मन को स्वस्थ, प्रसन्न एवं समर्थ बनाने हेतु मन के व्यायाम करना अर्थात साधना करना आवश्यक !

१. शरीर सुदृढ एवं स्वस्थ रहने हेतु व्यायाम की आवश्यकता

‘व्यायाम का अर्थ शारीरिक व्यायाम करना’, ऐसा हम मानते हैं । इसके प्रति अधिकांश लोग जागरूक भी होते हैं । शरीर सुदृढ एवं स्वस्थ रहे, इस हेतु हम शारीरिक व्यायाम करते हैं । व्यायाम नियमित तथा विशिष्ट समय पर ही करना पडता है । एक बार व्यायाम का महत्त्व समझ में आ जाए, तो बार-बार बताने की आवश्यकता नहीं होती । व्यायाम के विविध प्रकार हैं । उनमें से कौन-से व्यायाम हमारे लिए उचित एवं हितकारी हैं, इसकी जानकारी लेनी पडती है । कुछ लोग पैदल चलने का व्यायाम करते हैं, तो कुछ लोग व्यायामशाला या योगासनों के वर्ग में जाते हैं । एक बार व्यायाम का आरंभ किया जाए, तो उस नियम को संभवतः तोडा नहीं जाता ।

योगतज्ञ दादाजी वैशंपायनजी

२. शरीर की भांति मन को स्वस्थ रखने के उपाय ढूंढना आवश्यक; क्योंकि मन बूढे शरीर को त्यागकर दूसरी देह में जन्म लेता है !

एक बात ध्यान रखें कि हम शरीर को स्वस्थ रखने हेतु व्यायाम करते हैं; परंतु ‘मन भी स्वस्थ होना आवश्यक है’, क्या यह हम समझ पाते हैं ? उसके लिए ‘हमें कुछ समाधान ढूंढना, मन से कुछ व्यायाम करवाना आवश्यक है ।’ वास्तव में देखा जाए, तो हमारे शरीर का विकास होता रहता है । यह विकास पूर्ण होने पर धीरे-धीरे शरीर क्षीण होकर एक दिन मर जाता है । क्या मन का भी वैसा ही है ? क्या वह बूढा होता है ? बूढे मनुष्य का मन युवा ही बना रहता है । वह शरीर से युवा बने रहने की इच्छा रखता है; परंतु वह संभव नहीं होता । उसका मन, उसकी इच्छाएं, आशा एवं आकांक्षाएं युवा ही रहती हैं; उसके कारण मन को उसकी योग्यता के अनुरूप युवा शरीर की इच्छा होती है । अंततः मन बूढे शरीर को त्याग देता है तथा दूसरे वासनारूप देह में जन्म लेता है ।

३. मन सुख-दुःख अर्थात जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने हेतु गुरु उपदेशानुसार साधना आरंभ करता है, फलस्वरूप कायरता, दुर्बलता एवं चंचलता आदि क्षीण होकर मन की शक्ति बढती है ! 

मदारी एक ही प्रकार का खेल दिखाता है । वह किसी एक चौक पर खेल दिखाकर अगले चौक पर चला जाता है तथा वहां पुनः वही खेल दिखाता है । उसी प्रकार मन एक देह का खेल समाप्त होने पर दूसरे देह में प्रवेश कर पुनः वही खेल करता है । इन खेलों से यदि मन को बाहर आना है, तो उसे खेल बंद करना होता है या वह उस खेल में परिवर्तन करने हेतु बाध्य होता है । मन जब पुनः-पुनः ‘देह धारण करना तथा मृत्यु सहन कर नई देह में प्रवेश करना’, इससे ऊब जाए, तभी वह विचार करेगा कि क्या मुझे सुख-दुःख के खेल को ऐसे ही जारी रखना है या उससे स्वयं को शीघ्र मुक्त करना है ? तो इससे मुक्त होने हेतु क्या करना चाहिए ?’ तत्पश्चात वह मन किसी ज्ञानी मनुष्य के मार्गदर्शन में अर्थात गुरु के उपदेशानुसार व्यायामरूपी साधना आरंभ करता है ।

इस व्यायाम का हमें उपयोग हो रहा है अथवा नहीं, यह कुछ समय पश्चात ही ध्यान में आ सकता है । मनुष्य शारीरिक व्यायाम आरंभ करने पर तुरंत बलवान नहीं बनता, अपितु कुछ दिन उपरांत उसका शरीर सुडौल होता है । व्यायाम से उसका उत्साह एवं शक्ति बढती है; परंतु उसकी सुदृढता अन्य लोगों के ध्यान में कुछ देर से आती है । जब हम मन का व्यायाम करते हैं, तब हमारे ध्यान में आने लगता है कि ‘हमारे मन की कायरता, दुर्बलता एवं चंचलता इत्यादि दूर होकर मन की शक्ति बढ गई है ।’ मन के व्यायाम से मन उत्साहित होता है । मन सशक्त हो, तो मनुष्य उसके मन की शक्ति से उसकी शारीरिक क्षमता से परे भी काम कर सकता है ।

४. मन को समर्थ बनाने के लिए व्यायाम करने से वह सभी परिस्थितियों में स्वस्थ रहता है !

जिस मनुष्य के शरीर का उसके मन पर नियंत्रण नहीं होता, उसे हम आलसी कहते हैं । यदि शरीर को सदासर्वदा सुस्त होकर लेटे रहने की आदत पड गई हो, तो उस मनुष्य का मन भी आलसी बन जाता है । कुछ लोगों को लेटकर पढने की, अन्यथा कोई काम न होने पर केवल लोटने की आदत होती है । ऐसी आदतों के कारण मन भी सुस्त बन जाता है; परंतु जिनका शरीर नित्य उत्साह के साथ कार्यरत रहता है, उनका मन भी उत्साहित एवं क्षमतापूर्ण होता है । तो मन को समर्थ बनाने हेतु कौन-से उपाय अथवा कौन-से व्यायाम करने चाहिए ? मन के कुछ प्राथमिक व्यायाम आगे दिए गए हैं –

१. आरंभ में आधा-एक मिनट किसी दीये की धीमी लौ की ओर एकटक देखें तथा समय धीरे-धीरे बढाते जाएं ।

२. आंखे बंद कर शांति से बैठें तथा ‘मन में कौन-कौनसे विचार आते हैं ?’, इसकी ओर तटस्थता से ध्यान दें ।

३. हमारे मन में क्रोध, लोभ, ईर्ष्या इत्यादि विकार उत्पन्न होते हैं । उनके उत्पन्न होते ही उनका बोध हो, इसलिए उन विकारों की ओर साक्षीभाव से देखें ।

४. हमें जब दुःख होता है अथवा सुख प्रतीत होता है, उस समय क्या हम उस दुःख या सुख की ओर अलिप्तता से देख सकते हैं अथवा नहीं, इसका प्रयास करें ।

५. जब संभव हो, तब २ मिनट अपने शरीर के किसी भी अंग को हिलाए बिना शांति से बैठने का प्रयास करें ।

६. मन में निरंतर कोई नामजप करते रहें । यह जप धार्मिक साधना के रूप में नहीं करना है, अपितु ‘मन निरंतर एक ही शब्द पर स्थिर होता है या नहीं ?’, यह देखना है ।

ऊपर दिए व्यायाम का अभ्यास करने से हम किसी भी प्रसंग में बिना डगमगाए कठिन प्रसंग का धैर्य से सामना कर सकते हैं । हमारे घर तथा समाज में अनेक छोटे-बडे प्रिय-अप्रिय प्रसंग होते हैं । गृहस्थी में तो परीक्षा के अनेक प्रसंग आते हैं, तब भी हमारा मन प्रसन्न एवं समर्थ बना रहता है । हम निराश नहीं होते । मुझे यह विश्वास है कि मन के इन व्यायामों के कारण हमारा मन किसी भी परिस्थिति में स्वस्थ बना रहेगा ।’

– योगतज्ञ दादाजी वैशंपायनजी (साभार : मासिक : ‘श्रीगजानन आशिष’, जुलै २०१०)