
देवद (पनवेल) – विनम्रता, ईश्वरप्राप्ति की तीव्र लगन तथा अल्प अहं, इन गुणों से युक्त विक्रोळी, मुंबई की श्रीमती दिनप्रभा सामंतजी (आयु ८३ वर्ष) ७१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर सनातन संस्था के १३७वें व्यष्टि संतपद पर विराजमान हुईं । यह भावसमारोह ३ फरवरी को देवद के सनातन आश्रम में भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ । इस अवसर पर मुंबई की पू. सामंतजी की पुत्री श्रीमती वैशाली श्रीवास्तव, साथ ही सनातन के संत पू. रमेश गडकरीजी, पू. (श्रीमती) अश्विनी पवारजी तथा इससे पहले पू. सामंतजी के साथ सेवा करनेवाले देवद आश्रम के साधक उपस्थित थे । पू. सामंतजी संत बन गईं, यह सुनकर सभी को बहुत हर्ष हुआ ।
पू. अश्विनी पवारजी ने बताया कि सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने साधना के विषय में जो-जो मार्गदर्शन किया, उसका पू. सामंतजी ने अचूकता से आज्ञापालन किया । प्रत्येक प्रसंग से सीखना, उससे आनंद लेना तथा गुरु-इच्छा के रूप में मन से सबकुछ स्वीकार करना, इन गुणों के कारण वे मन की युवावस्था का अनुभव कर रही हैं । उनके जीवन में लेशमात्र भी दुःख, तनाव एवं नकारात्मकता दिखाई नहीं देती । पू. सामंतजी ने शिष्यभाव में रहकर साधना की । ऐसे दैवीय गुणों के कारण ही वे संत पद पर विराजमान हुई हैं ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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