
१. प.पू. डॉक्टरजी द्वारा प.पू. भक्तराज महाराजजी के आश्रम में सभी प्रकार की शारीरिक सेवाएं करना तथा सेवा के उपरांत प.पू. महाराजजी से अध्यात्म संबंधी शंकाओं का समाधान कर लेते समय उन्हें समय का भान न रहना
‘प.पू. महाराजजी (प.पू. बाबा) से मिलने आश्रम जाने पर डॉक्टरजी पहले कपडे बदलकर आश्रम की स्वच्छता करते । ‘आश्रम में झाडू लगाना, जाले निकालना, गद्दे धूप में सुखाने के लिए रखना, हाथों में प्लास्टिक की थैली बांधकर शौचालय तथा स्नानगृह की स्वच्छता करना’ आदि सेवाएं वे करते । फिर वे स्नान कर बही-पेन्सिल लेकर प.पू. बाबा के कक्ष में जाकर अध्यात्म संबंधी उनकी शंकाओं का समाधान कर लेते तथा बही में लिख लेते । इसमें उन्हें समय का भान न रहता ।
प.पू. बाबा की छाती पर ‘किलॉइड’ (घाव का चिन्ह बडा होना) हुआ था । उन्हें उससे कष्ट होता था । प.पू. बाबा को नींद आने के उपरांत भी उनके जागने तक प.पू. डॉक्टरजी वहीं बैठे रहते ।
२. शारीरिक सेवा करनेवाले डॉक्टरजी की ओर देखकर प.पू. महाराजजी द्वारा विनोद में व्यक्त किए उद्गार !
कांदळी आश्रम जाने पर वहां भी डॉक्टरजी का यही सब चलता था । वहां के ‘आंगन में झाडू लगाना, पत्थर-कंकड इकट्ठे कर उनकी व्यवस्थित रचना कर रखना, सूखे हुए फूलों के पेड निकाल देना ।’ एक बार प.पू. बाबा उनसे मिलने आए एक अतिथि से कहने लगे, ‘‘देखिए, ‘ये फॉरेन रिटर्न डॉक्टर’ मेरे आंगन में झाडू लगा रहा है ।’’
३. प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा प.पू. डॉक्टरजी की ली गई परीक्षा
३ अ. प.पू. बाबा के बताए अनुसार प.पू. डॉक्टरजी द्वारा एक दंपति को बताना, ‘अब बाबा आप से नहीं मिलेंगे’; परंतु उसी समय प.पू. बाबा द्वारा उस दंपति को मिलने के लिए अंदर भेजने के लिए कहा जाना तथा इसके कारण अतिथियों द्वारा वापस जाते समय क्षुब्ध होकर ‘महाराजजी के शिष्य स्वयं को महाराजजी से बडा मानते हैं’, ऐसा कहा जाना : एक बार प.पू. महाराज जब कांदळी में बीमार रहे थे, तब उन्होंने प.पू. डॉक्टरजी को बताया, ‘‘मैं अब सो जाता हूं । मुझसे मिलने के लिए चाहे कोई भी आए, मुझे मत जगाना ।’’ प.पू. डॉक्टरजी दरवाजे के पास कुछ पढते बैठे थे । इतने में दूर से एक दंपति प.पू. बाबा से मिलने आए । प.पू. डॉक्टरजी ने उन्हें बताया, ‘प.पू. बाबा बीमार होने के कारण किसी से नहीं मिलेंगे ।’ इतने में प.पू. बाबा ने अंदर से पूछा, ‘‘वहां कौन है ?’’ प.पू. डॉक्टरजी ने उन्हें बताया, ‘आपसे मिलने कोई आए हैं ।’ प.पू. महाराजजी ने उन्हें अंदर भेजने के लिए कहा । वे अतिथि कुछ समय रुककर वापस जाने लगे । वे जाते समय बडबडाते हुए बोले, ‘‘महाराजजी के शिष्य स्वयं को महाराजजी से बडा समझते हैं !’’
३ आ. अतिथियों के जाने के उपरांत उन्हें मिलने के लिए भेजने के कारण प.पू. बाबा का प.पू. डॉक्टरजी पर क्षुब्ध होना : उस समय मैं वहीं थी । मैंने उनकी बातें सुनी । मैंने डॉक्टरजी से कहा, ‘‘आप उन्हें बताने के लिए क्यों गए थे ?’’ उसपर उन्होंने कहा, ‘‘अतिथियों के जाने के उपरांत मुझे बुलाकर महाराजजी ने क्या कहा, तुम्हें पता है ?’’ उन्होंने कहा, ‘‘क्या तुम अतिदक्षता विभाग के रोगियों का इसी प्रकार ध्यान रखते हो ? तुम डॉक्टर हो या नाई ?’’ यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गई । ‘गुरु किस प्रकार अपने शिष्य की परीक्षा लेते हैं ?’, इसका वह बहुत अच्छा उदाहरण था ।
४. प.पू. महाराजजी द्वारा प्रसन्न होकर डॉक्टरजी को दिया गया बहुमूल्य आशीर्वाद !
प.पू. महाराजजी ने ऐसी अनेक परीक्षाएं लीं । उनमें वे उत्तीर्ण भी हुए; इसी कारण प्रसन्न होकर एक बार वे कहने लगे, ‘‘डॉक्टर, मैंने आपको ‘ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य’ प्रदान किया ।’’ गुरु से ऐसा आशीर्वाद मिलना शिष्य का परमसौभाग्य ही होता है ।’
– डॉ. (श्रीमती) कुंदा जयंत आठवले (२९.४.२०२५)
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