साधकों के लिए सूचना !
‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की कृपा से सनातन संस्था ने जुलाई २०२५ तक मराठी में ३४७, अंग्रेजी में २०१, कन्नड में २०१, हिंदी में १९९, गुजराती में ७०, तेलुगु में ५४, तमिल में ४६, बांग्ला में ३०, मलयालम में २५, ओडिया में २२, पंजाबी में १३, नेपाली में ३ तथा असमिया में २ – इस प्रकार १३ भाषाओं में कुल १ करोड ८४ हजार प्रतियां प्रकाशित की हैं । संस्था की ओर से विभिन्न स्थानों पर प्रसंगानुसार, निमित्तानुसार तथा त्योहारों के समय ग्रंथ-प्रदर्शनियां आयोजित की जाती हैं । वहां उपलब्ध स्थान के अनुसार कुछ ही ग्रंथ प्रदर्शित किए जाते हैं; क्योंकि सभी ग्रंथ-प्रदर्शनी में रख पाना संभव नहीं होता । अतः जिज्ञासुओं को वांछित ग्रंथ वहां उपलब्ध न होने की स्थिति में वह ग्रंथ अथवा उसके जैसे ग्रंथ उपलब्ध कराने के विषय में विनम्रता से पूछें ।साथ ही, ‘सनातन का ग्रंथभंडार बहुत विशाल है’, यह बात जिज्ञासुओं को समझाने हेतु साधक उन्हें ग्रंथसूची दिखाएं । उसे देखकर जिज्ञासु वांछित ग्रंथ की मांग कर सकते हैं ।
जिज्ञासुओं द्वारा मांगे गए ग्रंथ उन्हें प्राप्त कराने के लिए निम्नलिखित पद्धतियों का उपयोग किया जा सकता है ।

१. जिज्ञासु का नाम, पता, संपर्क क्रमांक और ग्रंथ की मांग, यह विवरण लिखकर रखें । यदि वह ग्रंथ उनके घर अथवा कार्यालय पहुंचाना संभव हो, तो वहां पहुंचाएं ।
२. ‘Sanatanshop’ वेबसाइट पर सनातन के मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और गुजराती भाषाओं के ग्रंथ उपलब्ध हैं । इस वेबसाइट से जिज्ञासु घर बैठे ग्रंथ प्राप्त करने हेतु मांग कर सकते हैं ।
३. यदि कोई जिज्ञासु बाहर से आया हो, तो उसके जिले / राज्य के वितरक का संपर्क क्रमांक उसे दें । ये संपर्क क्रमांक ‘Sanatanshop’ पर उपलब्ध हैं । वेबसाइट के ‘Contact us’ विभाग में इनकी सूची मिल जाएगी । साथ ही उस जिज्ञासु का संपर्क क्र. लेकर संबंधित वितरक को भी दिया जा सकता है ।
४. साधक यह सुनिश्चित करें कि ‘जिज्ञासु को ग्रंथ प्राप्त हुआ है या नहीं ?’
‘सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी की कृपा से आपातकाल में जिज्ञासुओं को ‘साधना, राष्ट्र, धर्म, आयुर्वेद, दिनचर्या, व्यक्तित्व विकास’ आदि विविध विषयों पर आधारित ग्रंथ, ‘साधना तथा राष्ट्र और धर्म का कार्य’, इनका अगला चरण प्राप्त करने हेतु सहायता कर सकते हैं’, यह ध्यान में रखकर साधक जिज्ञासुओं को वांछित ग्रंथ उन तक पहुंचाने के लिए लगन से हर संभव प्रयास करें ।’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ (२९.७.२०२५)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !