प.पू. भक्तराज महाराजजी (प.पू. बाबा) से हुई पहली भेंट के कुछ विशेष प्रसंग !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी के महानिर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में उनके चरणों में सनातन परिवार का कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार !

सनातन के श्रद्धास्रोत प.पू. भक्तराज महाराजजी

१. पहली भेंट में ही ‘आपको माया का कुछ नहीं मिलेगा’, स्पष्ट शब्दों में ऐसा बतानेवाले प.पू. बाबा !

‘६.३.१९९४ को मैं प.पू. बाबा के दर्शन के लिए गया था । हम वहां खडे थे, तभी किसी ने प.पू. बाबा को हमारा परिचय बताया । उस समय प.पू. बाबा ने कहा, ‘‘मैं कोई चमत्कार करनेवाला बाबा नहीं हूं । मुझे चमत्कार करना नहीं आता । मैं किसी को ‘इसे बडा घर मिले, पैसे मिलें’ जैसे आशीर्वाद नहीं देता । मेरे हाथ से विभूति नहीं निकलती । मेरे गुरु ने मुझे जो नामजप करने के लिए कहा, वही मैं अन्यों को बताता हूं । आपको मेरे पास आना है या नहीं, यह आप अभी सुनिश्चित कर लीजिए ।’’ उस पर मैंने कहा, ‘‘मुझे नामजप करना सीखना है ।’’ उस पर उन्होंने कहा, ‘‘आप बैठिए !’’ तब हम नमस्कार कर उनके चरणों में बैठ गए ।

डॉ. दुर्गेश सामंत

२. प.पू. बाबा की बातों की ओर मेरा ध्यान नहीं है, यह देखकर मुझ पर उनका चिल्लाना तथा आप मेरी बातों पर ध्यान दीजिए’, ऐसा बताना

प.पू. बाबा ने रात को लगभग ३ घंटे अध्यात्म के विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन किया । उसमें वे २-३ बार मुझ पर जोर से चिल्लाए । एक बार ‘नामजप कैसे होना चाहिए ?’, यह बताते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हृदय की प्रत्येक धडकन के साथ नामजप होना चाहिए । नामजप नाडी में बैठ जाना चाहिए । आपको नाडी जांचना आता है न ? आप नाडी पर हाथ लगाकर देखिए तथा उसके साथ आपका नामजप चल रहा है न, यह देखिए ।’’ मैं वैसे करने लगा । उसके उपरांत प.पू. बाबा आगे और कुछ सूत्र बता रहे थे । वे जब बोल रहे थे, तब ‘मेरा ध्यान नाडी की ओर है’, यह उनके ध्यान में आया तथा वे जोर से चिल्लाए, ‘‘मैं जो बता रहा हूं, उसकी ओर आपका ध्यान नहीं है । केवल हाथ में नाडी पकडकर क्या मिलेगा ?’’ उस पर मैंने ‘जी हां बाबा’, ऐसा बोलकर उनसे क्षमा मांगी तथा ध्यान एकाग्र कर वे क्या बोल रहे हैं, यह सुनने लगा ।

३. प.पू. बाबा एवं अन्य महान संतों की अनुभूतियों में समानता दिखाई देने से ‘संत कबीर,संत ज्ञानेश्वर जैसे संतों की भांति प.पू. बाबा भी बडे संत हैं’, इसके प्रति आश्वस्त होना

प.पू. बाबा ने मुझे उनके भजनों का अध्ययन करने के लिए कहा । प.पू. बाबा के मिलने से पहले से ही मैं ये भजन सुनता था । मैं भजनों की पुस्तक में संबंधित भजन में दी गई कठिन संज्ञाओं का अर्थ भी देख रहा था । भजन का अर्थ समझकर भजन सुनने का मेरा प्रयास भी चल रहा था । अब ‘और अध्ययन कैसे करना है ?’, यह मैं समझ नहीं पा रहा था; परंतु प.पू. बाबा की आज्ञा है, तो मुझे लगा कि ‘मुझे प्रयास करना चाहिए ।’ मैं जब इस विचार में था, तब मुझे ग्रंथालय में गुरुदेव रानडेजी के २ ग्रंथ मिले । उसमें भारत के विभिन्न संतों की रचनाओं में उन संतों की अनुभूतियां, उनकी साधना इत्यादि के विषय में लिखा गया था । उन ग्रंथों में प्रमुखता से ‘संत चाहे कहीं के भी हो, उनकी अनुभूतियां एक ही प्रकार की होती हैं’, इस विषय में बताकर उन अनुभूतियों की विशेषताओं का अध्ययन किया गया था । ‘वास्तव में काव्य भावनाओं का उत्कट उद्गार होता है’, साहित्य के अध्येताओं को तो यह बात ज्ञात है ही । उसके कारण उन ग्रंथों में दिए अन्य संतों के उदाहरणों तथा प.पू. बाबा के भजन की पंक्तियों के मध्य मुझे अनेक स्थानों पर समानता दिखाई दी, उदाहरणार्थ ‘राम रतन धन पायो’ भजन में ‘रत्न दिखाई देना’ अनुभूति है’, ऐसा गुरुदेव रानडेजी बताते हैं । प.पू. बाबा के एक भजन में ‘‘सोनियाच्या शिंपल्यात गावला हा चिंतामणी’ इस प्रकार से उन्हें हुई एक अनुभूति का वर्णन था । इस प्रकार ‘रत्न दिखाई देने’ का अर्थ मन का संपूर्ण सात्त्विक होना’ है । इस अध्ययन में मुझे इस प्रकार समानता दिखाई देने से ‘प.पू. बाबा संत कबीर, संत ज्ञानेश्वर महाराज जैसे संतों की भांति बडे संत हैं’, इसके प्रति मेरी बुद्धि आश्वस्त हुई ।

४. भजन सूझने के लिए साधना तथा भगवान की कृपा चाहिए !

एक बार प.पू. बाबा ने कहा, ‘‘भजन मेरा जीवनचरित्र है । वह मेरी वास्तविक पहचान है । ग्यानगिरी महाराजजी ने मुझे बताया, ‘‘आप भजन पर अपनी छाप (नाम) लगाइए ।’’; परंतु मैं कैसे छाप लगा पाऊंगा ?; क्योंकि वे भजन तो ‘उसके (भगवान) के हैं ।’’ प.पू. बाबा ने उनके एक भजन का उदाहरण देते हुए कहा, ‘‘मेरा यह भजन अधूरा रह गया । उसके आगे मुझे सूझ नहीं रहा था । तो मैंने अनेक लोगों को ‘आप मेरा यह भजन पूर्ण कीजिए’, ऐसा कहा; परंतु वह किसी के लिए संभव नहीं हुआ । एक बार पी. सावळाराम (मराठी फिल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकार) मेरे पास आए थे । मैंने उन्हें वह अधूरा भजन देकर कहा, ‘‘आप इसे पूर्ण कीजिए’ कुछ महीने पश्चात वे मेरे पास आए और कहने लगे, ‘‘बाबा, आप यह भजन वापस लीजिए । मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है ।’’ आगे जाकर प.पू. बाबा की एक भक्त कु. सीमा गरुड ने उसे पूर्ण किया । भजन सूझने के लिए साधना एवं ईश्वर की कृपा चाहिए । इस माध्यम से प.पू. बाबा ने अप्रत्यक्षरूप से इस प्रकार से भजन सूझने तथा सामान्य कविताओं के लिए सूझने के मध्य का अंतर दिखा दिया ।’

– डॉ. दुर्गेश सामंत (आयु ६४ वर्ष), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (६.१.२०२५)