जीवन को आनंदमय बनाने का गुरुमंत्र देनेवाली ‘सनातन संस्था’ !

‘सनातन संस्था’ का अर्थ केवल कृतज्ञता, कृतज्ञता एवं कृतज्ञता !

‘मेरे जीवन में ‘सनातन संस्था’ के रूप में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी आए तथा उसके कारण मेरा जीवन ही परिवर्तित हो गया । आज मैं जब पीछे मुडकर देखती हूं, तो मेरे जीवन में ‘सनातन संस्था’ के आने से मन में केवल ‘कृतज्ञता’ शब्द ही आता है । मुझे पहचाननेवाले लोगों को भी यही लगता है, ‘तुम्हारा जीवन बहुत ही अच्छा है’ ‘सनातन संस्था के कारण मुझे क्या मिला ?’, इसे शब्दबद्ध करना बहुत कठिन है; क्योंकि मुझे जो मिला है, वह अनुभव करने जैसा ही है । यह विचार ‘केवल मेरा ही है’, ऐसा नहीं है, अपितु सनातन संस्था से जुडे प्रत्येक साधक का है; क्योंकि सनातन संस्था का केंद्रबिंदु ‘व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति है’, साथ ही ‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां, उतने साधनामार्ग !’, इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक साधक से साधना करवा ली जाती है । ईश्वर ने परात्पर गुरुदेवजी के रूप में जन्म लिया तथा उन्होंने हमें उनके चरणों में लिया । इससे अन्य हमारा अन्य कोई सौभाग्य नहीं है; इसीलिए ‘सनातन संस्था’ का अर्थ है केवल ‘कृतज्ञता, कृतज्ञता एवं कृतज्ञता…!’ यही सत्य है !

वैद्या सुश्री (कु.) माया पाटील

 १. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की कृपा से सनातन संस्था से जुड जाना

‘मैं साधना में आऊं’, यह गुरुदेवजी की ही (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की ही) योजना थी । हमारे घर में सनातन संस्था का सत्संग चलता था, तब भी मैं उस सत्संग का लाभ नहीं उठाती थी । उस समय आधुनिक वैद्या (श्रीमती) नंदिनी सामंत के माध्यम से साधना का विषय मुझ तक पहुंचा । ‘साधना में आने के उपरांत बुद्धि का निश्चय होने तक किसी को ताे साधना करवा लेनी पडती है, वह कार्य श्रीमती नंदिनी सामंत ने मेरे लिए किया’, ऐसा मुझे लगता है; क्योंकि उस समय हम दोनों एक ही चिकित्सालय में काम करते थे । मेरे जीवन में ‘सनातन संस्था का आगमन’ ही मेरे जीवन को मिला मोड सिद्ध हुआ । उसके लिए गुरुदेवजी एवं श्रीमती नंदिनी सामंत के प्रति कितनी भी कृतज्ञता व्यक्त करूं, अल्प ही है ।

२. ‘हिन्दू धर्मानुसार आचरण करने पर ही हम आनंदित हो सकते हैं’, इसे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा सरल भाषा में बताया जाना

परात्पर गुरुदेवजी ने सनातन संस्था के माध्यम से हम सभी के जीवन में हिन्दू धर्म का बीज बोया । महान हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता विशद कर ‘कलियुग में धर्म का आचरण कैसे करना चाहिए ?’, यह भी उन्होंने सिखाया । मेरी साधना का आरंभ नामजप से हुआ । गुरुकृपायोग के अनुसार साधना के द्वारा स्वभावदोष-निर्मूलन, अहं- निर्मूलन, नामजप, सत्संग, सत्सेवा, भावजागृति, त्याग एवं प्रीति, इन चरणों के अनुसार अष्टांग साधना करना सिखाया । वर्तमान कलियुग में ‘हिन्दू धर्म’ अथवा ‘सनातन’ जैसे शब्द सुनने पर ‘नहीं, इससे हमें दूर ही रहना चाहिए’, ऐसा कहा जाता है । भले ही ऐसा कहा जाता हो, तब भी ‘हिन्दू धर्म एक जीवनशैली है तथा उसके अनुसार हमने आचरण किया, तभी हम आनंदित रह सकते हैं, इसे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने हमें सरल भाषा में बताया ।

३. जीवन में साधना का महत्त्व समझ में आना

‘आनंदमय जीवन हेतु साधना’ की संकल्पना सनातन संस्था से समझ में आई । इसमें केवल ‘क्या साधना करनी है ?’, ऐसा नहीं है, अपितु ‘साधना कैसे करनी है’ तथा उसमें आनेवाली बाधाओं पर कौनसे उपाय करने चाहिए ?, इस विषय में सनातन संस्था के माध्यम से ज्ञात हुआ । इसमें ‘व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति सनातन संस्था का केंद्रबिंदु है’, इसका विगत २५ वर्षाें में अनुभव हुआ । प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति, शिक्षा, रुचि-अरुचि, स्वभाव आदि सहित प्रत्येक बात भिन्न होती है । ऐसा होते हुए भी ‘अपनी-अपनी स्थिति में हमें किस प्रकार साधना करनी चाहिए ?’, यह ध्यान में आया । उससे परात्पर गुरुदेवजी की महानता ध्यान में आई । जीवन में व्यावहारिक दृष्टि से स्वयं का ध्येय भले ही भिन्न हो, तब भी आनंद प्राप्त करने का ध्येय सभी के लिए समान ही होता है । उसके कारण ‘साधना’ का महत्त्व मन पर अंकित हुआ । इस विषय में मन में कोई शंका नहीं है तथा आगे भी नहीं होगी, इस पद्धति से परात्पर गुरुदेवजी ने साधना से संबंधित संपूर्ण ज्ञान दिया ।

४. जीवन स्थिर बनकर आनंदित होना

‘साधना का अर्थ है ईश्वरप्राप्ति हेतु (आनंदप्राप्ति हेतु) प्रतिदिन आवश्यक प्रयास’, यह व्याख्या समझ में आने पर कुछ अलग ही लगा । ‘अध्यात्मशास्त्र में आनंदप्राप्ति हेतु सबकुछ लिखकर रखा हुआ है तथा उसके अनुसार हमने आचरण किया, तो हमें आनंद मिलता है’, ऐसा कभी सुना अथवा पढा नहीं था । उसमें समाहित ‘साधना का महत्त्वपूर्ण चरण नामस्मरण है’, यह समझ में आया । उसके अनुसार कृति करना आरंभ करने के उपरांत मन स्थिर हुआ तथा ‘जीवन में जो चाहिए था, उसमें से कुछ मिला’, ऐसा लगकर बहुत आनंद मिला । इस आनंद का शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं था । उससे ‘प्रतिदिन आवश्यक प्रयास समझ लेकर वह करेंगे’, यह मन का निश्चय हुआ ।

५. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा ग्रंथों के माध्यम से अत्यंत सरल एवं शास्त्रीय परिभाषा में अध्यात्म का अमूल्य ज्ञान दिया जाना

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने ग्रंथों के माध्यम से अध्यात्मशास्त्र का एक-एक विषय अत्यंत सरल तथा शास्त्रीय भाषा में लिखकर रखा है । उससे बहुत ज्ञान मिला । गुरुदेवजी द्वारा लिखे गए ग्रंथों का वर्णन शब्दों में करना संभव नहीं है; क्योंकि अध्यात्म अनंत का शास्त्र है । ‘कलियुग में अध्यात्म के कौनसे सूत्र समझ लें और उन्हें आचरण में कैसे लाएं ?’, इसे उन्होंने बहुत ही सरल पद्धति से लिखा है । उन्होंने छोटे, मध्यम तथा बडे आकार के ग्रंथ प्रकाशित कर उनसे एक-एक विषय को शास्त्रीय परिभाषा में; परंतु सरल पद्धति से लिखा है । उसके कारण गुरुदेवजी द्वारा लिखे गए ग्रंथ किसी भी आयु समूह के तथा शिक्षा स्तर के जिज्ञासुओं के लिए उपयुक्त हैं ।

६. ‘इस घनघोर कलियुग में आनंदमय एवं सुरक्षित जीवन जीना संभव होना’ केवल सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के कारण ही ध्यान में आना

‘जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है’, यह शास्त्रवचन है । जन्म से लेकर मृत्यु तक अर्थात पहले मां, शिक्षक तथा उसके उपरांत के प्रत्येक चरण में संबंधित क्षेत्र के मार्गदर्शक गुरु की आवश्यकता होती ही है ! जीवन में गुरु होंगे, तो जीवन की यात्रा सुलभ होती है । ‘अध्यात्म में गुरु खोजना कठिन है; परंतु यदि हम शास्त्र के अनुसार उचित ढंग से साधना कर रहे हों, तो हमारे जीवन में गुरु अपनेआप आ जाते हैं’, यह शास्त्र समझ में आया । धर्म में अंतर्निहित ऐसे सरल; परंतु प्रायोगिक सूत्र समझ में आने के कारण बहुत आनंद मिला । हम यदि उचित ढंग से साधना कर रहे हों, तो गुरु की कृपा होती ही है । अध्यात्म में गुरु की कृपा अर्थात गुरु उसके जीवन में आते हैं तथा उसका उद्धार ही करते हैं । गुरु की कृपा क्या है ? तथा उसका कैसे अनुभव करना चाहिए ?, यह समझ में आने से जीवन और आनंदित एवं सुरक्षित बन गया । इस घनघोर कलियुग में इस प्रकार सुरक्षित जीवन जीने का अवसर मिलना, इसके अतिरिक्त अन्य कोई आनंद हो ही नहीं सकता तथा यह केवल गुरुदेवजी के कारण ही समझ में आया ।

७. अध्यात्मशास्त्र समझ में आने के कारण उस विषय में अथवा साधना के विषय में मन में शंका न होना

अध्यात्म में अनेक बाते हैं । हिन्दू धर्म में ३३ करोड देवता हैं, तो हमें किस देवता की उपासना करनी चाहिए ? तथा हमें उससे कैसे लाभ होता है ?, इसका शास्त्र समझ में आने के कारण अध्यात्मशास्त्र अथवा साधना के विषय में मन में शंकाएं नहीं हैं । गुरुदेवजी ने यह भी बताया कि अगले स्तर की साधना कैसे करनी चाहिए ?, जिससे साधना उबाऊ नहीं लगती । ‘केवल साधना ही आनंददायक है’, यह मन पर अंकित हुआ ।

८. स्वभावदोष एवं अहं के निर्मूलन की प्रक्रिया जीवन जीने की संजीवनी होना

‘नामजप करने में मुख्य बाधाएं स्वभावदोष तथा अहं की होती हैं ।’, यह गुरुदेवजी की कृपा से ध्यान में आया । ‘स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन कैसे करना चाहिए ?’, यह शास्त्रीय पद्धति से समझ में आया । इसके लिए गुरुदेवजी के चरणों में कितनी भी कृतज्ञता व्यक्त की जाए, अल्प ही है । स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन के कारण व्यावहारिक जीवन जीने की दृष्टि से आवश्यक दिशा समझ में आई । इसके बहुत अच्छे परिणाम मिले । ‘ईश्वरप्राप्ति के लिए जैसे स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन महत्त्वपूर्ण है, वैसे ही नियमित जीवन अच्छे से व्यतीत करने के लिए भी इस प्रक्रिया की आवश्यकता है’, यह ध्यान में आया । अहं के कारण ही जीवन में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती हैं । इसके लिए ‘अहं नहीं होना चाहिए’, यह सभी की समझ में आता है; परंतु उसे दूर कैसे करना चाहिए ?, यह समझ में नहीं आता । गुरुदेवजी द्वारा शास्त्रीय पद्धति से स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन कैसे करना चाहिए ?, यह बताने के कारण उसे करना संभव है ।

९. ‘भाव एवं कृतज्ञता’ का सूत्र केवल गुरुदेवजी की कृपा से ही ध्यान में आना

अध्यात्म को जीते समय ‘जहां भाव, वहां ईश्वर’, ऐसा एक वचन है; परंतु भाव क्या है ? तथा उसे कैसे लाना है ? कृतज्ञता क्या है ? तथा उस स्थिति तक कैसे पहुंचना है ? यह भी गुरुदेवजी ने बताया अर्थात सिखाया । उसके कारण ईश्वर का अनुभव करना सरल हुआ है । भाव एवं कृतज्ञता जैसे आंतरिक परिवर्तन केवल गुरुदेवजी की कृपा से ही आते हैं, यह भी बात समझ में आई ।

१०. परिवार पर स्थित गुरुकृपा का प्रत्येक चरण पर अनुभव करना

गुरुदेवजी द्वारा अगले-अगले स्तर की साधना बताकर उसे करवा लेने के कारण धीरे-धीरे गुरुकृपा का अनुभव हो पा रहा है । ‘गुरुकृपा का अर्थ है गुरु का निरंतर हम पर ध्यान होना तथा प्रत्येक चरण पर उनके द्वारा सहायता की जाना !’ गुरुदेवजी की कृपा के कारण जीवन में कोई भी संकट नहीं आया तथा थोडे-बहुत जो भी कटु अनुभव मिले, उनसे उन्होंने मुझे बडी सहजता से बाहर निकाला । परिवार का यदि एक भी व्यक्ति साधना करता हो, तब भी उसके पूरे परिवार पर गुरुदेवजी की कृपा होती है, इसका प्रत्येक चरण पर अनुभव हुआ । ‘जीवन में आनंद, शांति, संतुष्टि तथा सुरक्षितता होना ही गुरुकृपा होती है’, ऐसा लगता है ।

११. ‘कलियुग में साधना कर ईश्वर का अनुभव करना क्या होता है ?’, इसका गुरुदेवजी की कृपा का कारण अनुभव होना

‘कलियुग में साधना कर ईश्वर का अनुभव करना क्या होता है ?’, इसका गुरुदेवजी की कृपा के कारण अनुभव हो रहा है । आज किसी ने मुझे पूछा कि ‘क्या ईश्वर हैं ?’, तो उसका उत्तर ‘जी हां !’, यही आता है । ‘उनका अस्तित्व है तथा वे चराचर में व्याप्त हैं’, यह समझ में आना ही कितना आनंद देनेवाला है’, यह ध्यान में आया । ‘कृतज्ञता’, ‘प्रार्थना’ जैसे शब्दों की आंतरिक गहराई का गुरुदेवजी ने ध्यान दिलाया, साथ ही वहां तक कैसे पहुंचना है ?, यह भी वे सिखा रहे हैं ।

१२. ‘जीवन सार्थक हुआ है’, ऐसा लगना

पीछे मुडकर देखने पर ‘मैंने जीवन में क्या प्राप्त किया ?’, यह प्रश्न जब मन में उठता है, तब लगता है, ‘मेरा जीवन सार्थक हुआ ।’ यह केवल गुरुदेवजी के कारण तथा सनातन संस्था के कारण ही हुआ है । सनातन संस्था के माध्यम से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जीवन में नहीं आते, तो जीवन व्यर्थ जाता । व्यावहारिक दृष्टि से बहुत कुछ अर्जित किया जा सकता था; परंतु ‘जो जन्म-जन्म तक साथ रहनेवाला है, वही मैंने जीवन में अर्जित नहीं किया’, इसका खेद सदैव रहता । गुरु के जीवन में आने के उपरांत ही जीवन सार्थक हो सकता है; क्योंकि अध्यात्म के सभी सिद्धांत हमने कहीं न कहीं पढे होते हैं; परंतु गुरु की कृपा के कारण ही वे अंतर् में स्थापित होते हैं ।

१३. ‘सनातन संस्था’ के प्रति (गुरुदेवजी के प्रति) कृतज्ञता !

‘सनातन संस्था के कारण जीवन कितना सुंदर एवं आनंदमय हुआ है’, यह शब्दों में व्यक्त करना कठिन है । ‘क्या प्राप्त हुआ ?’, यह बताना जितना कठिन है, उसी प्रकार कृतज्ञता व्यक्त करना भी कठिन है । गुरुदेवजी की कृपा के कारण जो पुष्प मिला, उसकी पंखुडी भी मैं इस लेखन से समर्पित नहीं कर सकती । ‘गुरुदेवजी, आप ही मुझे कृतज्ञभाव दीजिए । मेरी अंतिम सांस तक अंतर में आपके प्रति भाव अखंडित रहे । आपकी कृपा भी मेरी अंतिम सांस तक बनी रहे’, यह आपके कोमल चरणों में शरणागतभाव से प्रार्थना है !’

– वैद्या सुश्री माया पाटील, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल, महाराष्ट्र. (१५.३.२०२४)