श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी की अमूल्य विचारसंपदा !

‘देह भले ही भिन्न हो, तब भी सभी में विद्यमान ‘ब्रह्म’ एक ही है’, यह कहकर भैंसे के मुख से भी वेद बुलवानेवाले संत ज्ञानेश्वरजी कहते हैं, ‘‘आत्मा एक ही है । हमारी भिन्न-भिन्न देह के रूप भले ही उसमें समाहित हों, तब भी हममें विद्यमान ईश्वर का आत्मरूप एक ही है ।’’ ‘सर्वत्र ब्रह्म’, इस विधान के अनुसार सबकुछ समान ही है । ईश्वरमय है !’
तो हम तुलना क्यों करते हैं तथा अन्यों के प्रति द्वेष क्यों रखते हैं ? ‘मेरा ही एक रूप अन्य वेश में मेरे सामने खडा है । तो मैं स्वयं से ही द्वेष कैसे कर सकता हूं ?’, मन को इसका भान कराना होगा । हमें अपनी प्रत्येक कृति से सीखकर उसमें समाहित आनंद लेना होगा । किसी में कुछ स्वभावदोष एवं अहं के पहलू हों, तो उसमें सुधार हो इसके लिए उसकी सहायता करना तथा वह वैसे प्रयास करे, यह भी आवश्यक है; परंतु ऐसे व्यक्ति की ओर देखते समय उसे व्यक्ति के रूप में न देखकर, वह ईश्वर द्वारा पृथ्वी पर जन्म दी गई एक भिन्न प्रकृति है, मन को इसका भान कराएं । ‘सामनेवाले व्यक्ति में तथा मुझमें एक ही आत्मा है, केवल उसके रूप भिन्न हैं’, इसका भान होने पर ‘सामनेवाले व्यक्तियों से तुलना करना, उनसे द्वेष करना, पूर्वाग्रह होना तथा उनके प्रति मन में शंका होना’, ऐसा कुछ भी शेष नहीं रह जाता तथा ऐसा होना ही ‘एकत्व साधना’ है।’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी
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