‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में ‘छत्रपति शिवाजी महाराजजी की दृष्टि एवं वर्तमान भारत’ विषय पर चर्चासत्र

दिल्ली – ‘छत्रपति शिवाजी महाराजजी ने अपनी सेना अल्प होते हुए भी ४०० कि.मी. यात्रा कर सूरत को लूटा । उन्होंने औरंगजेब द्वारा किए गए अपमान का प्रतिशोध लिया । पहली ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ उन्होंने लाल महल में बैठे शाइस्ता खान पर की । ‘जिसका नौदल, उसकी समुद्र पर सत्ता !’ यह स्वराज्य की नीति निर्धारित करते हुए देश का पहला नौदल स्थापित करना, यह उनकी दूरदृष्टि का उदाहरण था । छत्रपति शिवाजी महाराजजी ने सामान्य किसान वर्ग के युवाओं को आवश्यक युद्ध प्रशिक्षण देकर मावळे तैयार किए । उस सेना के माध्यम से उन्होंने हिन्दवी स्वराज्य स्थापित किया । उसी प्रकार आज नागरिकों को ऐच्छिक रूप से सैन्य प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी चाहिए’, ऐसा मार्गदर्शन ‘छत्रपति शिवाजी महाराज राष्ट्रीय स्मारक समिति’ के महासचिव कर्नल मोहन काकतीकरजी (सेवानिवृत्त) ने किया । वे ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में ‘छत्रपति शिवाजी महाराजजी की दृष्टि और वर्तमान भारत’ इस चर्चासत्र में बोल रहे थे ।
भारत को महासत्ता बनाने के लिए शिवछत्रपति की संस्कृति रक्षा की नीति आवश्यक ! – उदय माहुरकरजी, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एवं संस्थापक, ‘सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन’१ सहस्र ६०० कि.मी. तक फैला हिन्दवी स्वराज्य स्थापित करनेवाले छत्रपति शिवाजी महाराजजी को सही अर्थों में जो मान-सम्मान मिलना चाहिए था, वह आज नहीं मिला है । पिछले १ सहस्र वर्षों में शिवछत्रपति जैसा तेजस्वी राजा नहीं हुआ । शिवछत्रपति ने धर्मांतरित हुए फलटण के बजाजी निंबाळकर का केवल शुद्धीकरण ही नहीं किया, अपितु उन्हें अपनी बेटी भी दी । वीर सावरकरजी को भाषाशुद्धि की प्रेरणा शिवछत्रपति से मिली । उनके द्वारा किया गया संस्कृति रक्षा का कार्य, यही ‘सेव भारत, सेव कल्चर फाउंडेशन’ की प्रेरणा है । आज भारत में जिस प्रकार दूरदर्शन चैनल, ‘ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म’ आदि के माध्यम से अश्लीलता की भरमार चालू है, उसे देखते हुए इसके विरुद्ध सभी को क्रियाशील होना चाहिए । भारत को वर्ष २०४७ में ‘महाशक्ति’ बनाते समय, उसे सांस्कृतिक दृष्टि से भिखारी बनाना उचित नहीं है । उसके लिए शिवछत्रपति की संस्कृति रक्षा की नीति अपनानी चाहिए । |
| ‘जागरण टी.वी.’ की राजनीतिक संपादिका स्मृति रस्तोगी स्वयं हिंदी भाषी होते हुए भी उन्होंने चर्चासत्र का प्रारंभ एवं अंत छत्रपति शिवाजी महाराजजी की मराठी में विरुदावली से किया तथा सभी से खडे होकर सहभागी होने की विनती की । |

शिवछत्रपति के समान आक्रामक रणनीति की आज भी आवश्यकता है ! – राहुल दिवानजी, संस्थापक, ‘शरयू फाउंडेशन’
आज हिन्दुओं की शक्ति सुरक्षात्मक अथवा प्रतिक्रियात्मक आंदोलनों, कानूनों के लिए व्यर्थ हो रही है । जो धर्मांध लोग ३ सहस्र किलो अमोनियम नाइट्रेट का उपयोग कर लाखों लोगों को मारकर पूरा देश नष्ट करने की योजना बनाते हैं, उनके सामने आंदोलन की रणनीति असफल हो सकती है । आज शिवछत्रपति से ‘आक्रामक रणनीति’ सीखनी चाहिए, साथ ही बडी मात्रा में हिन्दुओं के शुद्धीकरण के प्रयास होने चाहिए । उसके लिए महंतों, कथावाचकों आदि को स्वेच्छा से स्वधर्म में आने की इच्छा रखनेवालों की व्यवस्था करनी चाहिए । शुद्धीकरण की प्रक्रिया तेज तथा सरल होनी चाहिए ।
श्री. राहुल दीवानजी ने कहा, ‘‘देशभर में केवल सनातन संस्था ही धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र की मांग करती हुई दिखाई देती है !’’
छत्रपति शिवाजी महाराजजी की उत्तुंग प्रेरणा के कारण ही मराठे मुगलों से लडे ! – हिन्दुत्वनिष्ठ लेखिका श्रीमती शेफाली वैद्यजी
वर्ष १५६५ में तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर साम्राज्य के रामराय की हत्या कर निजामशाह ने हिन्दुओं का मनोबल तोडने के लिए उनका सिर शहर के प्रवेश द्वार पर टांग दिया । उसके १०० वर्ष उपरांत शिवछत्रपति ने हिन्दवी स्वराज्य का निर्माण करने की प्रतिज्ञा की । ५ मुगल साम्राज्यों से लडकर स्थापित किया गया राज्य पुनः शत्रु को दे दिया; परंतु उसके पश्चात आगरा से औरंगजेब की कैद से मुक्ति पाई और पुनः संपूर्ण राज्य शून्य से प्राप्त किया । उन्होंने मंदिरों की रक्षा की । मुगलों, पुर्तगालियों द्वारा तोडे गए मंदिरों को पुनः बनवाया । शिवछत्रपति का राज्य धर्माधिष्ठित था । उनकी उत्तुंग प्रेरणा के कारण ही धर्मवीर संभाजी महाराजजी की मृत्यु के उपरांत सिंहासन पर राजा न होते हुए भी २७ वर्ष तक मराठे मुगलों से लडे ।
शिवछत्रपति का स्वराज्य आदर्श धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र ही था ! – सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी, राष्ट्रीय मार्गदर्शक, हिन्दू जनजागृति समिति
छत्रपति शिवाजी महाराजजी ने ‘श्री’ की अर्थात भगवान की इच्छा मानकर हिन्दवी स्वराज्य स्थापित किया । उन्होंने गोमाता, मंदिर, धर्म-परंपरा आदि की प्रत्यक्ष रक्षा की । विदेशी आक्रमणकारियों की भाषा का प्रभाव रोकने के लिए संस्कृत में राजमुद्रा, राज्यव्यवहार कोश आदि बनवाए । शास्त्रसम्मत कानून सिद्ध किए । धर्मशास्त्रसम्मत अपना राज्याभिषेक करवाया; परंतु इसके पीछे उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा नहीं थी, अपितु भगवत्सेवा, समाजसेवा जैसा उदात्त उद्देश्य था । धर्मराज्य अर्थात वह राज्य जहां राष्ट्र, धर्म, व्यक्ति एवं समाज, इन सबकी उन्नति की व्यवस्था होती है ! इससे स्पष्ट होता है कि छत्रपति शिवाजी महाराजजी का राज्य आदर्श धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र ही था ।
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