परमेश्वर की माया से ब्रह्मांड में पृथ्वी एवं मनुष्य की रचना, जबकि आदि पुरुष एवं आदि स्त्री के पतन से विविध योनियों की रचना हुई !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

प्रश्न :

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले : भगवान ने विश्व, मनुष्य एवं जानवरों की रचना क्यों की ? (१५.३.२०२५)

उत्तर :

श्री. राम होनप :

१. ब्रह्मांड :

ब्रह्मांड एक ही है तथा इसमें जो कुछ उत्पन्न होता है (जैसे ग्रह, तारे, नक्षत्र आदि), वह कुछ समय तक रहता है । उसके उपरांत उसका विलय हो जाता है । ब्रह्मांड अनादि है; परंतु कालांतर में इसमें हुई रचना का लय हो जाता है ।

२. अनादि माया :

परमेश्वर मूलतत्त्व एवं अनादि हैं । उनका एक अंग है ‘अनादि माया’ ।

श्री. राम होनप

२ अ. अनादि माया का स्वरूप : अनादि माया में अनंत दैवी शक्तियां हैं । उन सभी शक्तियों को ‘अनंत माया’ भी कहते हैं ।

२ अ १. ‘परमेश्वरी माया’ का कार्य

अनादि माया में एक दैवी शक्ति है, जिसे ‘परमेश्वरी माया’ कहते हैं । इस परमेश्वरी माया में ‘ब्रह्मा’, ‘विष्णु’ एवं ‘शिव’ का आंशिक तत्त्व होता है ।

२ अ २. ‘परमेश्वरी माया’ एवं ‘जीवसृष्टि’ का परस्पर संबंध !

‘परमेश्वरी माया’ की प्रकृति जननीस्वरूप है । जब सत्त्वगुण के कारण उसे जीवसृष्टि रचना की इच्छा होती है, तब ब्रह्मांड में कुछ पृथ्वी की रचना होती है । परमेश्वरी माया के रजोगुण के कारण पृथ्वी का कार्य चलता है तथा उसके तमोगुण के कारण उसका नाश होता है ।

२ अ ३. ‘परमेश्वरी माया’ को जीवसृष्टि की रचना करने की इच्छा क्यों होती है ?

परमेश्वरी माया को ‘नवनीत माया’ भी कहते हैं । ‘नव’ का अर्थ है नवीन रचना तथा ‘नीत’ शब्द का अर्थ है ‘सदैव’ । जो सदैव नवीन रचना करती है, वह ‘नवनीत माया’ है । ‘परमेश्वरी माया’ का प्रधान गुणधर्म है ‘नवनीत’ । इसलिए उसे जीवसृष्टि तथा उसके अंतर्गत सदैव विविध तथा नवीन रचनाएं करने की इच्छा होती है । परिणामस्वरूप पृथ्वी पर विविध रंग, कला, संगीत, गायन, नृत्य, भिन्न शरीर, भिन्न प्रकृति आदि की नवीनतम रचना होती रहती है ।

३. पृथ्वी पर मनुष्य, पशु, पक्षी एवं जलचर की रचना की प्रक्रिया

३ अ. पृथ्वी पर आदि पुरुष एवं आदि स्त्री की रचना

‘परमेश्वरी माया’ के मन में इच्छा होने पर पहले पृथ्वी की सृष्टि होती है । तब उसमें निसर्ग, पर्वत, पानी एवं हवा की व्यवस्था होती है । उसके उपरांत ‘परमेश्वरी माया’ के ‘शरीर, मन, बुद्धि एवं सात्त्विक अहं’ के अंशों के एकत्रीकरण से ‘आदि पुरुष’ एवं ‘आदि स्त्री’ की रचना होती है । ऐसे जीव एक ही समय में पृथ्वी पर प्रकट होते हैं । ये सभी जीव शुद्ध होते हैं । उनके शरीर पर दैवी तेज, आभूषण एवं वस्त्र होते हैं ।

३ आ. आदि पुरुष एवं आदि स्त्री के पतन से विविध योनियों की रचना

आरंभ में आदि पुरुष एवं आदि स्त्री में सत्त्वगुण स्थिर थे । उनमें जीवन जीने योग्य रजोगुण एवं निद्रा के लिए तमोगुण थे । ‘काल एवं त्रिगुणों’ के गुणधर्मों के कारण कालांतर में आदि पुरुष एवं आदि स्त्री में सत्त्वगुण अल्प होकर रजोगुण एवं तमोगुण बढने लगे । इसके कारण उनसे कुछ पापकर्म हुए । मृत्यु के उपरांत ऐसे जीवों का अगला जन्म पशु, पक्षी, जलचर आदि योनियों में होने लगा ।

३ इ. व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले पापकर्मों के अनुसार असंख्य योनियों की रचना, व्यक्ति को ‘साधना का विस्मरण होना तथा उससे होने वाले पापकर्मों का बढना’, इसके कारण उसका पतन होने लगा । पापकर्मों का स्वरूप, तीव्रता एवं बारंबारता के अनुसार व्यक्ति को अगले जन्मों के लिए नई-नई योनियां प्राप्त होने लगीं ।

४. सारांश

व्यक्ति को साधना एवं ईश्वर का विस्मरण होने से असंख्य योनियों की रचना हुई है । ‘ऐसी योनियों में न फंसें’, इसके लिए व्यक्ति को ‘प्रतिदिन साधना करना तथा गुरुकृपा संपादन करना’ महत्त्वपूर्ण है ।
श्री. राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा । (ज्ञान मिलने की तिथि, समय तथा कुल कालावधि : २८.९.२०२५, सुबह १०.३० बजे, ७ सेकंड)

सूक्ष्म (Subtle)

स्थूल अवयव : व्यक्ति के स्थूल (प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले) अवयव जैसे नाक, कान, आंखें, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रियां हैं ।

सूक्ष्म : इन पंचज्ञानेंद्रियों में मन एवं बुद्धि से परे जो कुछ भी है, वह ‘सूक्ष्म’ है । साधना में प्रगति किए हुए कुछ व्यक्तियों को ये ‘सूक्ष्म’ संवेदनाएं अनुभव होती हैं । विविध धर्मग्रंथों में इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान का उल्लेख मिलता है ।

सूक्ष्म-जगत (Subtle-World) ‘सूक्ष्म-जगत’ उसे कहते हैं, जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रियों (नाक, जीभ, आंखें, त्वचा एवं कान) को ज्ञात नहीं होता; साधना करने वाले व्यक्ति को उसके अस्तित्व का ज्ञान होता है ।

यहां उल्लेख किए गए अनुभव ‘भाव तेथे देव’, (जहां भाव है, वहां भगवान हैं) इस उक्ति के अनुसार साधकों के व्यक्तिगत अनुभव हैं । यह आवश्यक नहीं है कि वे अनुभव सभी को हों । – संपादक