National Award ‘The Kerala Story’ : ‘द केरल स्टोरी’ को राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने से ‘एफ.टी.आई.आई.’ के छात्र संगठन को आपत्ति 

(एफ.टी.आई.आई. का अर्थ है ‘फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया’)

पुणे (महाराष्ट्र) – राष्ट्रीय चलचित्र पुरस्कारों की हाल ही में घोषणा हुई है । इसमें निर्देशक सुदीप्तो सेन की वर्ष २०२३ में प्रदर्शित लव जिहाद पर आधारित ‘द केरल स्टोरी’ इस चलचित्र को गौरव प्राप्त हुआ है । सुदीप्तो सेन को ‘सर्वश्रेष्ठ निर्देशक’ पुरस्कार प्रदान किया गया है । साथ ही इस चलचित्र को ‘सर्वश्रेष्ठ छायांकन’ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है । अनेक दर्शकों ने इसका स्वागत किया है, तो कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया है । केरल के हिन्दूद्वेषी मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने इस चलचित्र को पुरस्कार दिए जाने की घटना का विरोध किया था । अब पुणे की अभिनय का प्रशिक्षण देने वाली ‘फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया’ (एफ.टी.आई.आई.) के छात्रों के संगठन ने भी इस विषय पर आपत्ति जताई है ।

१. ‘द केरल स्टोरी’ केवल एक चलचित्र नहीं, अपितु एक अस्त्र है, ऐसा ‘एफ.टी.आई.आई.’ के छात्र संगठन द्वारा प्रकाशित किए गए निवेदन में कहा गया है । ‘द केरल स्टोरी’ को पुरस्कार देना केवल निराशाजनक नहीं, अपितु अत्यंत ही घातक है । यह चलचित्र एक अभिव्यक्ति नहीं है, अपितु मुस्लिम समुदाय तथा केरल जैसे प्रगत राज्य की अपकीर्ति करने का साधन है, ऐसा इस निवेदन में कहा गया है । (‘द केरल स्टोरी’ इस चलचित्र में केरल में लव जिहाद में झुलस रही सहस्रों हिन्दू बेटियों की भयावह स्थिति को प्रस्तुत किया गया है । इसमें आतंकवादियों की मानसिकता को जगत के समक्ष रखा गया है । अतः इसमें निंदा की बात कहां आती है ? अपितु राज्य को सुधारने का एक अवसर प्राप्त हुआ है, ऐसा कहा जाए, तो यह अनुचित नहीं होगा – संपादक)

२. छात्र संगठन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अल्पसंख्यकों के विरोध में झूठी जानकारी तथा भय फैलाने वाली फिल्मों को जब सरकारी संस्थाएं पुरस्कार देती हैं, तो वे केवल कला का सम्मान नहीं करतीं, अपितु हिंसा को भी वैधता देती हैं । (इस चलचित्र में जिहादी आतंकवादियों की गतिविधियों पर प्रकाश डाला गया है । तब अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक ऐसा भेद कर छात्र संगठन समाज में विवाद करने का प्रयास न करे – संपादक)

संपादकीय भूमिका

अभिनय का प्रशिक्षण देने वाली यह सरकारमान्य संस्था साम्यवादियों का अड्डा है । अतः ‘केरल स्टोरी’ को पुरस्कार मिलने पर वहां की साम्यवादी विचारधारा वाले छात्रों ने आपत्ति जताई , तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं ।