हिन्दू साधु-संतों का विडंबना (अवमानना) करने वाला विज्ञापन सरकार ने वापस लिया ।

दोषियों पर कठोर कार्यवाही करने की हिन्दू जनजागृति समिति की मांग ।

सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित आपत्तिजनक विज्ञापन

(यह विज्ञापन प्रकाशित करने के पीछे किसी की भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का हमारा उद्देश्य नहीं है । विडंबना किस प्रकार हुई है, यह समझाने के लिए इसे प्रकाशित किया गया है, कृपया इसकी जानकारी लें – संपादक)

मुंबई, २६ फरवरी (वार्ता ।) – “अपने कृतित्व (कार्य पर) पर विश्वास रखें, ढोंग पर नहीं”, ऐसा लिखे हुए तथा साधु-संतों के वेश में व्यंगचित्र के माध्यम से हिन्दू धर्म का अपमान करने वाले सामाजिक न्याय विभाग के विवादित विज्ञापन पर राज्य में तीव्र रोष व्यक्त किया जा रहा है । हिन्दू जनजागृति समिति के मुंबई के श्री सतीश सोनार ने सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट से भेंट कर यह विज्ञापन तत्काल वापस लेने और दोषियों पर कठोर कार्यवाही करने की मांग की थी ।

सामाजिक न्याय मंत्री श्री संजय शिरसाट को निवेदन करते हुए हिन्दू जनजागृति समिति के श्री सतीश सोनार

इस अवसर पर मंत्री ने कहा, “यह विज्ञापन कल रात ही वापस ले लिया गया है । यह विज्ञापन हमारे विभाग की ओर से नहीं निकला गया था । इसे सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने प्रकाशित किया था ।”


महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग के नाम से प्रकाशित इस विज्ञापन में जटा, तिलक, रुद्राक्ष माला, खोपडी तथा नींबू-मिर्ची जैसे प्रतीकों को दर्शाकर एक साधु का निंदनीय (विडंबनात्मक) व्यंगचित्र प्रकाशित किया गया था । साथ ही ” ढोंग नहीं लें, शिक्षा का संकल्प” ऐसा नारा देकर जानबूझकर हिन्दू धर्म को लक्ष्य किया गया था ।

हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों का तीव्र विरोध 

इस चित्रण के कारण हिन्दू साधु-संतों तथा ऋषि-मुनियों की परंपरा का अपमानजनक प्रस्तुतीकरण हुआ है, ऐसी भावना विभिन्न हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों ने व्यक्त की है । हिन्दू जनजागृति समिति के राज्य संगठन मंत्री श्री सुनील घनवट ने सरकार को लिखित शिकायत देकर दोषियों पर कठोर कार्यवाही करने की मांग की है ।

संपादकीय भूमिका

  • एक ओर महाराष्ट्र नासिक सिंहस्थ कुंभपर्व के माध्यम से हिन्दू धर्म का महत्व विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने की योजना बना रहा है, तो दूसरी ओर इसी कुंभपर्व में सहभागी होने वाले साधुओं की इस प्रकार निंदा (विडंबना) की जा रही है । यह महाराष्ट्र के हिन्दुओं के लिए अत्यंत लज्जास्पद है ।
  • प्रधानता (पुरोगामित्व) के नाम पर बार-बार केवल हिन्दू धर्म के प्रतीकों की ही अवमानना क्यों की जाती है ? अन्य धर्मों में व्याप्त अंधश्रद्धा पर टिप्पणी करने का साहस प्रशासन क्यों नहीं दिखाता ? केवल विज्ञापन वापस लेना पर्याप्त नहीं है, अपितु हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने वाले उत्तरदायी अधिकारियों पर कानूनी कार्यवाही अवश्य होनी चाहिए । भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए विज्ञापनों की पूर्व जांच करने वाली स्वतंत्र समिति की स्थापना आवश्यक है ।
  • सरकार को संबंधित उत्तरदायियों के नाम घोषित करके उनके विरुद्ध कौन-सी कार्यवाही की जाएगी, यह वर्तमान में चल रहे विधानमंडल अधिवेशन में ही बताना चाहिए । इसके लिए धर्मप्रेमी हिन्दुओं को ऐसी मांग दृढ़तापूर्वक रखनी चाहिए ।