सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा सत्संग में साधकों को नामजप के संदर्भ में किया गया अनमोल मार्गदर्शन !

१. काल की महिमा के कारण मन में आनेवाले माया के विचारों से बाहर निकलने के लिए नामजप बढाएं !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

श्रीमती मीनाक्षी धुमाळ (आध्यात्मिक स्तर ६४ प्रतिशत, आयु ५५ वर्ष) : मैं अनेक वर्षाें से साधना एवं सेवा कर रही हूं । पहले मुझे माया से संबंधित विचार नहीं आते थे । मैं अलिप्त थी; परंतु अब ‘बीच-बीच में मेरे मन में माया के विचार आते हैं’, ऐसा क्यों होता है ?, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : इसे काल की महिमा कहते हैं । माया संबंधी विचार बढने पर हमें अपना नामजप बढाना है । उसके कारण हम माया के नकारात्मक विचारों से बाहर निकल पाएंगे ।

२. साधकों की साधना न हो, तो वे निरंतर नामजप करने का प्रयास करें !

श्री. परशुराम पाटील (आध्यात्मिक स्तर ६३ प्रतिशत, आयु ५६ वर्ष) : मैं वाहन से संबंधित सेवा करता हूं । पहले मैं नामजप करने के लिए समय सुनिश्चित करता था अथवा अलार्म लगाता था । वर्तमान में मुझे सोने के लिए रात के १२ अथवा १ भी बज जाएं, तब भी मैं प्रातः ४.३० बजे जग जाता हूं । उस समय मेरा नामजप आरंभ हो जाता है । पहले मैं आधे से १ घंटा नामजप करता था । अब मैं २ घंटे नामजप करता हूं, तब भी ‘नामजप में समय कैसे निकल गया ?’, यह पता नहीं चलता ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : बहुत अच्छे ! ‘नामजप में विद्यमान आनंद अनुभव कर पाना’, इसका यह लक्षण है । किसी बात से जब हमें आनंद मिलने लगता है, तब हमें समय का भान नहीं रहता ।

श्री. परशुराम पाटील : अब मैं यहां बैठा हूं; परंतु ‘अंदर से मेरा नामजप चल रहा है’, ऐसा मुझे प्रतीत होता है ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : बहुत अच्छे ! अंततः जब हम अनेक से एक ईश्वर के नाम में आते हैं, तब हम ईश्वर से एकरूप हो जाते हैं । अन्य बातें मानसिक स्तर की होती हैं; परंतु ‘नामजप करना’ आध्यात्मिक स्तर का है । अखंड नामजप, मुझे और कुछ नहीं चाहिए ?, यह स्थिति बहुत अच्छी है । किसी साधक की साधना न होती हो, तो उसे यह सूत्र ध्यान रखना चाहिए ।

३. अध्यात्म में कृति समान ही विचार भी महत्त्वपूर्ण हैं तथा ‘नामजप’ भी एक प्रकार से अखंड विचार ही है !

श्रीमती वेदश्री खानविलकर : मैं दैनिक ‘सनातन प्रभात’ से संबंधित सेवा करती हूं । ‘सेवा एवं व्यष्टि साधना’, इस विषय पर हमारे सत्संग होते हैं । मुझे सेवा का दायित्व मिलता है । आरंभ में मेरे मन में नियोजन एवं उसके कार्यान्वयन के विषय में बहुत विचार होते हैं; परंतु प्रत्यक्ष क्रियान्वयन के स्तर पर मैं उतना अच्छा नहीं कर पाती ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : क्या आप इस विषय में किसी से बात करती हैं ?

श्रीमती वेदश्री खानविलकर : मैं अपनी सेवा के उत्तरदायी साधकों से बात करती हूं । अध्यात्म में कृति का महत्त्व अधिक है; परंतु मुझसे विचारों के स्तर पर ही अधिक प्रयास होते हैं, जिससे मेरा आत्मविश्वास घट जाता है ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : अध्यात्म में विचारों का भी महत्त्व है । हम नामजप करते हैं, तो वह भी एक प्रकार का अखंड विचार ही होता है । उसमें कृति के विषय में कुछ नहीं होता ।

४. साधकों के सान्निध्य में रहने की इच्छा होना महत्त्वपूर्ण !

कु. अनुराधा जाधव : अब मैं साधकों के बिना रह ही नहीं सकती, अर्थात साधकों के बीच रहने से ही अच्छा लगता है ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी : बहुत अच्छे ! ईश्वर के संबंधी अर्थात हमारे साधक ! उनके साथ रहने की इच्छा होना महत्त्वपूर्ण है ।