देहली नहीं, अपितु अमूर्त ‘इंद्रप्रस्थ’ !

मुझे ऐसा नहीं लगता कि पुरातत्व क्षेत्र से संबंधित न होनेवाले अथवा उसके बाहर काम करनेवाले किसी व्यक्ति ने इंद्रप्रस्थ का सर्वाधिक ध्यान आकर्षित करनेवाला चित्र देखा होगा । इंद्रप्रस्थ कहां है ? वह कितना बडा अथवा छोटा था ? उसके ‘सार्वत्रिक’ नाम का महत्त्व क्या है ? इसकी पुष्टि के लिए पुरातत्व, ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रमाण क्या हैं ? यहां इन विषयों की जानकारी से संबंधित लेख प्रस्तुत है । हमारे पुरातत्वविदों द्वारा पुराने किले के उत्खनन के माध्यम से इतिहास की अधोरेखित बातों को सम्मिलित करनेवाले तथा इतिहास की गहराई से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहे ‘इंद्रप्रस्थ’ के ‘सामर्थ्य’ का कितना स्पष्ट चित्रण है, यह इस लेख से ज्ञात होगा । – नीरा मिश्रा


१. नवीन पुरातात्विक उद्यान का नाम ‘दीनपनाह’ रखा जाना, आश्चर्यजनक !

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के ३ जुलाई २०१५ के ‘टाइम्स सिटी’ के ‘न्यू आर्कियोलॉजिकल पार्क इन द हार्ट ऑफ द सिटी’ शीर्षक का बडा समाचार पढकर मैं बहुत प्रसन्न तथा उत्साहित थी । इस लेख में पुनर्निर्मित अथवा संरक्षित पुराने किले का छायाचित्र था, जो स्पष्ट रूप से ‘लुटियंस इंपीरियल’ सिटी क्षेत्र के साथ ही भारत की राजधानी के ‘हृदय’ की पहचान करता था । आपको पता है कि यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के पहले नियोजित शहर का ‘हृदय’ भी था, अर्थात इंद्रप्रस्थ !

कभी पांडवों के ‘सत्ता’ का केंद्र रहे इंद्रप्रस्थ ने पश्चात के अनेक शासकों को देखा, जो उसे अपने शासनकाल की शक्ति का केंद्र बनाने की होड में थे । उन्होंने इंद्रप्रस्थ के प्राचीन आधार पर अपने किले बनवाए; पर मेरा उत्साह कुछ सेकंड तक ही रहा; क्योंकि मेरा ध्यान ऊपर के छोटे शीर्षक तथा लेख के विवरण पर गया । नए पुरातात्विक उद्यान का नाम ‘दीनपनाह पुरातत्व उद्यान’ पढकर मुझे गहरा धक्का लगा ।

पुराना किल्ला

२. पुरातत्वशास्त्र की परिभाषा में ‘दीनपनाह’ का स्थान है क्या ?

पुरातत्वशास्त्र का ‘दीनपनाह’ से क्या संबंध हो सकता है, यह जानने का प्रयास करते समय मैं भ्रमित हो गई । यदि पुरातत्वशास्त्र का अर्थ ‘दुर्लभ, प्राचीन इतिहास पुरातनता का अध्ययन’ है, तो क्या ‘दीनपनाह’ शब्द इस परिभाषा में सटीक बैठता है ?

पुरातत्वशास्त्र की परिभाषा ‘ऐतिहासिक लोगों तथा उनकी संस्कृतियों, कलाकृतियों, शिलालेखों, स्मारकों तथा ऐसे अन्य अवशेषों का, विशेषतः उत्खनन किए गए अवशेषों का विश्लेषण करके किया गया वैज्ञानिक अध्ययन’ जैसी दी गई है । किसी स्थान का पुरातत्वशास्त्र, अर्थात उसके स्वभाव के अनुसार साहित्यिक प्रमाण, ऐतिहासिक रिकॉर्ड अथवा किसी क्षेत्र में उत्खनन के समय पाए गए सबसे प्राचीन ज्ञात अवशेष अथवा संस्कृति जो उस स्थान अथवा प्रदेश की प्राचीनता तथा उस क्षेत्र की संस्कृति दर्शाता है । क्या ‘दीनपनाह’ ‘एन.सी.आर.’ के आज के शाही शहर क्षेत्र के एवं प्राचीन इंद्रप्रस्थ के केंद्र में स्थित सबसे पुरानी वस्तु थी ? निश्चित रूप से नहीं ! कुछ पुस्तकें बताती हैं कि इस स्थान को हुमायूं एक विशिष्ट धर्म के विशिष्ट पंथ के लोगों के लिए समर्पित ‘दीनपनाह’ सिद्ध करना चाहता था तथा उसने इसे पुराना किला के इंद्रप्रस्थ के प्राचीन अवशेषों पर बनवाना आरंभ किया । यह उसकी अल्पकालिक कल्पना थी; क्योंकि शेरशाह सूरी ने उसे पराजित किया एवं इंद्रप्रस्थ, पुराना किला तथा शेरगढ में स्वयं का शहर बनाकर पुनः निर्माण किया । यद्यपि हुमायूं इस प्राचीन प्रदेश पर दुबारा अधिकार पाने के लिए वापस आया था, तो भी उसके दूसरे शासनकाल के कुछ महीनों में ही उसकी मृत्यु हो गई । यहां के ‘पुरातत्वीय’ संबंध एवं सबसे प्राचीन खोजें वह प्राचीनता प्रकट करती हैं, जो सदियों पुरानी हैं । तो ‘दीनपनाह’ इन सबके लिए कैसे पात्र है ?

धर्मनिरपेक्षतावादियों के दबाव में प्राचीन नगर इंद्रप्रस्थ को मिटाने का प्रयास!

‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ (Archaeological Survey of India – ASI) और नीति सिद्ध करने वाली ‘राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण’ (National Monuments Authority – NMA) ये संस्थाएं किसी भी स्थान की प्राचीनता एवं सबसे पुराने ज्ञात अवशेषों तथा इतिहास के विषय में परामर्श देने के लिए सर्वोत्तम सुसज्जित हैं । यह प्रक्रिया आकार ले रही थी, तब क्या ये दोनों संस्थाएं सोई हुई थीं ? अथवा ‘जिहादी धर्मनिरपेक्षतावादियों’ की युक्ति से वे इतने प्रभावित हुए थे कि यहां के प्राचीन काल के पहले शहर को ‘मारने’ के सूक्ष्म प्रयासों की अनदेखी करने लगे ? यह एक रात में नहीं हो सकता था तथा उनकी जानकारी के बिना निश्चित ही नहीं हो सकता था । इस लेख में कहा गया है कि ‘दिल्ली विकास प्राधिकरण’ (‘डीडीए’) ने देहली के मुख्य प्रारूप में परिवर्तन किए हैं तथा ‘एन.सी.आर.’ का ‘हृदय’ व्याप्त करने वाला नया ‘दीनपनाह पुरातत्व उद्यान’ अधिसूचित किया है । इस लेख में इस उपक्रम के लिए देहली विकास प्राधिकरण के परामर्शदाताओं का भी उल्लेख है । किसके परामर्श तथा दबाव में देश की राजधानी की उत्पत्ति के इतिहास एवं पहचान से खेलने वाला ऐसा कदम उठाया गया ?

– नीरा मिश्रा

३. उद्यान को नाम देते समय संबंधित संस्थाओं से चर्चा किए बिना उसका नामकरण क्यों ?

ऐसा होते हुए भी ‘एन.सी.आर.’ के प्रमुख भाग में स्थित पुरातत्व उद्यान को यह नाम क्यों दिया गया ? संयोग से यहां यह उल्लेख किया जाना चाहिए कि इस भाग में स्थित पुराना किला, हुमायूं का मकबरा, अन्य अनेक मकबरे, स्थल, अवशेष एवं भवन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संरक्षित सूची में हैं । क्या ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ तथा नीति सिद्ध करने वाले ‘राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण’ इन संस्थाओं से उचित चर्चा न करके पुरातत्व उद्यान को नाम दिया जा सकता है ? प्राचीन इतिहास तथा आधे शतक से अधिक समय तक किए गए विभिन्न उत्खननों के निष्कर्षों को ध्यान में नहीं लिया जाना चाहिए एवं यहां अस्तित्व में स्थित सबसे पुराने ज्ञात स्थान से यह नाम नहीं लिया जाना चाहिए ?

४. सरकारी रिकॉर्ड में इंद्रप्रस्थ का नाम होते हुए भी जानबूझकर उसका नाम मिटाने का प्रयास

‘गजेट ऑफ इंडिया १९१३’ में १२ नवंबर १९१२ को दी गई सूचना में स्पष्ट रूप से पुराना किला की पहचान इंद्रप्रस्थ के नाम से की गई है । वर्ष १८७७ के भारतीय सर्वेक्षण मानचित्र (नक्शे) में इंद्रप्रस्थ को बडे ‘एन.सी.आर.’ प्रदेश का राजस्व जिला दर्शाया गया है । ‘देहली जिला वर्ष १९८३-८४ का गैजेटियर’, ‘इम्पीरियल सिटी गैजेटियर (संस्करण ११, संस्करण २०-१९०८)’ तथा अन्य अनेक सरकारी रिकॉर्ड में इंद्रप्रस्थ प्रदेश का उल्लेख है । २०वीं शताब्दी के आरंभ तक पुराना किला के परिसर में ही ‘इंद्रप्रस्थ’ नाम का गांव अस्तित्व में था । इंद्रप्रस्थ देश की राजधानी के मध्यभाग में स्थित सबसे पुराना ज्ञात शहर है, ‘देहली विकास प्राधिकरण’ के अधिकारियों को इस वस्तुस्थिति की अच्छी जानकारी है । ऐसा होते हुए भी  यह ‘जानबूझकर किया गया परिवर्तन’ क्यों ? किस उद्देश्य से यह परिवर्तन किया गया है ? इसका उत्तर कौन दे सकता है ?

सौजन्य : Vivekananda International Foundation New Delhi

५. इंद्रप्रस्थ के ऐतिहासिक तथ्य के विषय में सरकारी कार्यालयों से अल्प प्रतिसाद

मैंने तत्काल ‘देहली विकास प्राधिकरण’ के उपाध्यक्ष से संपर्क किया तथा अधिसूचना पर लिखित आपत्ति जताई । आरंभ में वे मुझे विविध आयुक्तों तथा परिवादों से  निर्देश देते रहे; परंतु अनुमानतः १ महीने उपरांत उन सभी ने किसी भी प्रकार की सहायता करने से मना कर दिया । मैंने उसी समय सांस्कृतिक मंत्रालय से संपर्क किया और पुरातत्व तथा ऐतिहासिक स्रोतों के उचित तथ्यों, साथ ही इंद्रप्रस्थ पर सरकारी अधिसूचनाओं का हवाला देते हुए सचिव एवं मंत्री दोनों को पत्र लिखा । मंत्री के कार्यालय ने तुरंत कुछ कदम उठाए तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को मेरे द्वारा रखे गए तथ्यों एवं ‘इस पुरातत्व उद्यान का उचित नाम क्या होना चाहिए ?’ इस विषय में पुष्टि करने को कहा । सचिव ने मुझे शहरी विकास सचिव से मिलने को कहा; क्योंकि ‘देहली विकास प्राधिकरण’ उनके मंत्रालय के अंतर्गत आता है तथा नाम की अधिसूचना प्राधिकरण द्वारा ही दी गई थी । मैंने मंत्री तथा नगर विकास मंत्रालय के सचिव, दोनों को पत्र लिखा था ।

पुराना किला में उत्खनन

सचिव को उत्तर देना उचित नहीं लगा; परंतु मंत्री के कार्यालय ने मुझे तुरंत अतिरिक्त सचिव शहरी विकास से जोडा । उन्होंने मेरा अनुरोध सुना तथा कागदपत्रों (दस्तावेजों) में की गई गलती सुधारने का आश्वासन दिया ।

६. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्था की पुस्तक में इंद्रप्रस्थ शहर का उल्लेख न होना !

इस विकास पर शोध करते समय मुझे हुमायूं के मकबरे पर और ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ संस्था के कक्ष से बेची जाने वाली एक पुस्तक मिली । उसमें कहा गया है, ‘देहली की प्राचीनता १ सहस्र वर्ष पुरानी है । यहां अनेक शहर हुए और हुमायूं ने पुराने किले पर दीनपनाह बनवाया था ।’ इसमें इंद्रप्रस्थ शहर का उल्लेख नहीं है । उसमें ‘दीनपनाह’ शीर्षक के साथ पुराना किला की छवि है । पुराना किला के ‘लाइट एंड साउंड (ध्वनि और प्रकाश) शो’ में इंद्रप्रस्थ को केवल १ मिनट और मध्ययुगीन युग के इतिहास को ९५ प्रतिशत से अधिक समय दिया जाता है । क्या यह न्यायसंगत है ? इंद्रप्रस्थ तथा पुराना किला, ये स्थानीय शासकों के आधिपत्य में द्वापर काल से वर्ष ११९२ तक अस्तित्व में थे ।

महाभारत से इंद्रप्रस्थ के सांस्कृतिक संबंधों पर भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा सर्वेक्षण

हस्तिनापुर जैसे अन्य महाभारत काल के शहरों से इंद्रप्रस्थ के समान सांस्कृतिक संबंध खोजने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने वर्ष १९५४-५५, वर्ष १९६९-७२, वर्ष २००२-२००३ तथा वर्ष २०१३-२०१४ में पुराना किला में तथा देहली पुरातत्व विभाग ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के (‘एन.सी.आर.’ के) अनेक प्राचीन भागों में अत्यंत सकारात्मक निष्कर्षों के साथ खोज और उत्खनन किया है । मुझे इसमें रुचि है; क्योंकि मैं लगभग पिछले २ दशकों से प्राचीन भारत का, विशेषतः महाभारत काल के इतिहास एवं सांस्कृतिक धरोहर (विरासत) का अध्ययन एवं प्रचार कर रही हूं ।

– नीरा मिश्रा, अध्यक्षा, द्रौपदी ड्रीम ट्रस्ट, देहली ।

७. राजधानी की जडों, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक मूल्यों की रक्षा करना, प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है !

वास्तव में अकबर के काल में भी हेमू चंद ने अकबर की सेना को पराजित करके पुराना किला पर ही राजा के रूप में स्वयं का राज्याभिषेक किया था । निर्दयतापूर्वक उसकी हत्या कर दी गई तथा वर्ष १८५७ तक मुगल शासन चलता रहा, यह एक और कहानी है; परंतु पांडवों द्वारा स्थापित इंद्रप्रस्थ शहर के केंद्रबिंदु के रूप में पुराने किले की मान्यता, साथ ही महत्त्व सदैव बना रहा । भारत की राजधानी की जडों, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक मूल्यों तथा पहचान की रक्षा करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य और दायित्व नहीं है क्या ? देश का संविधान मुझे वैसा करने का अधिकार देता है ।

 

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हिन्दू संस्कृति गहराई (डीपरूटेड) तक जमी हुई एवं व्यापक है । इन जडों का पोषण आवश्यक है, जिससे हमारे प्राचीन काल के पेड को उसके सदाबहार पत्ते तथा सदियों से मानवता को समृद्ध करने वाली आध्यात्मिकता एवं ज्ञान के फल टिके रहें । मैं आत्मविश्वास से कहती हूं कि हमारी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की प्राचीनता न्यूनतम ईस्वी सन् पूर्व ३ सहस्र वर्षों तक या उससे भी अधिक अर्थात महाभारत तथा पांडव शहर, अर्थात इंद्रप्रस्थ काल तक पीछे जाती है ।

लेखिका : नीरा मिश्रा, अध्यक्षा, द्रौपदी ड्रीम ट्रस्ट, देहली ।