श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्वक किया जानेवाला अन्नदानादि कर्म !

अपने कुल के दिवंगत (पूर्व की न्यूनतम ३ पीढियों तक के) सभी पूर्वजों का श्राद्धकर्म करने का पक्ष (पखवाडा) है पितृपक्ष ! श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्वक किया जानेवाला अन्नदानादि कर्म ! इसका भाव अत्यंत कृतज्ञता, प्रेम एवं आदर व्यक्त करनेवाला है ।

 

 हमारे यहां ब्रह्मयज्ञ, दैवयज्ञ, पितृयज्ञ, भौतयज्ञ एवं नृयज्ञ, ऐसे ५ महत्त्वपूर्ण यज्ञ बताए हैं ।

अ. ब्रह्मयज्ञ : वेदादि शास्त्राध्ययन

आ. दैवयज्ञ : देवतापूजन एवं यजन

इ. पितृयज्ञ : श्राद्ध पक्षादि

ई. भौतयज्ञ : पशु एवं पक्षियों को अन्नांश देना (गोग्रास, काकबलि इत्यादि)

उ. नृयज्ञ : अतिथियों का सत्कार

इनमें से पितृयज्ञ का एक भाग है विधियुक्त पक्ष एवं श्राद्धकर्म करना !

वेदमूर्ति भूषण दिगंबर जोशी

१. कुलवृद्धि, कुलक्षय रक्षा एवं  पारिवारिक सुस्वास्थ्य हेतु श्राद्ध करना महत्त्वपूर्ण !

आपके कुलदेवता एवं पूर्वजों को आपके कुल के प्रति बडा गर्व होता है । उसके कारण आपसे उनकी अपेक्षाएं भी होती हैं; इसलिए उसमें विलंब किए बिना कर्तव्यबुद्धि से तथा श्रद्धापूर्वक संबंधित कर्म करना कुलवृद्धि, कुलक्षय रक्षा एवं पारिवारिक सुस्वास्थ्य के लिए अत्यंत हितकारी होता है ।

२. कव्य (अन्न) पूर्वजों तक कैसे पहुंचता है ?

आप शास्त्रोक्त मंत्रोच्चारण सहित जो कव्य (अन्न) पूर्वजों को समर्पित करते हैं, उसे कव्यवाहन – अग्नि, जिस लोक में जो पितृ उस अन्न का भक्षण करता है, वहां ले जाकर उसके अन्न में परिणत (अंतर्भूत) कर वहां उसे प्राप्त कराता है । चाहे वह देवता, पूर्वज, यक्ष, गंधर्व जैसे देवकोटि का हो अथवा बाघ, सिंह, हाथी, कौआ, गरुड जैसे पशु-पक्षियों की योनि प्राप्त किया हुआ हो अथवा वह भूत, पिशाच इत्यादि में से हो अथवा पुनः मनुष्य योनि प्राप्त किया हुआ हो । जिस प्रकार भारतीय रुपया डॉलर, यूरो, पाऊंड, दिनार इत्यादि में उचित मूल्य में रूपांतरित किया जाता है, ऐसा ही यह है !

३. श्राद्ध पक्ष कभी व्यर्थ नहीं होता !

इसमें ‘यदि पूर्वज मुक्त हुआ हो, तो ?’, यह शंका हो सकती है । ऐसी स्थिति में पितृलोक के मुख्य देवता ‘अर्यमा’ यह कव्य ग्रहण करते हैं तथा आपको भरपूर आशीर्वाद देते हैं । आप जो श्राद्ध पक्ष करते हैं, वे कभी भी व्यर्थ नहीं होते, यह निश्चित है !

४. श्राद्ध पक्ष के प्रति कुछ अनुचित तर्क तथा उनके उत्तर

अ. तर्क : कुछ लोगों का यह तर्क होता है, ‘श्राद्ध पक्ष करने की अपेक्षा हम निर्धन, अनाथ, वृद्धाश्रमों में रहनेवाले वृद्ध इत्यादि के लिए अन्नदान अथवा अन्य उचित कल्याणकारी कुछ करते हैं ।

उत्तर : ये जो कर्म हैं, वे निश्चित ही पुण्यकारी लोकोपयोगी एवं प्रशंसनीय हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है; परंतु श्राद्ध पक्ष अकर्तव्य नहीं सिद्ध होते । जैसे कि ‘मैं प्यास लगने पर पानी पीता हूं तथा भूख लगने पर भी मैं अन्न के स्थान पर उसकी समान मात्रा में पानी ही पीता हूं’, ऐसा कहना अथवा आपके यहां गमलों में कुछ पौधे लगाए हों और आपने कुछ पशु भी पाले हों तथा आपने यह मन बनाया कि पेडों के लिए आवश्यक अन्नोदक पशुओं को ही दिया जाए अथवा उसके विपरीत कहा जाए, तो क्या वह तर्कसंगत होगा ? श्राद्ध पक्ष भी वैसा ही है; इसलिए श्राद्ध पक्ष के स्थान पर किए उपरोक्त सत्कर्म का पुण्य निश्चित ही मिलेगा; परंतु पक्ष-श्राद्ध टालने का पाप लगना अटल है ! तस्मात विधियुक्त पक्ष-श्राद्ध करना गृहस्थ का पवित्र कर्तव्य ही है, इसे सदैव ध्यान में रखें ।

आ. तर्क : कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं, ‘देखिए ! यह व्यक्ति पूरे जीवन में माता-पिता से लडता रहा तथा अब उनकी मृत्यु के उपरांत यह पक्ष-श्राद्ध करने का ढोंग कर रहा है । वाह रे वाह ! उसके पूर्वज इसका कव्य (अन्न) बिल्कुल ही स्वीकार नहीं करेंगे ।

उत्तर : यह उचित ही है कि माता-पिता जब जीवित होते हैं, तब उनके प्रति प्रेमपूर्वक तथा सम्मानपूर्वक व्यवहार कर उनका आज्ञाकारी बने रहना चाहिए; परंतु पापबुद्धिवश वैसे नहीं हुआ, तब भी यदि वर्तमान में वह माता-पिता का पक्ष-श्राद्ध कर रहा हो, तो कहना चाहिए, ‘अब तो वह श्रद्धापूर्वक पक्ष-श्राद्ध कर रहा है न ! ईश्वर उसका भला करें !’ इसका अर्थ माता-पिता के होते हुए उनके साथ निष्ठुरतापूर्वक व्यवहार करनेवाला उनका पुत्र उनकी मृत्यु के उपरांत श्राद्ध पक्ष के अधिकार से वंचित नहीं हो जाता । कदाचित भयवश अथवा लोकापवाद के लिए भी वह पक्ष-श्राद्ध कर रहा हो, तो उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए । वह सत्कर्म कर रहा है न, केवल यह देखना चाहिए ।

५. बिना चूके श्राद्ध पक्ष करना महत्त्वपूर्ण !

मैं यह बताना चाहता हूं कि एक बार दशहरा, दीपावली जैसे त्योहारों के समय छुट्टी नहीं ली, तब भी चलेगा; परंतु आप पक्ष-श्राद्ध करने से न चूकें । उसके लिए अवश्य पर्याप्त समय निकालें ।

‘हम भगवान रामकृष्णादि को मानते तो हैं; परंतु उनकी शिक्षा तथा आचरण को नहीं मानते’, आज समाज में इस प्रकार आस्तिक लोगों की एक भ्रष्ट परंपरा समाज में फैल रही है, उदा. वन में रहते समय प्रभु श्रीराम को भरत से पिता के देहांत का समाचार मिलते ही उन्होंने उचित फल के मगज के पिंड बनाकर पिता के लिए मंत्रोच्चारण सहित श्राद्धकर्म संपन्न किया । भगवान परशुराम ने तो शत्रु के रक्तयुक्त जल से पूर्वजों का तर्पण किया । महाराज युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध के दोनों पक्षों के करोडों मृतक वीरों के लिए श्राद्धकर्म किया, जबकि अर्जुन ने गृहकलह में मारे गए मृतक यदुवीरों के लिए श्राद्ध एवं तर्पण किया । आधुनिक काल के तथा नौकरी-व्यवसाय का कारण बताकर ‘इसके लिए पत्नी/पति का साथ नहीं मिलता’, ऐसा बोलने से नहीं चलेगा । यह आत्मवंचना ही है, आस्तिक लोगों को इसे ध्यान में लेना चाहिए ।

तात्पर्य : सभी लोग पक्ष-श्राद्ध संपादन के पवित्र कर्तव्य का अवश्य निर्वहन करें, यही आग्रहपूर्ण निवेदन ! एक महत्त्वूपर्ण बात यह है कि इस पितृपक्ष में कोई भी मांगलिक कार्य न करें, यही उचित है; परंतु आत्मकल्याण का पारमार्थी साधन किए बिना न करें, इसे भी न भूलें । किसी भी स्थिति में उसे अवश्य करें !

– वेदमूर्ति भूषण दिगंबर जोशी, वेंगुर्ला, जिला सिंधुदुर्ग