‘समाज में अधिकांश लोग भक्तियोग के अनुसार साधना करते हैं । साधना के संदर्भ में मार्गदर्शन करनेवाले अनेक संत हैं तथा उसके लिए अनेक मार्गदर्शक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं । इसकी तुलना में अन्य साधना-पद्धतियों के संदर्भ में मार्गदर्शक संतों अथवा ग्रंथों की उपलब्धता अल्प है । इन साधना-पद्धतियों के साधकों को साधना संबंधी मार्गदर्शन मिले, इसके लिए सनातन ने अब तक भक्तियोग को प्रधानता न देकर अन्य साधना-पद्धतियों के संदर्भ में ग्रंथ प्रकाशित करने को प्रधानता दी है । कुछ काल पश्चात हम ग्रंथलेखन में भक्तियोग को प्रधानता देनेवाले हैं ।’

काल के अनुसार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की विचारप्रक्रिया में हुआ परिवर्तन !
‘विगत ४० वर्षों में समाज को अध्यात्म से संबंधित ज्ञान एक ही स्थान पर तथा उचित ढंग से मिले, इस उद्देश्य से मैं लेखन का संकलन तथा उसके आधार पर ग्रंथ प्रकाशित करता आया हूं । इसलिए आज तक ३६९ ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं तथा ५००० ग्रंथ प्रकाशित किए जा सकें, इतनी लेखन सामग्री हमारे पास संग्रहित है । पहले मुझे ऐसा लगता था, ‘मेरे देहत्याग करने से पूर्व अधिकाधिक ग्रंथ प्रकाशित होने चाहिए’; परंतु अब मुझे ऐसा नहीं लगता । ‘आगे ईश्वर की इच्छा के अनुसार सबकुछ होगा, ऐसा लग रहा है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
(और इनकी सुनिए…) ‘कुंकुम इस्लामी देशों से आता है, तो क्या फिर हिन्दु तिलक लगाना बंद कर देंगे ?’ – Priyank Kharge
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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छोटे बच्चों को गोमांस देने का परामर्श का प्रकरण !
संपादकीय : नागरिक शास्त्र केवल पुस्तक में ?
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