विजय एवं समृद्धि का पावन प्रतीक !
हिन्दू कालदर्शक के अनुसार नव संवत्सर अर्थात गुडी पडवा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है । शालिवाहन संवत्सर का यह प्रथम दिवस है । ‘वेदांग ज्योतिष’ ग्रन्थ में बताए गए साढे तीन मुहूर्तों में से यह एक मुहूर्त है । इस दिन नवीन वस्तु की खरीदारी, व्यवसाय का प्रारंभ, नव उपक्रमों का प्रारंभ, स्वर्ण की खरीदारी इत्यादि कार्य किए जाते हैं । माना जाता है कि द्वार पर लगाई गई ध्वजा विजय एवं समृद्धि का प्रतीक है । १९ मार्च के दिन नव संवत्सरारंभ दिन है । उस सन्दर्भ में जानकारी इस विशेषांक में दी गई है ।

नव संवत्सर – सांस्कृतिक इतिहास
ब्रह्मदेव ने इस दिन विश्व का निर्माण किया, ऐसा बताया जाता है । श्रीराम अयोध्या लौटे । प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने १४ वर्ष वनवास भोगकर लंकाधिपति रावण एवं राक्षसों का पराभव कर इसी दिन अयोध्या में प्रवेश किया ।
शालिवाहन नामक कुम्हार पुत्र ने शकों का पराभव करने हेतु मिट्टी के ६ सहस्र सैनिकों के पुतले तैयार किए एवं उनमें प्राण फूंककर उनकी सहायता से इसी दिन शकों का पराभव किया, ऐसी आख्यायिका प्रचलित है । इसी शालिवाहन राजा के नाम से नवीन कालगणना ‘शालिवाहन शक’ आरंभ हुई ।
प्राचीन मानव ने जब ईश्वर का विचार कर पूजा करना प्रारंभ किया, वह पूजा देवी के, स्त्री के रूप में प्रारंभ की । वह स्त्री अर्थात आदिशक्ति, आदिमाता पार्वती, ऐसा माना जाता है । पार्वती एवं शंकर का विवाह पडवा के दिन निश्चित हुआ । पडवा से तैयारी प्रारंभ होकर तृतीया को विवाह हुआ । पडवा के दिन देवी पार्वतीजी के शक्तिरूप की पूजा करते हैं । इसे ही ‘चैत्र नवरात्रि’ कहते हैं ।
विवाह के पश्चात नवमी को योगिनियों की अधिपति के रूप में पार्वतीजी का अभिषेक हुआ । श्रीकृष्ण ने कश्मीरी कन्याओं को ‘पार्वती का रूप’ कहा है । पार्वतीजी का विवाह होने पर वह विवाहिता के रूप में मासभर मायके रहती है ।
तब उनके महत्त्व को उजागर करने के लिए चैत्रगौरी में हल्दी-कुमकम (सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा एक दूसरे को हल्दी-कुमकुम लगाना) किया जाता है । अक्षय तृतीया के दिन वह ससुराल जाती है ।
(संदर्भ – शक्रोत्सव के (इन्द्रोत्सव के) उल्लेख संस्कृत रघुवंश में एवं भास (नाटककार) के ‘मध्यमव्यायोग’, शूद्रक के ‘मृच्छकटिकम्’ इन नाटकों में आए हैं ।)
गुडी पडवा – महाभारत में उल्लेख
महाभारत के आदिपर्व (१.६३) में उपरिचर राजा ने इन्द्र द्वारा उसे दी गई बांस की लाठी इन्द्र के आदरार्थ भूमि में रोपी एवं दूसरे दिन अर्थात नववर्ष प्रारंभ के दिन उसकी पूजा की । इस परंपरा के आदर स्वरूप अन्य राजा भी लाठी को वस्त्र लगाकर, उसे सजाकर, पुष्पमाला बांधकर उसकी पूजा करते हैं ।
महाभारत में ही खिलपर्व में भगवान कृष्ण अपने मित्रों को इन्द्र के कोप की चिंता न करते हुए वार्षिक शक्रोत्सव (इन्द्रोत्सव) बंद करने की सम्मति देते हैं । महाभारत ग्रन्थ के आदिपर्व में यह उत्सव वर्ष प्रतिपदा को करने का सुझाव दिया है, जबकि खिलपर्व एवं अन्य संस्कृत ग्रन्थों में यह उत्सव मनाने की तिथियां भिन्न पाई जाती हैं ।
स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्त्व
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रातःकाल अजवायन, नमक, हींग, काली मिर्च एवं चीनी नीम की पत्तियों के साथ पीसकर खाते हैं । आयुर्वेद में माना जाता है कि नीम में अनेक अनेक औषधीय गुण हैं, जैसे पाचन क्रिया सुधारना, पित्त का नाश करना, त्वचा रोग ठीक करना, अनाज में कीटक लगने से रोकना । शरीर को शीतलता देनेवाली नीम की पत्तियां स्नान के जल में डालना, उन्हें पीसकर खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से हितकारी समझा जाता है ।
कृषि संबंधी महत्त्व !
डॉ. सरोजिनी बाबर के मतानुसार नव संवत्सर का लोकसंस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान है । लोकसंस्कृति के अभ्यासक आग्रहपूर्वक बताते हैं कि भूमि, जगत का गर्भाशय है, उसमें सूर्य बीज बोता है, वर्षा होती है, जिससे भूमि सुफलित होती है । सृजन को मिलनेवाली ऊर्जा से जुडा यह एक पर्व है ।
सामाजिक महत्त्व
नव संवत्सर के दिन ‘प्याऊ’ लगाना चाहिए, जल से भरे घडे का दान करना चाहिए, ऐसा भी संकेत प्रचलित है । इस मंगल दिवस पर विभिन्न स्थानों पर प्रातःकाल में सांस्कृतिक सभाओं का उत्साह से आयोजन किया जाता है । रसिकों का बढता प्रतिसाद दीपावली भोर/सवेरा, नववर्ष भोर एवं गुडी पडवा अथवा हिन्दू नववर्ष भोर, इन उपक्रमों को मिल रहा है ।
शोभा यात्राएं
नव संवत्सर के निमित्त हिन्दू संस्कृति का परिचय देनेवाली शोभायात्राएं निकाली जाती हैं । महिलाएं, पुरुष, बालक पारंपरिक वेशभूषा में इस शोभायात्रा में सहभागी होते हैं ।
गुडी पडवा – पूजा पद्धति

संवत्सर फल का अर्थ क्या है ? चैत्र शु. १ से जो संवत्सर, अर्थात वर्ष प्रारंभ होता है, उस वर्ष के प्रथम दिवस एवं पश्चात के कुछ विशिष्ट दिनों पर होनेवाली स्थिति – जैसे वार, चन्द्र, नक्षत्र, सूर्य का विभिन्न नक्षत्र प्रवेश इत्यादि संदर्भों से यह संवत्सर फल दिया गया होता है । संवत्सर फल में देशकाल का भी निर्देश होता है, अर्थात देश के किस भाग में सुख-समृद्धि होगी, वह संवत्सर फल में संक्षिप्त रूप से दिया जाता है । ‘वर्ष प्रतिपदा अर्थात नव संवत्सर के दिन जो वार होगा, उस वार का जो ग्रह होगा, वह उस संवत्सर का अधिपति’, ऐसा माना जाता है । अर्थात नव संवत्सर से प्रारंभ होनेवाला वर्ष यदि मंगलवार को प्रारंभ हो रहा है, तो मंगल उस वर्ष का अधिपति, ऐसा समझा जाता है । ६० संवत्सरों का विभिन्न पद्धति से विभाजन किया गया है ।
एक विभाजन में ५ संवत्सरों का एक युग, इस पद्धति से ६० संवत्सरों के १२ युग माने जाते हैं, साथ ही संवत्सर चक्र के ८वें भाव नामक संवत्सर से विजय नामक २७वें संवत्सर तक २० संवत्सरों के स्वामी पालनकर्ता श्रीविष्णु हैं, ऐसा माना जाता
है । ब्रह्मदेव ने प्रथम तिथि को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया । उसे प्रथम स्थान मिलने से वह ‘प्रतिपदा’ के रूप में पहचानी जाती है । इस तिथि को ‘युगादि’ तिथि भी कहते हैं । इस दिन उपाध्याय से पंचांग श्रवण अर्थात वर्षफल श्रवण करते हैं ।
गुडी शब्द का विश्लेषण
मराठी में ब्रह्मध्वजा के लिए उपयोग किए जानेवाले गुडी शब्द का तेलुगु में अर्थ है, ‘लकडी अथवा लाठी’, वैसे ही उसका अर्थ ‘बंदनवार’ भी है । दाते, कर्वे लिखित ‘महाराष्ट्र शब्दकोश’ का आधार लें , तो ‘‘गुढ्या घालुनी वनीं राहूं, म्हणा त्यातें । – प्रला १९’’ ऐसा उल्लेख मिलता है । इसमें ‘गुढ्या’ शब्द का अभिप्रेत अर्थ उस शब्दकोश ने दिया है, ‘झोपडी अथवा पाल (रहने का स्थान)’ ।
हिन्दी में ‘कुडी’ शब्द का एक अर्थ है लकडी खडी कर बनाई गई कुटिया अथवा झोपडी । यहां ‘ग’ का ‘क’ (अथवा ‘क’ का ‘ग’) हो सकता है, यह संभावना ध्यान में ली जा सकती है, फिर भी रहने का स्थान इस अर्थ में ‘गुडी’ शब्दप्रयोग होकर दक्षिण के, विशेषकर आंध्र के स्थल नामों की संख्या का अध्ययन करने पर, लकडी के अर्थ में तेलुगु के गुडी शब्द का अधिक प्रयोग एवं पुरानी मराठी में लकडी बांस/लाठी से बना घर, यह देखते हुए महाराष्ट्र एवं आंध्र में गुडी शब्द का प्रचार अधिक रहा होगा । शालिवाहन पूर्व काल में कदाचित गुडी का ‘लकडी बांस/लाठी’ यह अर्थ महाराष्ट्र के शब्दसंग्रह से पीछे छूट गया होगा; परन्तु आंध्र से घनिष्ठ संबंध रखनेवाले शालिवाहन राजवंश के लकडी बांस/लाठी के अर्थ से वह प्रचलन में रहा होगा, ऐसी संभावना है ।
शालिवाहन शक एवं संवत्सर
भारत में विभिन्न दिनों पर नवीन वर्ष की, संवत्सर प्रारंभ करने की विभिन्न रीतियां होते हुए भी, महाराष्ट्र में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नए वर्ष का प्रारंभ होता है । इस शालिवाहन शक के विषय में हमें विशेष ममत्व लगने का कारण यह है कि यह शक प्रारंभ करनेवाले राजा शालिवाहन, महाराष्ट्र के थे । हमारा पंचांग तैयार करने की अनेक सारणियां इस शालिवाहन शक पर आधारित होने के कारण, कुछ अन्य प्रान्तों में कहीं कार्तिक प्रतिपदा को, तो कहीं मेष राशि में सूर्यप्रवेश को वर्षारंभ मानते हैं । ऐसे में भी, शालिवाहन शक सर्वत्र प्रचलित है ।
इस विषय के जानकारों को शालिवाहन शक का आधार एवं संदर्भ लेना पडता है ।
जय नामक २८वें संवत्सर से लेकर प्रमादी नामक ४७वें संवत्सर तक २० संवत्सर, संहारकर्ता महादेव शंकर के स्वामित्वाधीन आते हैं एवं ४८वें आनन्द नामक संवत्सर से लेकर श्रीमुख नामक ७वें संवत्सर तक, सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव के स्वामित्वाधीन आते हैं । संवत्सरों का विभाजन एवं रचना ऐसे विभिन्न प्रकारों से की गई है । संवत्सर फल में वर्षा, प्राकृतिक अनुकूलता-प्रतिकूलता , इसके विषय में जो अनुमान बताए जाते हैं, वे बहुत स्थूल होते हैं । पूर्व में कुल मिलाकर जीवन सुख-शान्तिमय था, साथ ही मुख्य व्यवसाय कृषि था । वर्षा कैसे होगी ? प्राकृतिक प्रकोप होगा या नहीं ? यह जानने की इच्छा सामान्य जन को भी थी; परंतु नए वर्ष के प्रारंभ का दिन आनंद में व्यतीत करने से आगामी वर्ष अच्छा जाता है, ऐसी हमारे लोगों की पुरातन श्रद्धा है । यह संवत्सर फल ज्योतिषी से जानकर लेना चाहिए, ऐसा भी बताया गया है ।
(साभार : ‘संतसाहित्य’ का जालस्थल)
ब्रह्मध्वजा (गुडी) की पूजा करते समय करने योग्य प्रार्थना
‘हे ब्रह्मदेव, हे श्रीविष्णु, इस ब्रह्मध्वजा के माध्यम से वातावरण में विद्यमान प्रजापति, सूर्य एवं सात्त्विक तरंगें हम ग्रहण कर पाएं । उनसे प्राप्त होनेवाली शक्ति का चैतन्य निरंतर बना रहे । मुझे प्राप्त होनेवाली शक्ति का उपयोग मैं साधना के लिए कर पाऊं’, यही आपके चरणों में प्रार्थना है !
– एक साधक (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान)
ब्रह्मध्वजा उतारते समय करने योग्य प्रार्थना
‘हे ब्रह्मदेव, हे श्रीविष्णु, आज पूरे दिन में इस ब्रह्मध्वजा में जो शक्ति आकृष्ट हुई है, वह मुझे प्राप्त हो । वह शक्ति राष्ट्र एवं धर्म कार्य के लिए उपयोग में ला पाऊं’, यही आपके चरणों में प्रार्थना है !
– एक साधक (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान)
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