श्री गणेश चतुर्थी की अवधि में आवश्यक उपासना का शास्त्र

श्री गणेश चतुर्थी हेतु पूजन की जानेवाली मूर्ति घर कैसे लाएं ?

अ. श्री गणेश की मूर्ति घर लाने हेतु घर का प्रमुख पुरुष अन्य लोगों के साथ जाए ।
आ. जो व्यक्ति मूर्ति हाथ में लेनेवाला है, वह पारंपरिक वेशभूषा करे अर्थात कुर्ता-धोती अथवा कुर्ता-पजामा पहने ।
इ. मूर्ति लाते समय उस पर रेशमी, सूती अथवा खादी का स्वच्छ वस्त्र डालें । मूर्ति घर लाते समय उसका मुख मूर्ति लानेवाले की ओर तथा पीठ सामने की दिशा में होनी चाहिए । मूर्ति के सामनेवाले भाग से सगुण तत्त्व, जबकि पिछले भाग से निर्गुण तत्त्व प्रक्षेपित होता है । मूर्ति को हाथ में पकडनेवाला पूजक होता है । वह सगुण के कार्य का प्रतीक है । मूर्ति का मुख उसकी ओर करने से उसे इस तत्त्व का लाभ मिलता है ।
ई. मूर्ति घर लाते समय श्री गणेश का जयघोष एवं नामजप करें ।
उ. घर की दहलीज पर खडे रहें । घर की सुहागन स्त्री मूर्ति लानेवाले व्यक्ति के पैरों पर पहले दूध तथा उसके पश्चात पानी डाले । बाहर से आनेवाला व्यक्ति रज-तमात्मक स्पंदनों से भारित होकर आता है । उसकी मलिनता दूर करने के लिए उसके पैरों पर दूध-पानी डालने की पद्धति है ।
ऊ. घर में प्रवेश करने से पूर्व मूर्ति का मुख सामने की ओर करें । तत्पश्चात मूर्ति का औक्षण (आरती) कर उसे अंदर ले आएं ।

गणेशोत्सव में धर्माचरण का संकल्प लेना ही श्री गणेश की खरी उपासना सिद्ध होगी !

गणेशोत्सव में यह न हो !

  • ‘प्लास्टर ऑफ पैरिस’ से बनाई अशास्त्रीय एवं विशालकाय मूर्ति
  • थर्माकोल की सजावट, भव्य मंडप तथा बिजली के दीपों की जगमगाहट, पटाखे, वाद्यवृंद वं फिल्मी गीतों के कारण होनेवाला ध्वनि एवं वायु प्रदूषण
  • विसर्जन शोभायात्रा में घिनौना नृत्य, स्त्रियों के साथ अभद्र व्यवहार एवं मदिरापान

गणेशोत्सव में यह हो !

  • खडिया मिट्टी व चिकनी मिट्टी से बनाई तथा प्राकृतिक रंगों में रंगी मूर्ति
  • प्राकृतिक पत्तों-फूलों की सजावट, छोटा मंडल तथा दीपों की सजावट, तालबद्ध आरती एवं भावपूर्ण नामजप, साथ ही वीररसयुक्त गीतों एवं उद्बोधक व्याख्यानों का आयोजन
  • विसर्जन शोभायात्रा में श्री गणेश का सामूहिक नामजप तथा रात के १० बजे से पूर्व शोभायात्रा का समापन

श्री गणेश चतुर्थी के दिन जिस मूर्ति का पूजन करना है, वह मूर्ति कैसी होनी चाहिए ?

ऋषि-मुनि एवं संतों ने शास्त्र लिखे हैं । जैसे उन्हें देवताओं का साक्षात्कार हुआ, वैसे उन्होंने शास्त्रों में देवताओं का वर्णन किया है; इसलिए शास्त्रों में बताए अनुसार मूर्ति बनाएं । चिकनी मिट्टी अथवा खडिया मिट्टी से मूर्ति बनाएं, यह शास्त्रवचन है । अन्य वस्तुओं से मूर्ति बनाना धर्मशास्त्र विरोधी है ! मूर्ति आकार में छोटी (एक फुट से डेढ फुट ऊंची) हो ! मूर्ति पीढे पर बैठी, बाईं सूंडवाली तथा प्राकृतिक रंगों में रंगी होनी चाहिए ! मूर्ति शास्त्र के अनुसार बनी हो, तो पूजक को उसका लाभ मिलता है । उसके लिए अथर्वशीर्ष में किए गए वर्णन के अनुसार ही गणेशमूर्ति लें !

श्री गणेश को लाल फूल एवं दूर्वा समर्पित करने की पद्धति !

गणेशपूजा में लाल  वस्त्र, लाल फूल एवं रक्तचंदन का उपयोग किया जाता है । उससे पूजा में स्थित मूर्ति जागृत होने में सहायता मिलती है । फूल समर्पित करते समय फूल की डंडी देवता की ओर तथा फूल हमारी दिशा में हो, इस प्रकार देवता को फूल समर्पित करें । श्री गणेश को २१ दूर्वा समर्पित करें । इन दूर्वाओं की ३, ५, ७, इस प्रकार विषम संख्या में पत्तियां हों । जैसे हम समिधा एकत्रित बांधते हैं, वैसे दूर्वा एकत्र बांधें । उन्हें एकत्रित बांधने से उनकी गंध लंबे समय तक टिकी रहती है । दूर्वा समर्पित करते समय पत्तियों का भाग अपनी ओर तथा डंडी का भाग श्री गणेश की मूर्ति की ओर होना चाहिए ।

श्री गणेश उपासना अंतर्गत आवश्यक कृतियां

  1.  चंदन किस उंगली से लगाएं – अनामिका से
  2.  किस सुगंध की उदबत्ती घुमाएं ? – चंदन, केवडा एवं चमेली
  3.  उदबत्तियों की संख्या कितनी हो ? – दो
  4. कौनसी सुगंध का इत्र समर्पित करें ? – हिना
  5.  श्री गणेश की कितनी परिक्रमा करें ? – आठ अथवा आठ गुना संख्या में

गणेशोत्सव की अवधि में आवश्यक श्री गणेश की उपासना !

श्री गणेश चतुर्थी के दिन, साथ ही गणेशोत्सव की अवधि में पृथ्वी पर श्री गणेशतत्त्व सामान्य की तुलना में १ सहस्र गुना कार्यरत रहता है । इस अवधि में की गई श्री गणेश की उपासना से गणेशतत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।
प्रार्थना : हे बुद्धिदाता श्री गणेश, आप मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें । हे विघ्नहर्ता, आप मेरे जीवन में आनेवाले संकटों का निवारण करें !
नामजप : गणेशोत्सव की अवधि में ‘ॐ गँ गणपतये नम:’ नामजप अधिक से अधिक करें । यह नामजप अकेले अथवा सामूहिक पद्धति से भी कर सकते हैं ।
स्तोत्र का पाठ : इस अवधि में ‘श्री गणपति अथर्वशीर्ष ’ अथवा ‘गणपति संकष्टनाशन स्तोत्र’ का पाठ करें ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ एवं लघुग्रंथ ‘श्री गणपति’)

अनंत चतुर्दशी

तिथि : भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी

व्रत रखने की पद्धति : इस व्रत के प्रमुख देवता हैं अनंत अर्थात श्रीविष्णु तथा शेष एवं यमुना गौण देवता हैं । इस व्रत की अवधि १४ वर्ष की है । इस व्रत का आरंभ किसी के बताने पर अथवा सहजता से अनंत का धागा मिलने पर करते हैं तथा उसके उपरांत यह व्रत संबंधित कुल में जारी रहता है । अनंत की पूजा में चौदह गांठ वाले रेशम के लाल धागे की पूजा करते हैं । पूजा के उपरांत यजमान के दाहिने हाथ में उसे बांधा जाता है । चतुर्दशी हो, तो यह व्रत विशेष लाभकारी सिद्ध होता है ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘त्योहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’)