की अथवा आत्मपरीक्षण करने की वृत्ति !’ व्यक्ति का बाह्यमन चंचल एवं उछले स्वरूप का होता है, जबकि अंतर्मन स्थिर एवं गहन होता है । अंतर्मुख होने का अर्थ है अंतर्मन की खोज करना, साथ ही अंतर्मन में समाहित कामना, धारणा, आदतें, संस्कार आदि की समीक्षा करना ! अंतर्मुखता के कारण व्यक्ति जीवन की समस्याओं की जड तक जा सकता है । मूल समस्या ज्ञात होने से वह उस पर उचित उपाय कर सकता है ।

१ आ. अंतर्मुखता के कारण अध्यात्म की यात्रा आरंभ होना : अध्यात्म में अंतर्मुखता का बडा महत्त्व है । अंतर्मुखता के कारण ही साधना की यात्रा आरंभ होती है । मानवीय मन स्वभावतः बहिर्मुख होता है । वह बाह्य एवं स्थूल बातों में सुख ढूंढने का प्रयास करता है; परंतु इन बातों से मिलनेवाला सुख शारीरिक एवं मानसिक स्तर का होता है, साथ ही वह तात्कालिक होता है । बाह्य बातों से आंतरिक शांति नहीं मिलती तथा किसी न किसी बात का अभाव प्रतीत होता रहता है ।

जीवन व्यतीत करते समय मनुष्य को अनेक अच्छे-बुरे अनुभव होते रहते हैं तथा इन अनुभवों से ही वह तैयार होता रहता है । इस यात्रा में किसी दिन उसके मन में, ‘मेरा यह जीवन किसलिए है ? मेरा जन्म किसलिए हुआ है ? मेरा ध्येय क्या है ?’ आदि प्रश्न उठते हैं । अर्थात ही वह जीवन का अर्थ खोजने के लिए प्रेरित होता है । उस समय वह अंतर्मुख हुआ होता है । यह अंतर्मुखता उसे अध्यात्म के पथ पर ले जाती है । अंतर्मुख स्थिति में उसे आनंद एवं शांति की अनुभूति होती है । पहले की आदतें तथा चित्त के संस्कारों के कारण उसका मन पुनः-पुनः बहिर्मुख होता रहता है; परंतु वह पुनः अंतर्मुख होने का प्रयास करता है । जैसे-जैसे उसकी अंतर्मुखता बढती जाती है, वैसे-वैसे उसके मन की स्थिरता बढती जाती है ।

श्री. राज कर्वे

१ इ. अंतर्मुखता के कारण साधना में होनेवाले लाभ

१. अंतर्मुखता के कारण व्यक्ति अन्यों की चूक न देखकर स्वयं की चूक देखता है । उसके कारण उसे स्वयं में स्थित अभावों का भान होकर स्वयं में परिवर्तन लाना संभव होता है ।

२. व्यक्ति उसकी कृति के पीछे के विचारों एवं उद्देश्यों का निरीक्षण करता है । उसके कारण उसकी चिंतनशीलता, प्रामाणिकता एवं सत्यनिष्ठा बढती है ।

३. व्यक्ति असत्य कथन करना, स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना, प्रसिद्धि अर्जित करने के लिए प्रयास करना, झूठी प्रतिमा खडी करना आदि करने से परावृत्त होता है । उसके कारण उसके मन की सात्त्विकता बढती है ।

४. जीवन में अनिष्ट प्रसंग घटित होने पर, ‘इस प्रसंग से ईश्वर को मुझे तैयार करना है’, यह दृष्टिकोण रखकर वह सकारात्मक रहने का प्रयास करता है ।

५. वह अधिकार, पैसा, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि आदि के पीछे नहीं लगता । वह आवश्यकता हो उतनी ही सीमित व्यावहारिक कृतियां कर अपनी आंतरिक स्थिरता बनाए रखने का प्रयास करता है ।

६. ईश्वर के आंतरिक सान्निध्य में रहने के कारण उसके आनंद में वृद्धि होती है ।

७. वह अन्यों की सहायता करने का प्रयास करता है; उसके कारण उसमें व्यापकता बढती है ।

८. ‘राष्ट्र एवं धर्म मुझे क्या लाभ देंगे ?’, इसकी अपेक्षा वह विचार करता है, ‘मैं राष्ट्र एवं धर्म के लिए क्या योगदान दे सकता हूं ?’

९. अंतर्मुखता जितनी बढती है, उतनी सत्यनिष्ठता, प्रीति, स्थिरता, आनंद एवं शांति बढती है ।

२. अंतर्मुखता को प्रभावित करनेवाले कुछ घटक

अ. बचपन के संस्कार : बचपन में परिजनों से व्यक्ति को धर्माचरण, सदाचरण, साधना आदि के संस्कार मिले हों, तो उससे उसके व्यक्तित्व में अंतर्मुखता बढने में सहायता मिलती है ।

आ. व्यक्ति की बढती आयु : जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढती है, वैसे-वैसे वह और अनुभवी होता जाता है । अनुभवों के कारण उसकी प्रगल्भता बढती जाती है । सामान्यतः युवावस्था में ऊर्जा, बल एवं उत्साह बहुत होने से व्यक्ति में विचारशीलता अल्प होती है; परंतु वह जैसे-जैसे वयस्क होता जाता है, वैसे-वैसे उसमें विवेक बढता जाता है ।

इ. समाज की मानसिकता : व्यक्ति पर समाजमानस का बडा प्रभाव होता है । समाज की मानसिकता यदि बहिर्मुखी अथवा अंतर्मुखी जैसी होती है, उसके अनुसार व्यक्ति के व्यक्तित्व पर परिणाम होता है ।

ई. पूर्वजन्मों के संस्कार : व्यक्ति ने यदि पूर्वजन्मों में धर्माचरण अथवा साधना की हो, तो उसके चित्त पर सात्त्विकता के संस्कार होते हैं । अगले जन्म में जीव के साथ ये संस्कार भी उसके साथ आते हैं । ये संस्कार यदि प्रबल हों, तो व्यक्ति के आस-पास का वातावरण भले ही बहिर्मुख हो, तब भी उसमें स्थित अंतर्मुखता का दीप प्रज्वलित रहता है तथा उचित अवसर मिलने पर वह प्रकाशमान होता है ।

उक्त घटकों में से ‘पूर्वजन्मों के संस्कार’, यह घटक जन्मपत्रिका से ज्ञात हो सकता है; क्योंकि जन्मकुंडली प्रारब्ध की दर्शक होती है । नवग्रहों में से कौन-से योग व्यक्तित्व में अंतर्मुखता दर्शाते हैं, यह अब देखेंगे ।

क्रियमाण का उपयोग कर अंतर्मुखता बढाना संभव

जन्मकुंडली में स्थित ग्रहयोग व्यक्ति की मूलभूत प्रवृत्ति के दर्शक होते हैं; परंतु वे मनुष्य के भविष्य के निर्णायक घटक नहीं होते हैं । जन्मकुंडली में भले ही अंतर्मुखता दर्शानेवाले योग अल्प हों, तब भी आध्यात्मिक ग्रंथों का वाचन, संतों का सत्संग, मनन-चिंतन करना, मन की विचारप्रक्रिया की ओर ध्यान देना, ईश्वर के आंतरिक सान्निध्य में बने रहना आदि प्रयासों से अंतर्मुखता बढ सकती है ।

– श्री. राज कर्वे   

३. व्यक्तित्व में स्थित ‘अंतर्मुखता’ का पहलू दर्शानेवाले ग्रहयोग

नवग्रहों में चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल एवं राहू, ये ग्रह भौतिक प्रकृति के हैं । उनके एक-दूसरे में स्थित योग (संबंध) व्यक्ति के स्वभाव में बहिर्मुखता दर्शाते हैं । इसके विपरीत, रवि, बृहस्पति, शनि एवं केतु, ये ग्रह आध्यात्मिक स्वरूप के हैं । उनके एक-दूसरे में स्थित योग व्यक्ति के स्वभाव में अंतर्मुखता दर्शाते हैं । इनमें से ‘बृहस्पति’ एवं ‘शनि’ के अन्य ग्रहों के साथ स्थित योग अंतर्मुखता की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । उसका विवेचन आगे दिया है –

३ अ. अन्य ग्रहों के साथ बृहस्पति ग्रह के होनेवाले योग तथा उनके परिणाम

१. बृहस्पति का चंद्रमा से योग : यह योग सात्त्विक मनोवृत्ति दर्शाता है । जिस व्यक्ति में यह योग होता है, उस व्यक्ति में अन्यों का विचार, विनम्रता, श्रद्धाशीलता, सकारात्मकता, आनंदिता आदि विशेषताएं होती हैं ।

२. बृहस्पति का बुध के साथ योग : यह योग सात्त्विक बुद्धि दर्शाता है । जिस व्यक्ति में यह योग होता है, उसमें निरीक्षणक्षमता, तर्कशक्ति, अध्ययनशील वृत्ति, चिंतनशीलता आदि विशेषताएं होती हैं ।

३. बृहस्पति का शुक्र के साथ योग : यह योग सात्त्विक आनंद दर्शाता है । जिस व्यक्ति में यह योग होता है, उसमें भाव होने से वह ईश्वर के आंतरिक सान्निध्य में रह पाता है ।

४. बृहस्पति का मंगल के साथ योग : यह योग सात्त्विक कर्म दर्शाता है । इस योग से युक्त व्यक्ति समाज के हित के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित होता है । उसमें व्यापकता होती है ।

५. बृहस्पति का रवि के साथ योग : यह योग सात्त्विक आकांक्षा दर्शाता है । इस योग से युक्त व्यक्ति उच्च आदर्शाें की ओर आकर्षित होता है । यह योग नैतिकता, सत्यनिष्ठा एवं ज्ञानशक्ति दर्शाता है ।

६. बृहस्पति का केतु के साथ योग : यह योग व्यक्ति को धर्माचरण करने के लिए प्रेरित करता है । ऐसा व्यक्ति सदाचारी, सद्गुणी एवं परोपकारी होता है ।

३ आ. अन्य ग्रहों के साथ शनि के होनेवाले योग तथा उनका परिणाम

१. शनि का बुध के साथ योग : यह योग वैचारिक परिपक्वता दर्शाता है । इस योग से युक्त व्यक्ति में सामंजस्य एवं विवेक शक्ति होती है । ऐसे व्यक्ति की विचारधारा सैद्धांतिक होती है ।

२. शनि का शुक्र के साथ योग : यह योग माया से अलिप्तता दर्शाता है । इस योग से युक्त व्यक्ति की भावनिक संबंधों में फंसने की संभावना अल्प होती है । उसमें विरक्ति शीघ्र उत्पन्न होती है ।

३. शनि का रसि के साथ योग : यह योग अनुशासन, प्रामाणिकता एवं समर्पण दर्शाता है । इस योग से युक्त व्यक्ति में सेवाभाव होता है ।

४. शनि का बृहस्पति के साथ योग : यह योग आध्यात्मिक परिपक्वता दर्शाता है । इस योग से युक्त व्यक्ति कर्तव्य के रूप में कर्म करता है; परंतु उसमें आसक्त न होने का प्रयास करता है ।

५. शनि का केतु के साथ योग : यह योग विरक्ति, त्याग, सेवाभाव एवं समर्पण दर्शाता है । इस योग से युक्त व्यक्ति स्वयं को सत्कार्य में समर्पित कर देता है ।

व्यक्ति की जन्मपत्रिका में उक्त योग अधिक मात्रा में हों, साथ ही बहिर्मुखता दर्शानेवाले ग्रहयोग अल्प मात्रा में हों, तो उस व्यक्ति का व्यक्तित्व मूलतः अंतर्मुख होता है । उसके द्वारा पूर्वजन्मों में किए गए सदाचरण का अथवा साधना का यह परिणाम होता है । ये ग्रहयोग जिन राशियों में से होते हैं तथा जन्मपत्रिका के जिन स्थानों में होते हैं, उसके अनुसार उनके परिणामों में विविधता आती है ।

४. उदाहरण के रूप में कुछ जन्मपत्रिकाएं

यहां कुछ संतों एवं साधकों की जन्मपत्रिकाओं में अंतर्मुखता दर्शानेवाले योग कितनी मात्रा में है, इसकी जानकारी दी गई है –

अ. संत क्र. १ : इनकी कुंडली में रवि-शुक्र एवं शुक्र-मंगल योग बहिर्मुखता दर्शानेवाले योग हैं; जबकि बुध-शनि, शुक्र-शनि, शुक्र-बृहस्पति, रवि-शनि एवं बृहस्पति-शनि के योग अंतर्मुखता दर्शानेवाले योग हैं । इसलिए बहिर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर ३० प्रतिशत है, जबकि अंतर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर ७० प्रतिशत है ।

आ. संत क्र. २ : इनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा-मंगल एवं शुक्र-मंगल के योग बहिर्मुखता दर्शानेवाले योग हैं; जबकि रवि-चंद्रमा, चंद्रमा-बृहस्पति, चंद्र-शनि, शुक्र-शनि, रवि-बृहस्पति, रवि-शनि एवं बृहस्पति-शनि के योग अंतर्मुखता दर्शानेवाले योग हैं । इसलिए इनमें बहिर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर २० प्रतिशत है; जबकि अंतर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर ८० प्रतिशत है ।

इ. साधक क्र. ३ : इनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा-बुध, चंद्रमा-शुक्र एवं बुध-शुक्र के योग बहिर्मुखता दर्शानेवाले योग हैं; जबकि चंद्रमा-बृहस्पति, बुध-बृहस्पति, शुक्र-बृहस्पति, रवि-केतु एवं बृहस्पति-शनि के बने योग अंतर्मुखता दर्शानेवाले योग हैं । इसलिए बहिर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर ४० प्रतिशत है तथा अंतर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर ६० प्रतिशत है ।

ई. साधक क्र. ४ : इनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा-बुध, चंद्रमा-शुक्र, चंद्रमा-मंगल, बुध-मंगल एवं शुक्र-मंगल के योग बहिर्मुखता दर्शानेवाले योग हैं; जबकि चंद्रमा-बृहस्पति, बुध-बृहस्पति, बुध-केतु, बृहस्पति-केतु, रवि-बृहस्पति एवं रवि-शनि के योग अंतर्मुखता दर्शानवाले हैं । इसलिए बहिर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर ४० प्रतिशत है; जबकि अंतर्मुखता दर्शानेवाले योगों का स्तर ६० प्रतिशत है ।

उक्त उदाहरणों से ध्यान में आता है कि इनमें अंतर्भूत संतों एवं साधकों की जन्मकुंडलियों में अंतर्मुखता दर्शानेवाले ग्रहयोग अधिक मात्रा में हैं । इसलिए उनके व्यक्तित्व में अंतर्मुखता का बीज पहले से अस्तित्व में था । अतः साधना आरंभ करने के उपरांत उनमें अंतर्मुखता शीघ्र उत्पन्न हुई ।’

श्री. राज कर्वे, ज्योतिष विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (२४.११.२०२५)