
भोपाल – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा है कि सामाजिक माध्यम (समाचार पत्र) की स्वतंत्रता का उपयोग व्यक्तियों द्वारा अवैध रूप से लाभ प्राप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता । न्यायालय ने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामाजिक माध्यम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किन्तु अवैध लाभ प्राप्त करने के लिए सामाजिक माध्यम की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता ।
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की खंडपीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा ३८४ (बलपूर्वक वसूली) एवं ४२ (धोखाधडी) के अंतर्गत प्रविष्ट अपराध को निरस्त करने की मांग करने वाले एक पत्रकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की । न्यायालय ने धोखाधडी एवं बलपूर्वक रुपये ऐंठने के आरोपों से संबंधित पत्रकार की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया है । न्यायालय ने धारा ४२० के अंतर्गत धोखाधडी से संबंधित कार्यवाही को निरस्त कर दिया, किंतु धारा ३८४ के अंतर्गत बलपूर्वक रूपये ऐंठने से संबंधित वाद को आगे ले जाने की अनुमति दी ।
१. न्यायालय ने कहा कि पत्रकार समाज के रक्षक के रूप में कार्य करता है एवं सार्वजनिक हित से जुडे विषयों की जानकारी प्रसारित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है । किन्तु सामाजिक माध्यम की स्वतंत्रता की ढाल को अवैध लाभ प्राप्त करने का शस्त्र नहीं बनने दिया जा सकता ।
२. इस प्रकरण में यादव समुदाय के जिलाध्यक्ष कोकलाल यादव ने ५ अगस्त २०२३ को पत्रकार के विरुद्ध आरोप प्रविष्ट कराया था । आरोप के अनुसार, संबंधित पत्रकार १८ जुलाई २०२३ को आरोप कर्ता कोकलाल यादव तथा कुछ अन्य व्यक्तियों से मिले थे । पत्रकार ने स्वयं को पत्रकार बताया एवं राजस्व निरीक्षक कार्यालय के निकट उनके भवन निर्माण को अवैध बताया था । कोकलाल यादव का कथन है कि पत्रकार ने उनसे रुपये की मांग की थी एवं यदि रुपये नहीं दिए गए तो अवैध निर्माण के संबंध में समाचार प्रकाशित करने की धमकी दी थी ।
३. कोकलाल यादव ने रुपये देना अस्वीकार किया । इसके उपरांत पत्रकार ने ‘प्रदेश टुडे’ समाचार पत्र में इस विषय पर एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें स्मारक के निर्माण में अनियमितता होने का आरोप लगाया गया था ।
४. इस लेख के आधार पर कोकलाल यादव ने पुलिस में आरोप प्रविष्ट करवाया। इस आरोप के आधार पर पुलिस ने पत्रकार के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण प्रविष्ट किया ।
५. इस प्रकरण की सुनवाई करते समय उच्च न्यायालय को धोखाधडी का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला । इसलिए न्यायालय ने पत्रकार को धोखाधडी के आरोप से मुक्त कर दिया, किन्तु न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा ३८४ के अंतर्गत बलपूर्वक रुपये ऐंठने से संबंधित आरोप प्रारंभिक स्तर पर सिद्ध होते दिखाई देते हैं ।
हिन्दु विवाह अधिनियम के अनुसार विवाह को वैध ठहराने के लिए केवल विवाह प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं है ।– Gujrat High Court
जम्मू न्यायालय ने पुलिस से अभिलेख की मांग की ।
Three Language Policy : क्या अंग्रेजी को भारत की ही स्थानीय भाषा माना जा सकता है – सर्वोच्च न्यायालय का प्रश्न
UK Mandir Auction : ब्रिटेन में नीलामी में मंदिर का स्थान मुसलमानों को बेचा !
Jharkhand Minor Rape : ३ वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म करने वाले पर १ लाख रुपये का दंड (जुर्माना) लगाकर खुला छोडा ।