SANATAN PRABHAT EXCLUSIVE : लोकलेखा समिति का ब्योरा ७ वर्षाें से, जबकि अनुपालन ब्योरा १३ वर्षाें से लंबित !

  • ‘कैग’ एवं ‘लोकलेखा समिति’ जैसी महत्त्वपूर्ण समितियों की अनुशंसाओं की अनदेखी करना जनहित की दृष्टि से चिंता का विषय !

  • श्री. प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधी

मुंबई – ‘भारत के नियंत्रण एवं महालेखापरीक्षक’ अर्थात ‘कैग’ के ब्योरे पर संबंधित विभाग की ओर से किए जानेवाले कामों की तथा उनपर किए गए खर्चे की पडताल करने की विधिमंडल की ‘लोकलेखा’ समिति एक महत्त्वपूर्ण समिति है । सरकारी धन का अपव्यय टालने में तथा राज्य की आर्थिक सुसूत्रता बनाए रखने में इस समिति का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है; परंतु महाराष्ट्र विधिमंडल में वर्ष २०१८ से अर्थात पिछले ७ वषों से लोकलेखा समिति का एक भी ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया गया है । इससे भी गंभीर बात यह है कि लोकलेखा समिति द्वारा सरकार को की गई अनुशंसाओं की कार्रवाई का ब्योरा वर्ष २०१२ से अर्थात पिछले १३ वर्षाें से प्रस्तुत नहीं किया गया है । राज्य के प्रशासनिक कामकाज की दृष्टि से यह चिंता का विषय है, साथ ही शासन एवं प्रशासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह उठानेवाला है । विधिमंडल प्रशासन तथा सरकार को इस पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक है ।

वर्तमान समय में ‘कैग’ द्वारा प्रस्तुत ब्योरों से संबंधित सैकडों साक्ष्य राज्य में लंबित हैं । इन साक्ष्यों को पूरा करने हेतु लोकलेखा समिति की ओर से सरकार के विभिन्न विभागों से निरंतर समीक्षा की जा रही है । ‘लंबित साक्ष्य पूरे करने हेतु संबंधित विभाग इसमें गंभीरता से ध्यान दें’, इसके लिए सरकार की ओर से समय-समय पर सरकारी निर्णय भी प्रसारित किए गए हैं । अधिकारियों की अकार्यक्षमता, कार्य का बोझ, अधिकारियों तथा कर्मचारियों की अपर्याप्त संख्या आदि कारणों से वर्तमान में सैकडों साक्ष्य लंबित हैं । वर्तमान स्थिति में विधिमंडल के लोकलेखा विभाग में पारित ७ पदों में से ३ पद खाली हैं ।

तोडफोड की राजनीति से पहुंची हानि !

प्रत्यक्ष कार्यान्वयन के लिए विधानसभा की विभिन्न २५ समितियां हैं । राजनीतिक दलों के सदस्यों की संख्या के अनुसार इन समितियों में सर्वदलीय सदस्य चुने जाते हैं । वर्ष २०२२ में राज्य में भाजपा एवं शिवसेना महागठबंधन की सरकार आई; परंतु शिवसेना एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस में विभाजन के कारण ‘सच्ची शिवसेना तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस कौनसी है ?’, इस न्यायालयीन विवाद के कारण पिछले ढाई वर्ष से विधानसभा की एक भी समिति का गठन नहीं हो सका है । उसके कारण विधानसभा की समितियों की बैठकें ही नहीं हुईं । इसके परिणामस्वरूप इन समितियों पर काम का बोझ बडे स्तर पर बढ गया है, विशेषकर लोकलेखा, आश्वासन आदि समितियां इससे प्रभावित हुई हैं ।

ऐसी है विधिमंडल के कामकाज की पद्धति !

श्री. प्रीतम नाचणकर

‘कैग’ की ओर से राज्य के सरकारी कामों का लेखापरीक्षण कर उसका ब्योरा विधिमंडल में प्रस्तुत किया जाता है । लोकलेखा समिति की ओर से ‘कैग’ द्वारा उठाए जानेवाले सूत्रों पर संबंधित विभागों के अधिकारियों के साक्ष्य लिए जाते हैं । क्या किसी काम में भ्रष्टाचार हुआ है ?, क्या अधिकारियों से लापरवाही हुई है ?, ‘क्या कोई काम अल्प गुणवत्ता का हुआ है ? आदि बातें लोकलेखा समिति के ब्योरे से उजागर होती हैं । लोकलेखा समिति ये ब्योरे विधिमंडल को प्रस्तुत करती है, साथ ही इन ब्योरे में की गई अनुशंसाओं पर संबंधित विभाग द्वारा किए गए कार्यान्वयन के ब्योरे भी लोकलेखा समिति की ओर से विधिमंडल में प्रस्तुत किए जाते हैं । उसे ‘अनुपालन ब्योरा’ कहा जाता है ।

‘कैग’ के ब्योरे पर लोकलेखा समिति द्वारा की गई अनुशंसाओं पर आधारित ब्योरा प्रस्तुत करना अथवा उस पर कार्रवाई करना सरकार के लिए अनिवार्य नहीं है; परंतु इतने वर्षाें में लोकलेखा ब्योरे तथा उस पर आधारित अनुपालन ब्योरे प्रस्तुत न होना लोकतंत्र के लिए घातक है ।