१. इतिहास एवं उद्देश्य
असुरों के कष्ट से त्रस्त होकर सभी स्त्रियां श्री महालक्ष्मी गौरी की शरण में गईं । उन्होंने उनसे उनका सौभाग्य अक्षय रखने की प्रार्थना की । उसके कारण श्री महालक्ष्मी गौरी ने भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन असुरों का संहार कर शरण में आईं स्त्रियों के पतियों को तथा पृथ्वी पर स्थित सभी प्राणियों को सुख प्रदान किया; इसलिए अखंड सौभाग्य प्राप्त होने हेतु स्त्रियां ज्येष्ठा गौरी का व्रत रखती हैं ।
२. व्रत की पद्धति
अ. यह व्रत तीन दिन तक चलता है । प्रांतभेद के अनुसार इस व्रत को रखने की विभिन्न पद्धतियां हैं । इसमें धातु की अथवा मिट्टी की प्रतिमा बनाकर अथवा कागद पर श्री महालक्ष्मी का चित्र बनाकर, तो कुछ स्थानों पर नदी तट पर स्थित पांच छोटे कंकड लाकर गौरी के रूप में उनका पूजन किया जाता है । महाराष्ट्र के अधिकांश स्थानों पर पांच छोटी मटकियों की ढलान रचकर उस पर श्री गौरी का मुखौटा रखते हैं । कुछ स्थानों पर सुगंधित फूलों के पौधे अथवा गुल मेहंदी या बालसम) के पौधों को एकत्रित बांधकर उनकी प्रतिमा बनाते हैं तथा उस पर मिट्टी का मुखौटा चढा देते हैं । मूर्ति को साडी पहनाकर सजाते हैं ।
आ. गौरी की प्रतिष्ठापना करने के उपरांत दूसरे दिन उनकी पूजा कर भोग लगाते हैं ।
इ. तीसरे दिन श्री गौरी का नदी में विसर्जन किया जाता है तथा विसर्जन कर वापस घर आते समय नदी की थोडीसी रेत अथवा मिट्टी लाकर उसे पूरे घर में फैला दिया जाता है ।’

‘सूर्यनमस्कार’ : व्यक्ति के जीवन के सभी अंगों के लिए लाभदायक !
Raichur Public Muharram Banned : कर्नाटक के रायचूर जिले के २९ गांवों में मोहर्रम सार्वजनिक रूप से मनाने पर प्रतिबंध !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
मुंबापुरी में सहस्रों के समष्टि संकल्प से राष्ट्ररक्षा हेतु प्राप्त हुआ आध्यात्मिक बल !
Bangladesh Hindus : पिछले ४ महीनों में १०० हत्याएं, २८ बलात्कार एवं ९५ मंदिरों में तोडफोड
संपादकीय : राष्ट्र के लिए त्याग करें !